सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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अनुपानपीकर-अध्व (मार्गगमन), भाष्य (जोर से बोलना), अध्ययन (पढ़ना), गेय (गाना), शयन नहीं करना चाहिये। क्योंकि यह अनुपान कण्ठ-उर में स्थित वातादि दोषों को तथा आमाशय को दूषित करके, पुरुष में-स्यन्द (नेत्राभिध्वन्द), अग्निमान्द्य, छर्दन (वमन) आदि बहुत से रोगों को उत्पन्न करता है ॥४४१,४४२॥
गुरुलाघवर्चिन्तेयं स्वभावं नातिवर्तते।
तथा संस्कारमात्रान्नकालांश्चाप्युत्तरोत्तरम् ॥४४३॥
गुरु लाघव विचार—
द्वयो का गुरु-लाघव, स्वभाव (नैसर्गिकता) से ऊपर तथा (यथा जंघाल-जंगल में विचरनेवाले स्वभाव के कारण ही लघु है), संस्कार, मात्रा, अन्न, काल के ऊपर निर्भर है। यथा—संस्कार स्वभाव से गुरु ग्रीहि भी, संस्कार के कारण लांजा रूप में लघु है। मात्रा—गुरु पदार्थों को आधा पेट भर के खाना और लघु पदार्थों को पूरा पेट भर के खाना। अन्न-मण्ड-पेया विलेपी-मक्त-पूपादि यथोत्तर गुरु हैं। काल-नया धात्य अभि ध्वनि और साल भर पुराना अन्न लघु है। उत्तरोत्तर-स्वभाव से संस्कार, संस्कार से मात्रा, मात्रा से अन्न, अन्न से काल, गुरु-लघु के विचार को अतिक्रमण नहीं करते ॥४४३॥
मन्दकर्मोन्तारोग्याः सुकुमाराः सुखोचिताः।
जन्तवो ये तु तेषां हि चिन्तेयं परिकीर्यते ॥४४४॥
जो पुरुष—मन्दकर्म (आलसी), मन्दानल (मन्दान्ति), मन्दारोग्य (रोगी), सुकुमार (मृदुशरीर), सुखोचित (सुखी) हैं—उनके विषय में गुरु लघु का विचार करना आवश्यक है ॥
बलिनः खरभदया ये ये च दीमाग्रनयो नराः।
कर्मनित्याश्च ये तेषां नावरश्यं परिकीर्यते ॥४४५॥
इत्यनुपानवर्गः।
जो पुरुष-बलो (शक्तिशाली), खरभदय (अमृदुभोजी), दीमाग्नि (तीक्ष्णान्ति) और कर्मनित्य (सदा कर्म करनेवाले हैं), उनके विषय में गुरु-लघु का विचार करना आवश्यक नहीं ॥ यह सर्व अनुपान वर्ग कह दिया—
अथाहारविधिं वत्स ! विस्त्रेणाखिलं शृणु ।
आत्मास्थितमसंकीर्णं शुचिं कार्यं महानसम् ॥४४६॥
हे वत्स ! सम्पूर्ण आहार विधि को अब विस्तार से कहता हूँ—उसे सुनो। महानस (रसोई)—आत्मास्थित (विश्वस्त पुरुषों से युक्त), असंकीर्ण (असंकट-खुली-छोटी नहीं), शुचि (पवित्र-साफ सुथरी) रसोई बनानी चाहिये ॥४४६॥
१—चरक में संस्कार के लिये—संस्कारो हि गुणात्तराधान-मुच्यते। ते गुणास्तोयान्सविकर्षशीब्रमस्थनदेशकालवासनादिभिः कालप्रकर्षभाजनादिभिश्चाधीयन्ते। चरक० विमाने अ० १।
