सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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अश ४६ )
एवं बका नहीं दौता । विष्टम्भि, पचने म दुजेर रूक्ष, रख
रहित जीर वायु कारक दीता दै ॥६२॥
दीघ्राग्नीनां सदा पथ्यः खानिष्कस्तु परं गुरुः| लानिष्क (शुष्क मांस को पीसकर तयार किय) --अत्यन्त
र ३, इसलिये जिनकी अग्न दीस दती है, उन रोगिरयो क
ल्यि पथ्य है ॥ मसिः निरस्थि सुस्विन्नं पुनरेषदि पे षितम् ॥३६४॥
पिपपलीशचुण्ठिमरिचगुडसर्पिः समन्वितम् । ।
रेकथ्यं पाचयेत् सम्यग्वेसवार इति स्मृतः ।३६५॥ वेसवारो गुरुःस्निग्धो बल्यो वातरुजापहः ।
वेसवार अस्थि रदित मांख को थोडा-सा जोश देकर शिला पर पष लेना चादिये । इसमें पिप्पली, मरिच, खोठ, गुड़ ओर
घी मिलाकर एक साथ पकाने से वेसखवार बनता दहै। यह वेखवार १-- गुर, स्निग्ध, वल्कारक ओर वातरोगनाशक है ॥ - कृफष्नो दीपनो ह्यः शुद्धानां रणिनामपि ॥२६६॥ ्ञयः पथ्यतमश्चैव सुदुगयूषः कृताकृतः । मङ्ग का यूष-कफनाशक, अग्निदीपक हृदय के छियि
प्रिय, वमन-विरेचन द्वारा शुद्ध ब्रणिरयों के ख्य हितकारी है। कृत-अङ्ृत ( क्वण मरिच दारा संस्कृत या असंस्कृत )--मूज्ञ युष--अतिशय पथ्य हे । वि० मन्तव्य-कृतयूष- जो मरिच हींग आदि से लोका हुआ हो, अङ्त-हछोका न गया हो ॥२६६॥ सतु दाडिममरद्रीकायुक्तः स्याद्रागषा (खा) उवः॥ रुचिष्यो छघुपाकश्च दोषाणां चाविरोध्त्। इस मूङ्ग के यूषमें दाडिम (अनार) ओर म॒द्धीका (किसमिस) को मिकाने से “रागषाडवः बनता है । यह राग लाडव.सचिकारक, ठधुपाक, वात आदि दोषों का थोड़ा पमन करता हे ॥३६७॥| ¦ मसूरमुद्गगोधूमङ्खरत्थर्वणेः कृतः ॥२६द कृफपित्ताविरोधी स्याद्रातञ्याधौ च शस्यते । मसूर; मूङ्ख, गहू, कुत्थी तथा नमक से तैयार किया । बक भूष--कफपित्त का अविरोधी तथा वायु सेग मे उत्तम हे। (मङ्ग ओर मसूर का यूष वायु मे, मसूर, मूङ्ग, गहू, इन श यूष पित्तनाशक, ओर पाचों का यूष कफनाशक है) ढोकादाडिभेयुक्त; स चाप्युक्तोऽनिलार्दिते ॥३६९॥
चनो दीपनो हयो खघुपाक्युपदिश्यते ।
इ पचक यूष मं मृद्वीका ओर अनार का योग होने से, |
| ए पादक हो जाता है। रुचिकारक, अग्निदीपक # 1171 ~
- रीणनः सर्वेभूतानां विरोषान्मुशोषिणाम्' ^" कविराज हराणचन््र जीं ते माने है । -- वेशवार के
सूत्रस्थानम्
उस साख मे सेरस निकाल ल्या, वह मांस-पुष्ि
ई. मरिवाजाजिसामुद्रैः युक्तः तिल्खडो भवेत् ॥
पटोटनिम्बयुपौ तु कफमेदोविशीपिणौ ॥३७०॥ पित्तघ्नो दीपनौ हयो छमिक्षठञ्चरापहौ । पटोल (परवल) जर नीम का यूप-कफ ओर मेद् को ` सुखात हे । पित्तनाशक, अग्निदीपक, हृदय के लि प्रिय, कृमि-कुष्ट-ज्वरनाशक दै ॥२३७०॥ शधासकासप्रतिरयायप्रसेकारो चकञ्वरान् ॥३१॥ हन्ति मूखकयुषस्तु कृफमेदोगलगप्रहान् । मलक यूष ( वाल-शुष्क मूली का यूष )--श्वास, कास, प्रतिश्याय, प्रसेक (खालाखाव), अरोचक, उवरनाशक दै। एवं कफ-मेद ओर गले के रोगों को नष्ट करता है ॥३७१॥ कुरत्ययुषोऽनिख्हा शासपीनसनाञ्ञनः ॥३७२॥ तूणीप्रतूणीकासारसगुल्ममेदःकफापहः | कुर्यी का यूष--वायुनाशक, श्वास-पीनस नाशक है | तूणी-प्रतूणी, का, अश्म, गुल्म, मेद ओर कफनाशक है ॥
दाडिमामशख्केयुषो हयः संशमनो खयुः ॥३७३॥ ` प्राणाभ्िजननो मूच्छामेदोऽनो बात पित्तजित्।
अनार ओर आंबले का यूष--हृदय के ल्यि प्रिय, ` संशमन (विना वमन ओर विना विरेचन के वहीं पर स्थित दोषों का शमन करता है), ल्घु दै । प्राण-अग्निजनक, मूच्छा-मेदनाशक पित्त वायु को नष्ट करता हे ॥२७३॥
मुद्गामख्कयषस्तु ग्राही पित्तकफे हितः ॥३७४॥
मूङ्ग ओर आवे का यूष- संग्राह्य, पित्त ओर कफरोग में हितकारी हे ॥२७४॥ |
यवकोखद्ख्त्थानां युषः कण्ठ योऽनिरापहः। यव (जौ), कोठ (वेर) ओर ऊती का यूषं--गले के व्यि हितकारी ओर वायुनाशक ह ॥३७४॥। ध सवेधान्यङ्ृतस्तद्द्जरंहणः प्राणवधेनः ॥३७५॥
सत्र धान्यो (शक धार्यो एवं शमीधान्यो) से बनाया यूष
बृंहण (देहवधंक) है । इसीको (नवपुष्टि यूष कहते ह ॥२७५॥ खडकाम्बङ्कि हयौ तथा वातकफे दितौ !. खड ओर काम्बरल्कि-यूष-हदय के व्यि प्रिथ, वायु-कफं
मे हितकारी दै।- 3 5
१ खड्यूषदो प्रकारकाहै-- `
_ एक-सतक्रशमीधाव्य ओर दुसरा-सतक्र शाक ॥ ` _- __
(सतक्राणि शमीधान्यानि स्तिधानि संग्राहकाणि खलाति 1“ ~ - “कपित्थ तक्र-चांगेरी मरिचाजाजि-चित्रकेः 1 ;: .: सुपक्वः खडयूषोऽयं तथा कास्किकोऽपरः ॥। `: दध्यम्ल-रवण-स्नेह-तिल-माष-समन्वितः.]1”? ‰ ~
परे पृतं पचेद् धीमान् भद्रकोत्यापिते ततः ॥ > ~ = `
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