सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
२१३ :
मादीकं तु श्रमहरं मूर्च्छादाहृत्वापहम् । परुषकाणां कोलानां हृद्यं विष्टुभिं पानकम् ॥३६०॥ मृदीका (किसमिस) से बना शर्बत—श्रमनाशक, मूर्च्छा, दाह, तृपानाशक है। फालसे और बेरों का बना शर्बत—हृदय के लिये प्रिय और विष्टुभि होता है ॥३६०॥ द्रव्यसंयोगसंस्कारं ज्ञात्वा मात्रां च सर्वतः । पानकानां यथायोगं गुरुलाघवमादिशेत् ॥३६१॥ इति कृतान्नवर्गः । सब पानकों में द्रव्यसंयोग तथा संस्कार एवं मात्रा को जानकर—पानकों का गुरुलाघव समझना चाहिये। यह कृता- न्नवर्ग कह दिया ॥३६१॥
अथ भक्ष्यवर्गः ।
वक्ष्याम्यतः परं भक्ष्यान् रसवीर्यविपाकतः । इसके आगे भक्ष्य (लड्डू आदि) वस्तुओं का रस, वीर्य, विपाक कहते हैं ।
भक्ष्याः क्षीरकृता बलया वृष्या हृद्याः सुगन्धितः ॥३६२॥ अदाहितः पुष्टिकरा दीपनाः पित्तनाशनाः । गेहूँ आदि के आटे को दूध में सिद्ध करके बनाये भक्ष्य बलकारक, शुक्लवर्धक, हृदय के लिये प्रिय सुगन्धित, अदाही (ईषद् दाह युक्त), पुष्टिकारक, अग्निदीपक, और पित्तनाशक हैं। वि० मन्तव्य—भक्ष्य वे कहे जाते हैं जो स्वस्थों का आहार हैं। इस प्रकरण में उन्हों का वर्णन किया गया है ॥ तेषां प्राणकरा हृद्या घृतपूराः कफावहाः ॥३६३॥
वातपित्तहारा वृष्या गुरवो रक्तमांसलाः । घृतपूर१—प्राणकारक, हृदय के लिये प्रिय, कफकारक, वात-पित्तनाशक, वृष्य (शुक्ल), गुरु, रक्त और मांस के वर्धक हैं ॥३६३॥
बृंहणा गौडिका भक्ष्या गुरवोऽनिलनाशनाः ॥३६४॥ अदाहितः पित्तहराः शुक्लाः कफवर्धनाः । गौडिक (गुड़ प्रधान) भक्ष्य—बृंहण (देहवर्धक) भक्ष्य, गुरु, वायुनाशक, अदाहि, पित्तनाशक, शुक्ल और कफवर्धक हैं।
मधुशीर्षकसंयावाः पूपा ये ते विशेषतः ॥३६५॥ गुरवो बृंहणाश्चैव मोदकास्तु सुदुर्जराः । रोचनो दीपनः स्वयः पिप्तान्नः पवनापहः ॥३६६॥ मधुमस्तक (मधुशीर्षक), संयाव२ पूपा—गुरु, देहवर्धक है। मोदक (लड्डू)—दुर्जर हैं, रोचन, अग्निदीपक, स्वरभङ्ग के लिये हितकारी, पित्तनाशक, वायु को दूर करते हैं ३६५, ३६६
१ घृतपूर—“महिता समिताः क्षीरा नालिकेरसितादिभिः । अवगाह्य घृते पवने घृतपूरौऽयमुच्यते ॥” २ संयाव—“समितां मधुदुर्घेन माधुर्यत्वात् श्रुभाननः । पचैद् घृतोत्तरे भाण्डे क्षिपेद् भाण्डे नवे ततः । संयावोऽदी यतुर्वृणैः खण्डैलमरिचार्द्रकैः ॥”