तत्रातिर्गुणसंपन्नं भदयमन्नं सुसंस्कृतम्।
शुचौ देशे सुसंगुर्म समुपस्थापयेद् भिषक् ॥४४७॥
इस रसोई में विश्वस्त पुरुषों द्वारा सुसंस्कृत (भली प्रकार से तैयार किये), गुण सम्पन्न (इष्ट-रस, गन्ध, स्पर्श-वर्णयुक्त), भदय (खाने योग्य) अन्न को, पवित्र स्थान में भली प्रकार छिपाकर (शुद्ध आदि जहाँ न जा सके), वैद्य को रखना चाहिये ॥
विषद्वैतैरगदैः स्पृष्टं प्रोक्षितं व्यजनोदकैः।
सिद्धैर्मन्त्रैर्हतविषं सिद्धमन्नं निवेद्येत् ॥४४८॥
विषद्वैत (विष नाशक) औषधियों से स्पृष्ट (छुए) व्यजनोदक प्रोक्षित (विषनाशक अगदोदक से धोये पंखों को वायु से शुद्ध किये अथवा, अथर्ववेद के मन्त्रों से अभिमन्त्रित), सिद्ध, मन्त्र (अभ्यभिचारि, कुछ कुक्का आदि मन्त्रों द्वारा)—विष को नष्ट करके, सिद्ध (तथ्यार), भोजन खानेवाले को समर्पित करना चाहिये ॥४४८॥
वद्याम्यतः परं कृत्स्नामाहारस्योपकल्पनाम्।
घृतं काष्णायसे दैयं, पेया देया तु राजते ॥४४९॥
फलाणि सर्वभदयांश्च प्रव्याह्विद्वेत्तु ।
परिशुष्कप्रदिग्धानि सौषर्णं प्रकल्पयेत् ॥४५०॥
प्रद्रवाणि रसांश्चैव राजतेपूषहारयेत्।
कट्वराणि खडांश्चैव सर्वांछलेषु दापयेत् ॥४५१॥
दद्यात्ताम्रमये पात्रे सुजीतं सुभृतं पयः।
पानीयं पानकं मद्यं मृन्मयेषु प्रदापयेत् ॥४५२॥
काचस्फटिकपात्रेषु जीतलेषु शुभेषु च।
दद्याह्विद्वैर्द्युचित्रेषु रागाषाडवसट्टकान् ॥४५३॥
पुरस्ताद्विमले पात्रे सुविस्तीर्णं मनोरमे।
सूदः सूपौदनं दद्यात् प्रदेहांश्च सुसंस्कृतान् ॥४५४॥
फलाणि सर्वभदयांश्च परिशुष्काणि यानि च।
तानि दक्षिणपार्श्वं तु सुज्ञानस्योपकल्पयेत् ॥४५५॥
प्रद्रवाणि रसांश्चैव पानीयं पानकं पयः।
खडान् यूषांश्च पेयांश्च सन्त्ये पाश्चं प्रदापयेत् ॥४५६॥
सर्वान् गुडविकारांश्च रागाषाडवसट्टकान्।
पुरस्तात् स्थापयेत् प्राहो द्वयोरपि च मध्यतः ॥४५७॥
इसके आगे सम्पूर्ण भोजन को परोसने की विधि कहता हूँ। घी को कुष्णलोह के पात्र में, सब प्रकार की पेया राजत पात्र में, फल और लड्डू आदि सब प्रकार के भदय पदार्थ-पत्तों की पतली या दोनों में देने चाहिये। परिशुष्क और प्रदिग्ध (दही या तक में मिला) मांस को स्वर्ण
१ दुन्दुभिस्क्नीय अध्याय में कही विधि से—विष रहित करके देना चाहिये।
२ परिशुष्क मांस—
“सिक्तां बहुमृतं भृष्टं मुहुर्गुणाम्बुना मृदु।
जीरकाद्यैर्वर्णं मांसं परिशुष्कं तदुच्यते ॥”
प्रदिग्ध मांस—तदैव गोरसादानं प्रदिग्धमिति विश्रुतम्।