भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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परिष्क * स्थिरं स्तिर्धं हषणं प्रीणन गुरु ॥३५२॥

रोचनं वस्मेधाग्निमांसोजःशक्रवधेनम्‌ ।

शुष्क मांख को सिद्ध करने पर स्थिर (कठिन); स्निग्ध

हषण (इर्षोत्पादक), प्रीणन (पुष्टिकारक); गुरु, रोचक; बर

मेधा, अग्नि, मांस, ओज तथा शुक्रवधंक है । |

वि° मन्तव्य- परिशुष्क मांस-पकाया हुआ वहं म

जो सूखा हो जेसे- क्वाव आदि ।३५३॥

तदेवोस्छ्ष्टपिष्टस्वादुस्प्तमिति पाचकाः॥२५४॥।

इससे परिशुष्क मांस को पदिठे खूब अच्छो प्रकार स काट

कर, पीछे से पीस छया जाये, तो उल्लु्त पिष्ट होने के कारण

पाचक (रसोइये) इखको उत्लु्' मांख कदते ३ ।

वि० मन्तव्य--उल्टप्त-मांख को काट-काट कर लगदी

बना, नमक, मसाला मिखाकर पकाया गया ॥२५४॥

परिडष्कगुणेयक्तं वहो पक्वामतो घु ।

यह मांख आग पर पकाने से, परिशुष्क मांख के समान

गुणोंवाखा तथा ल्घु होता हे ।

तदेव शूछिकाप्रोतमङ्गारपरिपाचितम्‌ ॥३५५॥।

ज्ञेयं गुरुतरं किंचित्‌ प्रदिग्धं गुरुपाकतः ।

यही उल्लुप्त मांस--रलाकाओं पर क्गाकर--अंगारो

पर पकाने से (शूल्ाकृत मांस), तथा स्नेह (घत आदि); धान्याम्छ

तक्रादि से मिला होने पर, रारुपाक होने से ङु गुख्पाक दै

इसका नाम ^्रदिग्ध' हे ! |

वि° मन्तव्य- प्रदिग्ध-उल्लुप्त-मांस को लोह कौ शाका

सरिया प्र ल्पेटकर अंगारों पर पकाया जाता है । इसे “शल्य

मी कते हें ॥२५५॥ उस्म भितं पिष्टं प्रतप्रं कन्दुपाचितम्‌ ॥३५६॥

परिष्क प्रदिग्धं च. शल्य य्ान्यदीदशम्‌ |

सास यत्तं सिद्धं तद्रीर्योष्णं पित्तच्रद्‌ गुर्‌ ॥३५५॥।

` छष्वग्निदीपनं हयं रुच्यं दष्टिप्रसादनम्‌ |

अनुष्णवीय पित्तघ्नं मनोज्ञं घृतसाधितम्‌ ॥३५८॥

` उल्लुप्त (कद करके पीसा), भजित (भूना), पिष्ट (पीखाः,

प्रतप्त (गरम किया), कन्दुपाचित, परिशुष्क, प्रदिग्ध ओर

शल्य एवं इस प्रकार के अन्य सव मांस, तेर मे सिद्ध. क्रिये जाने पर--उष्णवीर्य, पित्तकारक ओर शुरु हँ | धी मे सिद्ध होने पर, ल्घु अग्निदीपक, दय के खयि प्रिय, खुचिकारक,