गुरुर्मृष्टतरश्चैव सट्टकः प्राणवर्धनः । हृद्याः सुगन्धिमधुरः स्निग्धः कफकरो गुरुः ॥३६७॥ सट्टक१—गुरु, अतिमिष्ठ और प्राणवर्धक हैं। हृदय के लिये प्रिय, सुगन्धित, मधुर, स्निग्ध, कफकारक गुरु हैं ॥३६७॥ वातापहस्तुमिकरो बल्यो विष्यन्दु उच्यते । बृंहणा वातपित्तघ्ना भक्ष्या बलयास्तु सामिताः ॥३६८॥ विष्यन्दि२—वायुनाशक, तृप्तिकारक, बलकारक हैं। सामित (गेहूँ के आटे से बने भक्ष्य)—बृंहण (देहवर्धक), वात- पित्तनाशक, बलकारक हैं ॥३६८॥ हृद्याः पथ्यतमास्तेषां लघवः फेनकादयः । मुदुगादिवेसवाराणां पूर्णा विष्टुभिन्मो मताः ॥३६९॥ फेनकादि३—हृदय के लिये प्रिय, अतिशय पथ्यकारक और लघु हैं। मूत्र आदि धान्य तथा वेसवार से भरे पूप (रोटी, गुडिया, कचौरी आदि) विष्टुभि होते हैं ॥३६९॥ वेसवारैः सपिशितैः संपूर्णा गुरुबृंहणाः । पाल्लाः श्लेष्मजननाः, शष्कुल्यः कफपित्तलाः ॥४००॥ मांसयुक्त वेसवार से भरे पूप-गुरु और देहवर्धक हैं। पाल्ल (तिल पिष्ट एवं गुड़ से बने) कफजनक हैं, शष्कुली (पूरी) कफ- पित्तकारक हैं ॥४००॥ वीर्योष्णाः पौष्टिका भक्ष्याः कफपित्तप्रकोपणाः । विदाहिन्मो नातिबला गुरवश्च विशेषतः ॥४०१॥ पौष्टिक (उड़द की पिठी से बने)—भक्ष्य उष्णवीर्य, कफ- पित्तप्रकोपक, विदाही, ईषद् बल कारक, और खासकर गुरु हैं ॥ वैदला लघवो भक्ष्याः कषायाः सूष्टमास्ताः । विष्टुभिन्मः पित्तसमाः श्लेष्मघ्ना भिन्नवचंसः ॥४०२॥ बलया वृष्यास्तु गुरवो विज्ञेया माषसाधिताः । वैदल (दाल आदि से बने) भक्ष्य—लघुकषायरस, वायु को प्रवृत्त करते हैं। उड़द से बने भक्ष्य—विष्टुभि, पित्त के समान, कफनाशक, मलप्रवर्त्तक (विरेचक), बलकारक, वृष्य एवं गुरु होते हैं ॥४०२॥ कूर्चिकाविकृता भक्ष्या गुरवो नातिपित्तलाः ॥४०३॥ (फटे दूध के जमने से उत्पन्न कूर्चिका से बने) भक्ष्य-गुरु और ईषद् पित्तकारक हैं ॥४०३॥ १ सट्टक—“लवंग व्योषखण्डैस्तु दधि निर्मध्य गालितम् । दाडिर्म बीजसंयुक्तं चन्द्रचूर्णाबिचूर्णितम् । सट्टकं सुप्रमोदाख्यं नलादिभिर्बदाहृतम् ॥” २ विष्यन्द—“आमं गोधूमवृणं च सपिशीरगुणान्वितम् । नातिसान्द्रो नातिघनो विष्यन्दो नाम नामतः ॥” ३ फेनका—“विमर्घ विमलां शुक्लां समितां नातिसार्कराम् । संवेष्टनाय गर्भार्थं खरपाकं घृते पचैत् । फेनक फेनसंकाशं सम्पूर्णं शशिसन्निभम् ॥”