भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४९ ]

उत्पन्न करता है। भोजन करनेवाला पुरुष जिस भोजन को एक बार खाकर फिर फिर मांगता है, उसको अवश्य स्वादु समझना चाहिये ॥४८१॥

अशित्थोदकं युक्त्या भुञ्जानश्चान्तरा पिबेत् ॥४८२॥ भोजन करनेवाले पुरुष को चाहिये कि—भोजन करके, पीछे से पानी को मात्रा में पीये ॥४८२॥

दन्तान्तरगतं चान्नं शोधनेनाहरेच्छनैः।

कुर्याद्दिनिह्वं तद्वि मुखस्थानिष्टगन्धताम् ॥४८३॥

भोजन के उपरान्त दांतों में फँसे अन्न को तिनके आदि से बाहर निकाल दे। क्योंकि न निकालने पर मुख में यह अन्न दुर्गन्ध उत्पन्न करता है ॥४८३॥

जीर्णोऽन्ने वर्धते वायुर्विदग्धे पित्तमेव तु।

भुक्तमात्रे कफश्चापि, तस्माद्भुक्तेरितं कफम् ॥४८४॥

भोजन के जीर्ण (पचने) होने पर वायु बढ़ती है, भोजन के विदग्ध (अर्ध पक) अवस्था में पित्त बढ़ता है, भोजन के उपरान्त कफ बढ़ता है ॥४८४॥

धूमेनापोहा हृवैर्वा कषायकटुतिक्तैः

पूरगङ्गोल्कपूररलवङ्गसुमनः फलेः ॥४८५॥

फलेः कटुकषायैर्वा मुखवैशद्यकारकैः।

ताम्बूलपत्रसहितैः सुगन्धैर्वा विचक्षणः ॥४८६॥

इसलिये भोजन के द्वारा प्रेरित कफ को धूमपान के द्वारा अथवा कषाय-कटु तिक्त रसवाले, हृदय के लिये प्रिय द्रव्यों द्वारा या—पूर (सुगारी), कंकोल (झीतल चीनी), कपूर, लौंग, सुमनफल (जायफल-जावित्री) से तथा मुख को स्वच्छ करनेवाले कषाय, एवं कटु रस युक्त फलों के द्वारा अथवा ताम्बूलपत्र (पान) में सुगन्धित वस्तुयें मिलाकर खाने से नष्ट करना चाहिये ॥

भुक्त्वा राजवदासीत यावदन्नकलमो गतः।

ततः पादशतं गत्वा वामपार्श्वेन संविशेत् ॥४८७॥

भोजन करने के उपरान्त—जब तक भोजन जन्म भ्रम दूर न हो जाये, तबतक राजासन (भद्रासन१) से बैठना चाहिये। इसके पीछे सौ पांव चलकर वाम पार्श्व से लेटना चाहिये एक मुहूर्त (४८ मिनट) आराम जरूर लेना चाहिये ॥४८७॥

शब्दान् रूपान् रसान् गन्धान् स्पर्शाश्च मनसः प्रियान्।

भुक्त्वातुपसेवेत तेनान्नं साधु तिष्ठति ॥४८८॥

भोजन करने के पीछे मन के अनुकूल शब्दों स्पर्शों रूपों

रसों और गन्धों का सेवन करना चाहिये। इस प्रकार से अन्न भली प्रकार से पचता है ॥४८८॥

अङ्गदूरपरसा गन्धाः स्पर्शाश्चापि जुगुप्सिताः।

अशुच्यन्नं तथा भुक्तमतिहास्यं च वामयेत् ॥४८९॥

जुगुप्सित (निन्दित-अप्रिय)—शब्दों, रूपों, रसों, गन्धों और स्पर्शों का सेवन से अपवित्र अन्न के खाने से, अति भोजन से, तथा अतिहास्य के कारण भोजन का वमन हो जाता है ॥४८९॥

अयनं चासनं वाऽपि नेच्छेद्वापि द्रवोत्तरम्।

नाग्न्यातपौ न प्लवन् न यानं नापि वाहनम् ॥४९०॥

भोजन करने के उपरान्त न तो अधिक देर लेटना-खाना चाहिये, न बैठना चाहिये, और न बहुत पानी पीना चाहिये (द्रव बहुत भोजन नहीं करना चाहिये)।

न तो अग्नि, न धूप, सेवन करनी चाहिये। न स्नान (जल में तैरना उछलना कुदना), न गमन (तेज या दूर चलना) और न घोड़े आदि की सवारी करनी चाहिये ॥४९०॥

न चैकरससेवायां प्रसज्येत कदाचन।

शाकावरान्नभूयिष्ठमम्लं च न समाचरेत् ॥४९१॥

कभी भी एक ही रस का निरन्तर (अथवा बार-बार) अभ्यास—सेवन नहीं करना चाहिये। शाक (पत्र-पुष्पादि) अवरान्न (वेणुयवादि) तथा अम्ल रस को अधिक मात्रा में सेवन नहीं करना चाहिये। 'एकरसाभ्यासो दौर्बल्यकरणात्'—चरक ॥४९१॥

एकैकसाःसमस्तान् वा नाध्यश्नीयाद्वास्नान् सदा।

प्राग्भुक्ते त्वविविकतेऽन्तो द्विरन्तं न समाचरेत् ॥४९२॥

पूर्वभुक्ते विद्ग्धेऽन्ने भुञ्जानो हन्ति पावकम्।

एक एक रस को पृथक् पृथक् करके अथवा सब रसों को एक साथ में मिलाकर भोजन नहीं करना चाहिये। अपितु कुछ रसों को पृथक् पृथक् करके और कुछों को मिलाकर खाना चाहिये। दोष और रोग की अपेक्षा से एक एक रस का और स्वस्थ की अपेक्षा से सब मिलित रसों का निषेध है। प्रातः या पूर्व भोजन करने के उपरान्त जब तक अग्नि स्पष्ट न हो (भूख न लगे), तब तक दूसरी बार किया भोजन जठराग्नि की मन्द (नष्ट) कर देता है ॥४९२॥

मात्रागुहं परिहरेदोहारं द्रव्यतश्च यः ॥४९३॥

पिधान्नं नैव मुक्त्वाति मात्रया वा बुभुक्षितः।

द्विगुणं च पिबेत्तोर्यं सुखं सम्यक् प्रजीयति।

जो द्रव्य लघु हैं (मूत्र आदि हैं) उनको मात्रा से (अधिक मात्रा में) छोड़ देना है, और जो द्रव्य स्वभाव से गुह (मात्रा आदि) हैं उनको वैसे ही अधिक नहीं खाना चाहिये।

पिधान्न (संस्कार जन्म गुह मात्रा का द्योतक) की कभी नहीं खाना चाहिये। यदि खाना हो तो मात्रा में

१ भद्रासन—

“सीमन्याः पार्श्वयोर्न्यस्येद् गुल्फयुग्मं सुनिश्चलम्।

बृषणाऽष्वः पादपाणिं पाणिभ्यां परिवन्धयेत्।

भद्रासनसमुद्दिष्टम्।” नृपासनमेतद् भद्रासनम् ॥

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