सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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वृत्तस्थानम्
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काले प्रीणयते भुक्तं सात्त्व्यमन्नं न वाधते ॥४६॥ लघु शीघ्रं व्रजेत् पाकं स्निग्धोष्णं बलवद्भिदम् । क्षिप्रं भुक्तं समं पाकं यात्यदोषं द्रवोत्तरम् ॥४६॥ सुखं जीरयति मात्रावद्वातुसाभ्यं करोति च ।
समय पर खाया भोजन तृप्ति को करता है, सात्त्व्य (अग्नी आत्मा के अनुकूल) अन्न शरीर को पीड़ा नहीं पहुँचाता। लघु अन्न शीघ्र जीर्ण होता है, स्निग्ध और उष्ण अन्न, बल एवं अग्नि को बढ़ाता है। न तो बहुत जल्दी और न रुक-रुककर खाया अन्न एक साथ जीर्ण (पचता) होता है, द्रव-प्राधान भोजन दोषों को कुपित नहीं करता। मात्रा में खाया अन्न भली प्रकार यिना किसी कष्ट के पच जाता है और धातुओं को समान करता है ॥४६६,४६७॥
अतीवायतयामस्तु क्षपा येष्टुतुषु स्मृताः ॥४६८॥ तेषु तत्प्रत्यनीकाद्व्यं भुञ्जीत प्रातरेव तु ।
जिन ऋतुओं में (हेमन्त और शिशिर में) रात्रियाँ बहुत लम्बे प्रहरोंवाली होती हैं, उनमें काल बल प्रवृत्त दोषों के विरोधी गुण बहुत भोजन-प्रातः ही (चौथे प्रहर में, शीघ्र) कर लेना चाहिये ॥४६८॥
येषु चापि भवेयुश्च दिवसा भृशमायताः ॥४६९॥ तेषु तत्कालविहितमपराह्ने प्रसश्यते ।
जिन ऋतुओं में ( ग्रीष्म और प्रावृट् ) दिन बहुत लम्बे हो जाते हैं, उन ऋतुओं में कालोचित द्रव-स्निग्ध-मधुर प्राय अन्न अपराह्ने में भी खाना चाहिये ॥४६९॥
रजन्यो दिवसाश्चैव येषु चापि समाः स्मृताः ॥४७०॥ कृत्वा सममहोरात्रं तेषु भुञ्जीत भोजनम् ।
जिन ऋतुओं में ( शरद और वसन्त ) में रात और दिन बराबर हो जाते हैं, उन ऋतुओं में दिन रात को बराबर करके समय पर भोजन करना चाहिये।
ये नियम ऋतु अलक्षित काल के लिये हैं। आवस्थिक के नियम स्वस्थ वृत्ताध्याय में कहेंगे ॥४७०॥
नाप्राप्तातीतकालं वा हीनाधिकमथापि वा ॥४७१॥ अप्राप्तकालं भुञ्जानः शरीरे ह्यलघौ नरः ।
तांस्तान् व्याधानंवाप्रीतिं मरणं वा नियच्छति ॥४७२॥ अतीतकालं भुञ्जानो वायुनोपहतेऽनले ।
कुरुच्छाद्विपच्यते भुक्तं द्वितीयं च न काङ्क्षति ॥४७३॥ हीनमात्रमसंतोषं करोति च बलक्षयम् ।
आलस्यगौरवाटोषसादांश्च कुरुतेऽधिकम् ॥४७४॥ अप्राप्त काल (भोजन बेला के न आने पर) में अतीतकाल
में (भोजन का समय व्यतीत हो जाने पर), हीन मात्रा अथवा अधिक मात्रा में भोजन नहीं करना चाहिये। कारण-शरीर में भारीपन रहने पर अप्राप्तकाल में भोजन करने से शिरोवेदना आदि अनेक रोग अथवा मृत्यु हो जाती है। अतीतकाल में भोजन न करने पर, वायु के कारण अग्नि के मन्द पड़ जाने से, भोजन कठिनाई से पचता है, और दूसरे भोजन की फिर
