भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४१ ]

नालिकैरासवः, प्रसहानामश्वगन्धासवः, पर्णभुगाणां कृष्णगन्धासवः, विलेजयानां फलासवः एकगफानां त्रिफलासवः, अनेकगफानां खदिरासवः, कूलचराणां शृङ्गाटककशे-रुकासवः, कोशावासिनां पादिनां च स एव, प्लवानामिश्वरसासवः, नादेयानां मत्स्यानां मृणालासवः, सामुद्राणां मातुलुङ्गासवः, अम्लानां फलानां पञ्चोत्पलकन्दरासवः, कषायानां दाडिमवैत्रासवः, मधुराणां त्रिकटुकयुक्तखण्डासवः, तालफलादीनां धान्याम्लं, कटुकानां दूर्वनिलवैत्रासवः, पिप्पल्यादीनां श्वदृष्टावसुकासवः, कृष्माण्डादीनां दार्विकरीरासवः, चुरुचुरभूतीनां लोभासवः, जीवन्त्यादीनां त्रिफलासवः, कुसुम्भशाकस्य स एव मण्डूकपर्ण्यादीनां महापञ्चमूलासवः, तालमस्तकादीनामम्लफलासवः, सैन्धवादीनां सुरासव आरनालं च, तौर्यं च सर्वत्रैते ॥४३३॥

प्रथम कहे अत्र समूहो (शूक धान्य, कुषान्य) का अनु-पान-वदाम्ल, वैदलो (मूळ आदि) का धान्याम्ल (कांजी), जंघाल (ऐणादि) और धनवज (वर्त्ताकादि) का पिप्पल्यासव, चिकिरो का—कोलाम्ल (स्वरूप वेर), वदराम्ल (मध्य प्रमाण का वेर), प्रतुदो का क्षीरी वृक्षो (वटादि का) का आसव, गुहा-शयो (सिंहादि) का खजूररासव और नारिकेलासव, प्रसर्हो के लिये अश्वगन्धासव, पर्णभुगो के लिये कृष्णगन्धा (शोभाजन) का आसव, विलेजयो के लिये फलसारासव, एकशफो (बोड़े आदि) के लिये त्रिफलासव, अनेक शफो (बकरी आदि) के लिये खदिरासव, कूलचरो के लिये शृङ्गाटक और कशेरु का आसव, कोशावासि और पादियों के लिये शृङ्गाटक कशेरुका-सव, प्लवो के लिये इक्षुसासव, नादेय मछलियों के लिये मृणालासव, सामुद्र मछलियों के लिये मातुलुंगासव, कषायवर्ग के लिये दाडिम वैत्रासव, मधुरवर्ग के लिये त्रिकटुक युक्त खण्डा-सव, ताल-फल आदि के लिये धान्याम्ल, कटुवर्ग के लिये दूर्वा-नल वैत्रासव, पिप्पल्यादि के लिये श्वदंष्ट्रा (गोलरु), वसुक (बुक-वगहुल) का आसव, कृष्माण्ड आदि के लिये दावी (दारु-हल्दी) करीरासव, चुन्तु आदि के लिये लोभासव, जीवन्ती आदि के लिये त्रिफलासव, कुसुम्भ शाक के लिये त्रिफलासव, मण्डूकपर्णा आदि के लिये महापञ्चमूलासव, तालमस्तक आदि के लिये अम्लफलासव, सैन्धव आदि के लिये सुरासव और आरनाल अनुपान है, सब स्थानों पर जल का भी अनुपान देना चाहिये ॥४३३॥