“शशाकाम्लपर्पिण्याककुरत्थर्वणामिषेः ।

करोरदधिमाषस्च प्रायः क्षीरं विरुध्यते ॥

१ परिदष्क मांस- _ `

“सिक्तं बहुघृते भष्टं मुहुरुष्णाम्बूना मदु |

जीरकाचैर्धनं मांसं परिुष्कं तदुच्यते 1 * क =

सुश्रतसिता

ल्यि सुन्दर होते है १ ॥३५६-२५८।।

प्रीणनः प्राणजननः रवासकासक्षयापह्‌ः ।

वातपित्तश्रमहरो ह्यो मांसरसः स्मृतः ॥३५९॥

स्मस्योजःस्वरहीनानां स्वरक्षीणक्षतोरसाम्‌।

भग्नविशष्टसन्धोनां कृश्चानामल्परेतसाम्‌ ॥३६०॥ आप्यायनः संहननः क्रदो बल्वधैनः

मांखरस-- प्रीणन (पुष्टिकारक); प्राणदायक, श्वासकासक्षय

नाशक, वाय-पित्त-श्रमहर, हदय के ल्वयि प्रिय हे | स्मृति, ओज

| अ० ४६ |

आंखों की ज्योति वदति है, अनुष्णवौय, पित्तनाशक, मन |

तथा स्वर से हीन पुरषो के च्यि दितकारी, उ्वरसे क्षीण, त

(उरःक्षत) रोगियों के व्यि उत्तम दे | भग्न एवं सन्धि भ्रंशे |

हितकारी है, कश एवं अल्पवीयवालों को स्वास्थ्यदायक दै | ।

आप्यायन (देह को बदृनेवाखा), संहनन (खन्धानकारफ) शक्र, ओज ओर बल को बद़ाता हे ।

वि° मन्तव्य-- मांस रस-रसेदार मांस का रस जो शोस्वा कहराता है, जेसे आद्‌ आदि का रस्छा। अथवा माषका

स्वरस || ३५९.,३६०॥ स दाडिमयुतो वृष्यः संस्कतो दोषनाशनः ॥३६१॥

प्रीणनः सवभूतानां विशेषान्मुखशोषिणाम्‌ ।

चुत्तष्णापहरः श्रेष्ठः सोरावः स्वादुशीतलः ॥३६२॥

|

2 1 ण क कि |

1

॥ ५ इस मांसरसः को अनार के साथ मिलाकर खाने से इष ,

(शुक्रवधंक) है, कटुरख (मरिच आदि) से संसृत होने पर

दोषनाशक त्रि दोषनाशक) दै । शओ्ओोरवा* (सौराव)- प्रीणन

(खव प्रणियों के ल्य पुष्टिकारक), खासकर सुखशोषवारे |

रोगियों के ल्ियि उत्तम हे। ख-प्याख को हटाता दहै । उत्तम |

तथा मधुर एवं शीतल हे |

वि० मन्तव्य- मांस रख को यदि छोक दिया जाता है

तथा उसमे अम्लता के ल्यि अनारदाना डाला जाता हं तौ बह|

“'सोराव” कहठाता हे ॥३६१,३६२॥

यन्मांससुदुधृतरसं न तत्‌ पुष्टिवखावहम्‌ ।

विष्टम्ि दज रूक्षं विरसं मारुतावहम्‌ ॥२६३॥

१ “मजजितं स्याद्‌ घृतादौ-तु पिष्ट्वा यत्साधितं पुनः ।

अपूपादिकृतं पिष्टं दधिदाडिमसौरभः ॥.

सिद्धः साञ्चैस्तथाजाजीसामुद्रमरिचैरपि ।

_भ्रंगारादिषु यत्पकवं प्रतप्तं तदुदाहूतम्‌ ॥ पिश्वितं सौरभैरिमप्तं कन्दुपकववं.मधुप्रभम्‌ ।

राजिकाकत्कछिप्तं च कन्दपाचितमुच्यते ॥

ह्गिदके परिक्षिप्तं शले निष्पीडितं ततः ।

सिक्त्वा सिक्त्वाम्बधाराभिः ` विधूमेऽगन प्रतापयेत्‌ ॥

फलाम्लेनापि यत्पक्वं शल्यं -तत्‌ सारभान्वितम्‌ ॥

. -२ कफ्नो दीपनो हे यः ` राद्धानां प्राणिनामपि ।

यह्‌ गुण शोरेके माने गएदहं1 - ~

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