भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४६ ]

के पात्रों में देना चाहिये। प्रदवाणि (अतिशय द्रव-मण्डादि) और रसों (मांस रसों) को-चाँदी के पात्रों में देना चाहिये। कट्वर१ (तक्र), और खड् यूरों को पत्थर के बर्तनों में देना चाहिये। भली प्रकार उवालकर ठण्डा किया दूध-ताम्र के पात्र में देना चाहिए। पानी, पानक और मद्य इनको मिट्टी के पात्रों में देना चाहिये। राग, पाङ्ग, सट्क का कांच, स्फटिक के भण्ड एवं शीतल पात्रों में, वैङ्ग्य (बिल्लौर) के विचित्र पात्रों में देना चाहिये। पूर्वोक्त-विमल एवं खूब फैले (चौड़े), सुन्दर (स्थाली आदि) पात्रों में रसोद्ये—दाल चावल और अच्छी प्रकार से तैय्यार किये प्रलेहों (चाटने योग्य वस्तुओं) को दें। फल सब भक्ष्य (लड्डू आदि), और परिशुष्क वस्तुओं को खानेवाले के दक्षिण पार्श्व में रखना चाहिये। गुड से बनी सब वस्तुओं को, राग, पाङ्ग, सट्क को सामने में अथवा किसी एक पार्श्व में, (जहाँ उचित समझे) रखना चाहिये ॥४४८-४१७॥

एवं विज्ञाय मतिमान् भोजनस्योपकल्पनाम् ।

भोक्ताः विजने रम्ये निःसंपाते शुभे शुचौ ॥४५८॥

सुगन्धयुष्परचिते समे देशे च भोजयेत् ।

बुद्धिमान् मनुष्य उपरोक्त प्रकार से भोजन के परोसने की विधि को जानकर—भोजन करनेवाले मनुष्य को, विजन (एकान्त) में, रम्य (मनोहर), निःसंपात (खुले-विस्तार युक्त), शुभ एवं पवित्र, सुगन्धित फूलों से शोभित, समतल स्थान में बिठाकर भोजन कराये ॥४५८॥

विशिष्टमिष्टसंस्कारः पथ्यैरिष्टै रसादिभिः ॥४५९॥

मनोर्ज्ञ शुचि नात्युष्णं प्रत्यग्रगमनं हितम् ।

इष्ट संस्कार (वाञ्छित-कल्पनाविधि) से बने, हितकारी-प्रिय रस-गन्ध-वर्ण से युक्त, मनोर्ज्ञ (सुन्दर), शुचि (पवित्र), बहुत गरम नहीं (थोड़ा गरम), प्रत्यग्र (अभिनव), अशन (भोजन) करना चाहिये ॥४५९॥

पूर्वं मधुरमरुनीयान्मध्यैऽन्मलवणौ रसौ ॥४६०॥

पश्चाच्छेषान् रसान् वैद्यो भोजनेष्ववचारयेत् ।

आदौ फलानि सुञ्जीत द्राडिमादीनि बुद्धिमान् ॥४६१॥

ततः पेयैस्ततो भोज्यान् भदयाश्चित्रैस्ततः परम् ।

घनं पूर्व समरुनीयात्, केचिदाहुर्विपर्ययम् ॥४६२॥

१ कट्वर—“सीवाराम्मथात्मलं काञ्चिकं कट्वरं विदुः ।

तदघो भागं तक्रं वा हम्मलां गतम् ।

सन्तेहं दधिजं तक्रमाहूरये तु कट्वरम् ॥”

राग—“सितारुचक सिन्धुत्यः सवृश्चाम्लपृषकः ।

जम्बूफलरसैर्युक्तो रागो राजकिया कृतः ॥”

सट्क—“लवंगं व्योषखण्डैस्त दधि-तिर्मध्यं गालितम् ।

दाडिम्बीजसंयुक्तं चण्डचूर्णावर्चणितम् ।

सट्कं तत्प्रभोदास्थं नलादिभिर्वदाहृतम् ॥”

आदावन्ते च मध्ये च भोजनस्य तु ग्रह्यते ।

निरस्त्ययं दोषहर् फलेष्वाभलकं नृणाम् ॥४६३॥

मृणालविसशालूककन्देक्षुप्रभृतीनि च ।

पूर्वं योज्यानि भिषजा न तु मुञ्क्ते कदाचन ॥४६४॥

भोजनों में सब से पूर्व मधुररस खाना चाहिये (जिससे पक्वाशय गत वायु का ह्रास हो), अम्ल और लवणरस को भोजनों के मध्य में खाना चाहिये (जिससे पिचाशय में अग्नि प्रदीप्त हो), शेष कट्वादि रसों को अन्त में (कफ की शान्ति के लिये) खाना चाहिये। बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि सब से प्रथम द्राडिम (अनार) आदि-अम्ल फलों को खाये (जिससे कि वायु शान्त हो)। इसके पीछे पीने योग्य पेय वस्तुओं को खाना चाहिये, फिर नाना प्रकार के मध्य-भोजनों (दाङ् चावल आदि) को खाना चाहिये। प्रथम घन (कठिन) भोजन खाना चाहिये, कई आचार्य कहते हैं कि इसके विपरीत प्रथम द्रव भोजन करना चाहिये। भोजन के आदि में, मध्य में और अन्त में, आँबला-फल दोषहर होने से, बिना किसी रुकावट के बरता जा सकता है। मृणाल (पद्मनाल), विष (भिष), शालूक, कन्द, गन्धे आदि वस्तुओं को भोजन से पूर्व देना चाहिये, भोजन के उपरान्त कभी भी नहीं देना चाहिये ॥४६०-४६४॥

सुखमुच्यैः समासीनः समदेहोऽन्नतत्परः ।

काले सात्त्व्यं लघु स्निग्धमुष्णं क्षिप्रं द्रवोत्तरम् ॥४६५॥

बुभुक्षितोऽन्नमरुनीयान्मात्रावद्धिदितागमः

सुख पूर्वक, मूर्मि से ऊँचाई पर-शरीर को (शिर-ग्रीवा और पोट को) समान रखकर, भोजन में तत्पर (कामादि व्यथता को छोड़कर), होकर उचित समय पर, अपनी आत्मा के अनुकूल, लघु, स्निग्ध, जल्दी (न कि बहुत जल्दी) और उष्ण द्रवप्रधान भोजन करना चाहिये। हेय उपादेय सम्बन्धि हितार्हित की विवेचना करनेवाला—भूख होने पर, मात्रा के परिमाण में भोजन करे ॥४६५॥

१ चरक में भोजन विधि—विमान स्थान में—“उष्णं स्निग्धं मात्रावज्जोर्णं वीर्याबिन्दुमिष्टे देशे इष्टसर्वापकरणे नातिदुर्लं नाति-विलम्बितं तन्मना भुञ्जीत ।”

सच्ची भूख में भोजन करना चाहिये—कहा भी है “भवत्य-कालेऽपि या बुभुक्षा सा मन्दबुद्धिं विषवलिहति ।”

मात्रा का लक्षण—

“अपीडनं भवेत्कुक्षेः पाश्चैयोरविपाटनम् ।

अनेन हृदयाबाधो जठरस्य न गौरवम् ॥

प्राणनं चक्षुरादीनां शमनं क्षुत्पिपासयोः ।

उच्छ्वासास्रवासाह्वासादिकथाम् सुखवर्तनम् ।

सुखेन परिणामः स्यादने भुक्ते दिवानिशि ।”