सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सूत्रस्थानम्
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तथा भूख लगने पर ही खाना चाहिये१ । इसको खाकर दुगुना पानी पीना चाहिये, इससे सुखपूर्वक पाचन हो जाता है ।
पेयलेहाद्यभक्ष्याणां गुरु विद्याद्यथोत्तरम् ॥४६४॥
चार प्रकार के अन्न में (पेय, लेह्य आद्य-खाद्य और भक्ष्य) उत्तरोत्तर प्रकार का अन्न गुरु समझना चाहिये । यथा-पेय-जहादि से लेह्य-मध्यादि, लेह्य से खाद्य (चावल आदि), खाद्य से भक्ष्य (लड्डू आदि) गुरु हैं ॥४६४॥
गुरुणामधसौहित्यं लघूनां तृप्तिरिष्यते ।
द्रवोत्तरो द्रवश्चापि न मात्रागुरुरिष्यते ॥४६५॥
द्रवाद्यथमपि शुष्कं तु सम्यगेवोपपद्यते ।
जो पदार्थ स्वभाव से या संस्कार के कारण गुरु हैं, उनको आधी मात्रा में (आधे पेट-भूख रखकर) खाना चाहिये । और जो पदार्थ लघु हैं, उनको तृप्ति (थोड़ी भूख रखकर—ईषत् तृप्ति) तक खाना चाहिये । द्रवोत्तर (द्रव बहुल-तत्कादि) और द्रव (पेयादि) का भी अधिक मात्रा में सेवन करना ठीक नहीं, जो पदार्थ शुष्क हैं, वे भी द्रव बहुल होने पर बिना दोष उत्पन्न किये भली प्रकार से पच जाते हैं । क्योंकि पानी का पाचन बृहदन्न में होने से सम्पूर्ण अन्न प्रणाली को धोता जाता है ॥४६५॥
विशुष्कमन्नमभ्यस्तं न पाकं साधु गच्छति ॥४६६॥
पिण्डीकृतसंसंकिलन्नं विदाहमुपगच्छति ।
विशुष्क (सूखा) अन्न सेवन करने पर भली प्रकार से जीर्ण नहीं होता । अपितु असंकिलन्न (ठीक प्रकार से गीला न होकर) एक गोल खा बनकर विदग्ध हो जाता है (आधा कच्चा-पका रह जाता है) ॥४६६॥
स्रोतस्यन्नवहे पित्तं पत्तो वा यस्य तिष्ठति ॥४६७॥
विदाहि शुक्तमन्यद्वा तस्याप्यन्नं विदह्यते ।
जिस समय पित्त अन्नवह स्रोतस् (अन्न) में तथा (अग्नि स्थान) में रुक जाता है, उस समय विदाही अन्न तथा अविदाही भोजन सब विदग्ध हो जाता है ॥४६७॥
शुष्कं विरुद्धं विष्टभिम् वह्नियपादमावहेत् ॥४६८॥
शुष्क (मुष्टान्नादि), विरुद्ध, (दूध, मछली आदि), विष्टभिम् (चना मसूर आदि) अन्न अग्नि दोष को उत्पन्न करते हैं ॥४६८॥
आमं विदग्धं विष्टब्धं कफपित्तानिलैस्त्रिभिः ।
अजीर्णं केचिद्विच्छन्ति चतुर्थं रसशेषतः ॥४६९॥
१ चरक में भी कहा है—
गुरुपिष्टमयं द्रव्यं तण्डुलान् पृथुकानपि ।
न जातु मुक्तवान् खादेत्सामां खादेद् बुभुक्षितः ॥
आहारमात्रा पुनः अग्निबलापेक्षिणी द्रव्यापेक्षयाच ।
त्रिभागं सौहित्यमधसौहित्यं वा गुरुणामुपविश्यते ॥
चरक०
कफ, पित्त और वायु के कारण, आम अजीर्ण, विदग्ध अजीर्ण और विष्टब्ध अजीर्ण—इन तीन प्रकारों के अजीर्ण होते हैं । कई आचार्य आहार के परिपाक से शेष बचे रस का परिपाचन के कारण उत्पन्न चौथे प्रकार का भी अजीर्ण मानते हैं ।
अत्यन्तमुपानाद्विषमाशनाद्वा
संधारणात् स्वप्नविपर्ययाच्च ।
कालेऽपि सात्स्यं लघु चापि युक्तः
मन्नं न पाकं भजते नरस्य ॥१००॥
ईष्याभयक्रोधपरिक्षितेन
लुब्ध्वेन युगदैन्यनिपीडितेन ।
प्रह्वेषयुक्तेन च सेऽभ्यमान-
मन्नं न सम्यक् परिणाममेति ॥१०१॥
अजीर्ण का कारण—अधिक पानी पीने से, विषमाशन (विषमाशन का लक्षण आगे कहेंगे), मूत्र पूर्ण के उपस्थित वेगों को रोकने से, स्वप्न के विपर्यय (दिन में सोना रात में जागने) से ठीक समय पर और उचित (आत्मा के अनुकूल) एवं लघु (स्निग्ध, उष्णादि) भोजन भी ठाक प्रकार से जाँच नहीं होता । इसी प्रकार ईष्या (दूसरे की सुख-समिति में असहिष्णुता), भय क्रोध से युक्त मनवाले, लालची (लामयुक्त), शुक्र (शोक), दैन्य (दानता) से युक्त मनवाले पुरुष का अन्न भली प्रकार से जीर्ण नहीं होता ॥१००, १०१॥
माधुर्यमन्नं गतमाससन्नं,
विदग्धसन्नं गतमन्मत्तमावम् ।
किंचिद्विष्टकं भूशतोद्गूलं
विष्टब्धमानद्ग्विरुद्धवातम् ॥१०२॥
कफ के प्रभाव से जब अन्न में मधुरता उत्पन्न हो जाती है, तब उसका नाम 'आम' होता है । पित्त के कारण जब अम्लता उत्पन्न हो जाती है, तब इसकी संज्ञा 'विदग्ध' होती है । वायु के कारण जब भोजन कुछ पक जाता है और कुछ कच्चा रह जाता है, बहुत पीड़ा एवं शूल होता है, वायु विशेष रूप में रुक जाता है या प्रवृत्त नहीं होता, तब इसकी संज्ञा 'विष्टब्ध' होती है१ । तीन प्रकार के अजीर्ण हैं—आमाजीर्ण, विदग्धाजीर्ण तथा विष्टब्धाजीर्ण ॥१०२॥
उद्गारशुद्धावपि भक्तकाङ्क्षा
न जायते हृद्गुरुता च यस्य ।
रसावशेषेण तु सप्रसक्तं
चतुर्थमेतत् प्रवदन्त्यजीर्णम् ॥१०३॥
उद्गार (डकार) के शुद्ध होने पर भी भोजन की इच्छा न हो, हृदय प्रदेश पर भारीपन हो, तथा सुख से लालासाव हो तो इसको रसावशेष जन्म चौथे प्रकार का अजीर्ण कहते हैं ।
१ कफ कार्य—गौरव, स्नेह, कण्ठ आदि पित्तकार्य—तिक्त अम्लोद्गार आदि, वात कार्य—जुम्भा, श्रंगसर्द आदि का भी उपलक्षण करना चाहिये ।