सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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बल्यः कफानिरो हन्ति दाडिमाम्छोऽग्निदीपनः ।३७६।
दध्यस्छः कफछद्रूल्यः स्निग्धो वातहरो गुरः ।
तक्राम्छः पित्तकृत् प्रोक्तो विषरक्प्रदूषणः ॥ ३७७]
अनार के द्वारा खदा किया यूष-बकारक, कफ-वायु- नाशक दै। दही से खट्वा यूष कफ़कारक, बलकारक, रिनग्ध,
वायुनाशक ओर गुरु है। तक्रसे खहा किया--पित्तकारक)
विषरक्तं प्रदूषक हे ॥२३७६,२७७॥
खडाः खडयवाग्वश्च षा (खा) उवाः पानकानि च)
एवमादीनि चान्यानि क्रियन्ते वेयवाक्यतः ॥३७८॥
खड, खडयवागू , षाडव १, पानक (इमली द्राक्षादि से
बनाये) आदि वस्तुयेँ वेद्य की आज्ञा से बनाई जाती है ।३७८।
` अस्नेहख्वणं सथमकृतं कटकेर्विना
विज्ञेयं खवणस्नेहकटकेः संयुतं कृतम् ॥३७९॥।
अक्त (असंस्कृत)- स्नेह (घी), नमक ओर कटु (शुण्ठी)
आदि के बिना ख असंस्कृत हँ | नमक, स्नेह ओर शुण्ठी के साथ संस्कृत (कृत यूष) हे ॥ ३७६॥ अथ गोरसधान्याम्छफलम्छेरम्कितं च यत् | यथोत्तरं ख्यु दितं सस्छृतासंस्छृतं रसम् ॥२८०॥
गोरस (दही या छाछ); धान्याम्छ, फलाम्छ, इनके साथ मिखा मांखरस, संस्कृत को अपेक्षा असंस्कृत (मांसरस) अधिक लघु एवं हितकारी हे । गोरस से संस्कृत की अपेक्षा धान्याम्छ धान्याम्ड कौ अपेक्षा फरम्क अधिक लधु एवं हितकारी है ॥ दधिमत्स्वम्छसिद्धस्तु यूषः काम्बलिकः स्मतः । काम्बल्कि यूष का लक्षण-दही-मछटियाँं अर अम्छ (खहा) दारा घिद्ध यूष-- कम्बलिक यूप्र- दै । तिख्पिण्याकविकृतिः शाष्कशांकं विरूढकम् ।३८१॥ सिण्डाकौ च गुरूणि स्युः कफपित्तकराणि च।
तिल्-विकृति (मोदकादि), पिण्याकं विकृति, शुष्क शाक विरूढ (अंङुरित धान्य); सिण्डाकी (मी आदि शकों को कुछ उवाट्कर-कृूट्कर दाख्चीनी इलायची सुगन्धित द्रव्यो के साथ मिखाकर वटक बनाने से सिण्डाकी होती दै), तथा कफ-पित्तकारक हे ॥३८१॥
. . तद्रस्च वटकान्याहूविदाहीति गुरूणि च ॥३८२॥ वटक--उसी प्रकार गुरु ओर विदाही है ॥३८२॥ ङ्घवो छ हणा वृष्या ह्या रोचनदीपनाः। ~ ` ठष्णामूच्छरसच्छदिश्रमध्ना रागषाडवाः ॥२८३॥
काम्बलिकः यूषः-- ““दधिमस्त्वर्रषिदधस्तु यूषः काम्बलिकः स्मृतः। रमैः॥ संयोज्य मथितः स्वच्छ एष काम्बकिको भवेत् ॥” ` १ षाडव्र-^स्पष्टाम्कमधुरोऽस्पष्टकषायख्वणोषणः । भतिक्तः षाडवःकोचकपित्याचुपव हितः ॥” ~
सुश्रुतसंहिता
गुस
"रागष।डव--लधुः वरण ( देहवधक ), वृष्य, हृद्य के ठि प्रिय, रोचक, अग्नि दीपकः वृष्णा-मूरछा-भरम वमन ओरं |
श्रम के नाशक हैँ ॥२८३॥
रसाला छ्रंहणौ बल्या स्नग्धा वष्या च रोचनी । ररखाला--चृंहण (देहवधक); वलकारक, स्निग्ध, बृष्य रोचक है ।
स्नेहनं गुडसंयुक्तं हयं दध्यनिरखापहम् ३८१] गुडयुक्त ददी-स्तेहन, हृदय के चि प्रिय ओर वायु नाश्चक है ॥ ३८४] सक्तवः सर्पिषाऽभ्यक्ताः गीतवारिपरिष्डताः ] नातिद्रवा नातिसान्द्रा मन्थ इद्युपदिर्यते ॥३८५॥
- मन्थः सदयोबख्करः पिपासाश्रमना्नः |
मन्थ-- जो के सत्त कोषौ मे मख्लकर, खण्डे पानीमेन तो बहुत पतल ओर न बहुत सान्द्र घने से मन्थ बनता है। यह मन्थ-- सद्यः (तुरन्त) बलकारक, पिपासा-भमनाशक है ॥ साम्छस्नेहगडो मच्रकृच्छोदावतेनाश्ञनः ॥३८६। रकरेणुरसद्राक्षायुक्तः पित्तविकारनुत्। ्राक्षामधूदकयुतः कफरोगनिबदहेणः ॥ २८७1
वगेत्रयेणोपहितो मर्दोषानुरोमनः
यही मन्थ-अम्न (खद्ाई), स्नेह ओर गुड़ के साथ मिल
कर-मघ्रकृच्छ, उदावत्त (वातोदावत्त आदि) नाशक दै।
| अ० ४६ |
शकरा, इष्षुरख ओर द्राक्षा से मिला मन्थ--पित्तरोग नाशक |
्राश्चा ओर मधूक (महूवे) के साथ संयुक्त मन्थ-कफ रोग कौ
नष्ट करता है । तृतीयवगं (अम्-स्तेह ओर गुड) से मिला मन्थमल-मूत्र के दोष (अवरोध) को नष्ट करता हं ॥६८६.३८७॥
गोडमस्लमनम्ं वा पानकं गरु मूत्रम् ॥२८८॥
तदेव खण्डमद्रीका्चकरासहितं पुनः| `
साम्लं सतीदणं सहिमं पानक.स्यान्निरत्ययम् ॥३८९॥
गुड़ से बना--खद्रा या बिना अम्ढ के-पानक (शबत)
गुरु ओर मन्रल रै । यदि इस गुड के शबत में-- खाण्ड)
मृद्रीका, चकरा, अम्क ( इमली आदि ), तीदण (मस्चिादि)
दिम (कषर), मिला दिया जाये तो अवयन्तश्रषठ हो जाता दै ॥
१ रागषाडव-- सितार्चकसिन्धूत्थः सवक्षाम्लपरूषकः ।
जम्बूफल रसैयुक्तो रागो राजिकया कृतः ॥
२ रसाङा-अर्द्धाढकः सुचिरपय्युषितस्य दध्न ।
खण्डस्य षोडरा पलानि शरिप्रभस्य ।
सपिः पठं मधु पकं मरिचं दविकषम्
र॒ण्डयाः पलार्ध॑मपि चाद्धं परु विडस्य ॥
सूक्ष्मे पटे सुविमले मरदुपाणिषष्टा- स कपूरधूकिसुरभीङृतपात्रसंस्था ॥
एषा वृकोदऱृता सरसा रसाला ॥