इच्छा नहीं होती। भोजन की हीन मात्रा असन्तोष और बल का क्षय करती है। भोजन की अधिक मात्रा आलस्य, गौरव (भारीपन), आटोष (आधमान), साद (अज्ञों में शिथिलता) उत्पन्न करती है ॥४७१-४७४॥
तस्मात् सुसंस्कृतं युक्त्या दोषैरेतैर्विजितम् । यथोक्तगुणसंपन्नमुपसेवेत भोजनम् ॥४७५॥ विभज्य दोषकालादीन् कालयोःसभ्योपि । अचोक्षं दुष्टमुत्सृष्टं पाषाणवृणलोष्टवत् ॥४७६॥ द्विष्टं व्युपितमस्वादु पूर्ति चात्रं विवर्जयेत् । चिरसिद्धं स्थिरं शीतमन्तमुष्णीकृतं पुनः ॥४७७॥ अशान्तमुपदग्धं च तथा स्वादु न लक्ष्यते ।
इसलिये युक्ति पूर्वक—सधु रीति से संस्कृत (तैय्यार किये) एवं उपरोक्त दोषों से रहित तथा पूर्वोक्त गुण से युक्त अन्न दोनों समय खाना चाहिये। जो अचोक्ष (अपवित्र-मलिन), विषादि से दुष्ट, उत्सृष्ट, (खाने से बचा हुआ), द्विष्ट (मन के प्रतिकूल), व्युपित (बासी सड़ा), अस्वादु (स्वाद रहित), पूर्ति (दुर्गन्धयुक्त) चिर सिद्ध (देर का पकाया), स्थिर (कठोर), शीत (ठण्डा), पुनः गरम किया, अशान्त (बहुत उष्ण—जिसकी बाष्प शान्त नहीं हुई), उपदग्ध (जला हुआ) और जो अन्न स्वादु नहीं दीखता—तथा पत्थर तृण और मिट्टी के कणों से युक्त हो छोड़ देना चाहिये ॥४७७॥
यद्यत् स्वादुतरं तत्तद्विदध्यादुत्तरोत्तरम् ॥४७८॥
जो वस्तु अधिक स्वादु हो (खाने में स्वादिष्ट हो) उससे अधिक स्वादिष्ट वस्तु उत्तरोत्तर देनी चाहिये। एक स्वादु वस्तु खाने पर, दूसरी बार उससे अधिक स्वादु वस्तु देनी चाहिये, तीसरी बार उससे भी अधिक स्वादिष्ट वस्तु देनी चाहिये ॥४७८॥
प्रक्षालयेदद्भिरास्यं भुञ्जानस्य मुहुर्मुहुः । विशुद्धे रसने तस्य रोचतेऽन्नमपूर्ववत् ॥४७९॥
स्वादुना तस्य रसन् प्रथमेनाविपतितम् । न तथा स्वादयेदन्मत्समात् प्रक्षाल्यमन्तरा ॥४८०॥
भोजन करते हुए बार बार पानी से मुख धोना (गरारे करनी) चाहिये। ऐसा करने से जिह्वा के शुद्ध होने पर भोजन अपूर्व (नया ही) के समान प्रिय लगता है। प्रथम मधुर वस्तु के कारण जिह्वा अत्यन्त तृप्त सी हो जाती है, इसलिये अन्य वस्तु अच्छी नहीं लगती, अतः बीच में मुख को धोना चाहिये ॥
सौमनर्यं बलं पुष्टिमृत्साहं हर्षणं सुखम् । स्वादु संजनयत्यन्तमस्वादु च विपर्ययम् ॥४८१॥
भुक्त्वाऽपि यत् प्रार्थयते भूयस्तत् स्वादु भोजनम् । स्वादु अन्न—सौमनस्य (सुमनस्कता), बल (ओज), पुष्टि (शरीर की बृद्धि), उत्साह, हर्षण (प्रसन्नता), सुख (नीरोगता), को उत्पन्न करता है। अस्वादु अन्न-इनसे विपरीत गुणों को