भवन्ति चात्र—

सर्वेषामनुपानानां माहेन्द्रं तौयमुत्तमम् ।

सान्यं वा यस्य यत्तौर्यं तत्तस्मै हितमुच्यते ॥४३४॥

उष्णं वाते कफे तौर्यं पित्रो रक्ते च शीतलम् ।

कहा भी है—

सब अनुपानों के लिये—माहेन्द्र (आन्तरिक्ष) जल उत्तम

अनुपान है। जो जल (नदी, सरोवर, तड़ाग आदि का) जिस पुरुष को सत्य हो, वही जल उस पुरुष के लिये हितकारी है। वायु और कफ में—गरम जल, पित्त और रक्त में शीतल जल बरतना चाहिये ॥४३४॥

दोषवद् गुरु वा भुक्तमतिमात्रमथापि वा ॥४३५॥

यथोक्तेनानुपानेन सुखमन्तं प्रजीर्यते ।

दोषवत् (वातादि दोषकारक), गुरु, अधिक मात्रा में खाया भोजन, यथोक्त—उचित अनुपान की सहायता से, बिना किसी कष्ट के सुखपूर्वक जीर्ण हो जाता है ॥४३५॥

रोचनं बृंहणं वृष्यं दोषसंघातभेदनम् ॥४३६॥

तर्पणं मार्दवकरं श्रमकलमहरं सुखम् ।

दीपनं दोषशमनं पिपासाच्छेदनं परम् ॥४३७॥

बल्यं वर्णकरं सम्यगनुपानं सद्बोधयेते ।

अनुपान के गुण—रोचक, बृंहण (देहवर्धक), वृष्य (शुक्र-वर्धक), दोषसमूहों का भेदन करता है, तर्पण (तृप्तिकारक) मार्दवकर (शरीर में कोमलता उत्पन्न करनेवाला), श्रम-कलम को दूर करता है, सुख (स्वास्थ्य उत्पन्न करता है)। अग्निदीपक, दोष शामक, पिपासा को नष्ट करने में श्रेष्ठ, बलकारक, वर्ण-कारक है। इस प्रकार का उचित अनुपान सर्वदा व्यवहार करना चाहिये। (आगे अनुपान से जल को समझना, क्योंकि प्रायः जल ही बरता जाता है) ॥४३६, ४३७॥

तदादौ कशयेत्पीतं स्थापयेन्मध्यसेवितम् ॥४३८॥

परचात्पीतं बृंहयति तस्माद्विद्य प्रयोजयेत् ॥

भोजन से पहिले पिया अनुपान शरीर को अति कुश करता है, भोजन के मध्य में सेवन किया अनुपान शरीर को पूर्ववत् रखता है। भोजन के पीछे पिया अनुपान शरीर को बढ़ाता है, इसलिये विचारकर अनुपान का प्रयोग करना चाहिये ॥४३८॥

स्थिरतां गतमकिटन्तमन्नमद्रवपायिनाम् ॥४३९॥

भवत्याबाधजननमनुपानमतः पिवेत् ।

अद्रवपायी (अनुपान न पीनेवाले) मनुष्यों को—स्थिरता (निश्चलता), अकिटन्त (शुष्कता), आबाधजनन (पीड़ा) होती है, इसलिये अनुपान पीना चाहिये। “समस्थूलकृशा भक्तमध्या-न्तप्रथमांनुपाः” हृदय ॥४३९॥

न पिवेच्छासकासातीं रोगे चाप्यूर्ध्वजगुणे ॥४४०॥

क्षतोरस्कः प्रसेकीं च यस्य चोपहतः स्वरः ।

निम्न पुरुषों को अनुपान नहीं पीना चाहिये—

श्वास-कास रोगी, गले से ऊपर के रोगों में, उरः क्षत रोगी, प्रसेकी (लालाखात्री) और जिस रोगी को स्वरभङ्ग हो उसे अनुपान नहीं पीना चाहिये ॥४४०॥

पीत्वाऽध्वभाष्याध्ययनगोस्वप्नान्न शीलयेत् ॥४४१॥

प्रदूष्यामाशयं तद्वि तस्य कण्ठोरसि स्थितम् ।

स्यन्दानिन्सादन्च्छादीनामयाज्ञनयेद्वहून ॥४४२॥