भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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विरूढक_क्ता भ्या गुरबोऽनिख्पित्तखाः ।

विदाहोकक्छेचजनना रूक्षा रष्प्रदूषणा : ॥ ४०४

विरूढक (अंकरुरित) धान्यो से बनाये मद्य गुरुः वायु

पित्तकारक हँ । विदाही, उक्छेश (जीमचलाना); रूक्ष हैं

दृष्टि (आंखों) को दूषित करते हे ।[४०४]।

हयाः सुगन्धिनो मद्या ख्घवो घृतपाचिताः

वातपित्तहरा बल्या वणदृष्टिप्रसाद नाः ॥४०५॥

घी मे तले (संस्कृत) मद्य-हृदय के लिय प्रिय, सुगन्धित,

ल्घु, वात-पित्तनाशक, वलकारक, वण-एवं दृष्टि को स्वच्छ

` करते हे |४०५॥

विदाहिनस्तेरश्ता गुरवः कटपाकिनः

उष्णा मारुतरष्टिघनाः पित्तलास्त्वक्प्रदूषणाः ॥४०६।

तैर मे संस्कृत मद्य-- विदाही, गुरु, कट विपाक, उष्ण

वायुनाद्चक, दष्ट को हानि पर्हैचानेवाटठे, पित्तकारक, त्वचा को

दूषित करनेवाले हें ॥४०६॥

फलमासेल्लविकृतितिख्माषोपसंस्कृताः।

मद्या बल्याश्च गुरवो चर हणा हृदयग्रियाः ४०७]

फल्वग, मांखवग, इत्तुविकार, तिल, माष से संस्कृत मक्ष

बल्कारकर, गुरु, बृंहण (देहवधक) ओर हृदय के द्यि प्रिय हे |

कृपाङाङ्गारपक्तास्तु ख्यवो वातकोपनाः ।

सुपक्रास्तनवञ्चेव भूयिष्ठं रघवो मताः ॥४०८]

कार (मिद्धी के ठीकरे) पर पकाये भद्य- अतिशय रघु

जर वायुकोपक हँ । अच्छी प्रकार से पके भक््य-पतले-फुरके

सूच्चम ओर कषु हं ॥४०८]।

सङ्किखाटादयो सद्या गुरवः कफवधनाः।

कुल्माषा वातला रूक्षा गुरवो भिन्नवचंसः ॥४०€॥ उदावतेहरो वास्यः कासपीनसमेहरुत्‌ । धानोदटुम्बास्तु ख्घश्रः कफमेदोविरोषणाः ॥ ^१०॥

किखार (क्षीर कूर्चिका पिण्ड) के संयोग से बने भ

गुरु ओर कफवधक हं । कुलमाप--वायुक्रारक, रूक्ष, गुर ओर

मठ विरेचक ह । बाटिया--उदावत्तनाशक, कास-पीनख एवं

प्रमेहं के नाशक ई । धान (मूने जा), उलु्वा (होटे)-ल्घु,. कफ

एवं मेद्‌ को शुष्क करते हं ॥४०६,४१०॥

शक्तवो जंहणा व्रृष्यास्ठष्णापित्तकफापहाः

पीताः सद्योवल्करा भेदिनः पवनापहाः ॥४११॥ शक्तु--(-जो आदि ऊ सतत्‌ )देदवधक, इष्य (शुक्रवधंक).

वृष्णा-पित्त ओर कफनाशक दे । पीने पर तरन्त व्र क्ति आती `

मेदि (विरेचक) ओर वायु को नष्ट करते हं ॥४११॥ गुवीं पिण्डी खराऽत्यथ छष्वी सैव विपयंयात्‌।

शक्तूनामाश्च जीयत मृदुत्वादवरहिका॥४१२॥

अत्यन्तः खर (कठिन) पिण्डी - गुर होती ह; -विपयय से

सुश्रतसंहिता

(मृदु) पिण्डी ल्घु ह| सत्तओं की अवलेषिका कोमल हनने से

शीघ्र जीण हो जाती हे ॥४१२॥

लाजार्यंतिसारघ्रा दीपनाः कफनाशनाः

बल्याः कषायमधुरा छषवस्तृण्मखापहाः ॥४१३॥ छाज- (मनने पर चिक धान्य) छर्दि (बमन) ओर अति. खार नाशक, अग्नि दीपक, कफ़ को नष्ट कुरते हं; बलकाख कषाय, मधुर, तृषा ओर मर के नाशक हं ॥४१३॥

तट्यर्दिदाहवमांर्तिनुदस्तरसक्तवो सताः

रक्तपित्तहराश्चेव दाहञ्वरवि नाशनाः ॥४१४॥

लाजखक्तु--तृषा, छर्दि, दाह, घमातिं (ग्म का दुःख)

को नष्ट करते हें | रक्तपित्तनाशक, दाह ज्वरनाशक ह [४१४

पृथुका गुरवः स्निग्धा चर हणाः कफ्वधनाः |

बल्याः सक्षीरभाधात्त वातघ्ना भिन्नवचसः॥४१५॥

पृथुक (चोढे- चूडा गीढे शाछि धान्यां के योड़ासा भून

[ अ०५६

कर ऊखल में कूटने से बनये)- गुर, स्निग्ध देहवधक ओर

कफ़ को वदति हैँ बल कारकहं। दूधमें मिाकर खाने से

वायुनाशक ओर मल का रेचन करते हे .॥४१५॥

` संधानकृत्‌ पिष्टमामं ताण्डुरं कूमिमेदत्‌ ।

धान्यपिष्ट--आम (नया-अपक्व) पीखा धान्य भग्न की

जोडता दै । तण्डल-कृमि ओर प्रमेह को नष्ट करता दै* ।

सुदुजेरः स्वादुरसो च हणस्तण्डरो नवः ॥४१६॥

नया चावल (तण्डुल)- पचने मे दुज॑र, मधुररख ओर

देहवधक हे ||४१६॥ सन्धानकन्मेहहरः पुराणस्तण्डुरः स्खतः

पुराना चावल--मग्न अंग को जोड़ता हे प्रमेह नाराक हे |

यदाकारणमासादयय भोक्तणां छन्दतोऽपि वा ॥४६५॥

मच्यादयः प्रकल्प्या स्युस्तदा सुनिपुणो भिषक्‌ ।

द्रव्यसंयोगसंस्कारविकारान्‌ समवेदय च ।

अनेक द्रव्यो निखोच्छाख्तस्तान्‌ विनिर्दिशेत्‌ ॥४१८॥

इति भक्यवगः।

जिस कारण (दोष रोग प्रतिकार रूपी कारण) से अथव

मोक्ता (खानेवाखों की) इच्छानुसार, भ्य आदि बनाये

हो, उख- मद्य द्रव्य के अनेक द्रव्य उस्त्ति कारण हने ¢

व्य, संयोग, संस्कार एवं विकारो (परिव्त॑नो) को श।ख द

से विचारकर इन भ्य दर्यो के गुणों को कहना चाहिये ॥

अतः सवोनुपानान्युपदेचयामः।

इसके आगे संम्पूणं अनुपानों को (अनन के पीछे पिये जने

वाटी वस्तुओं को) कते ह ° ।

१ यह पाठ कविराज हाराणचन्द्र जी ने नहीं पढ़ा ।

अनुपान का गुण-- ट =.

दोषवद्‌ गुरं वा भुक्तमतिमात्रम्थापि वा । यथोक्तेनानपानेन सुखमन्नं अजीय्यति ॥