सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४६ ]
मूर्च्छा प्रलापो वमशुः प्रसेकः सदनं भ्रमः । उपद्रवा भवन्त्येते सरणं चाप्यजीर्णतः ॥५०४॥ अजीर्णं के उपद्रव—
मूर्च्छा ( चेतना नाश ), प्रलाप ( असंबद्ध भाषण ), वमशु ( वमन ), प्रसेक ( मुख से लालाखाप ), सदनं ( अङ्गों का टूटना या अङ्गों में ग्लानि ), भ्रम ( चक्कर आना ), अथवा मृशु—ये उपद्रव अजीर्ण के कारण होते हैं ॥५०४॥
तत्रामे लङ्घनं कार्यं, विदग्धे वमनं हितम् । विष्टब्धे स्वेदनं पथ्यं, रसशेषे शयीत च ॥५०५॥ चिकित्सा—
आम अजीर्ण में लंघन करना चाहिये। विदग्धाजीर्ण में वमन हितकारी है, विष्टब्धाजीर्ण में स्वेदन, तथा रसशेषाजीर्ण में—सोना ( तथा पाचन एवं स्वेदन ) हितकारी है ॥
वामयेदाशु तं तस्मादुष्णं लवणाम्बुना । कार्यं वाऽनशनं तावद्यावन्न प्रकृति भजेत् ॥५०६॥ लघुकायमतश्चैवं लङ्घनं: समुपाचरेत् ।
यावन्न प्रकृतिस्थः स्यादोषतः प्राणतत्तथा ॥५०७॥
वमन के लिये लवणयुक्त गरम जल पिलाना चाहिये, जिससे शीघ्र वमन हो जाये। जब तक अजीर्ण की निवृत्ति न हो तब तक अनशन करना चाहिये। इस प्रकार से अग्नि दीप्त होनेसे शरीर के हल्के होने पर लघु भोजन देने चाहिये। जब तक दोष एवं प्राण ( बल ) से प्रकृति ( स्वास्थ्थ ) में न आ जाये तब तक लघु भोजन ही देना चाहिये ॥५०६,५०७॥
हिताहितोपसंयुक्तमन्नं समशनं स्मृतम् । बहु स्तोकमकाले वा तज्ज्ञेयं विषमाशनम् ॥५०८॥ अजीर्णं भुज्यते यत्तु तदध्यशनमुच्यते ।
त्रयमेतन्निहन्त्याशु बहून्त्याधीनकरोति वा ॥५०९॥ हितकारी और अहितकारी१ अन्न को एक साथ मिलाकर खाना—‘समशन’ कहाता है। बहुत अधिक या थोड़ा अथवा बिना समय के खाना ‘विषमाशन’ कहाता है। अजीर्णावस्था में भोजन करना ‘अध्यशन’ कहाता है। ये तीनों ही मनुष्य को शीघ्र मार देते हैं, अथवा बहुत से रोगों को उत्पन्न करते हैं ॥५०८,५०९॥
अन्नं विदग्धं हि नरस्य शीघ्रं शीताम्बुना वै परिपाकमेति । तद्व्यस्य शैत्येन निहन्ति पित्त- माकलेदिभावाच्च नयत्यधस्तात् ॥५१०॥
१ हिताहित— “धान्यं नवं पुराणं यच्छाकं जीर्णं च कोमलम् । एकदृषं तद् विरुद्धं स्याच्छीतोष्णं च स्वजातितः ॥”
विदग्धाजीर्ण की चिकित्सा-विदग्ध अन्न शीतल पानी पीने से शीघ्र जीर्ण हो जाता है। क्योंकि—शीतलता के कारण यह जल पित्त को शान्त करता और भोजन को आर्द्र बनाकर नीचे की ओर ले जाता है, दस्त लाता है ॥
विदह्यते यस्य तु भुक्तमात्रे दह्येत हृत्कोष्ठगलं च यस्य ।
द्वाराम्भयां माक्षिकसंप्रयुक्तां
लीहवाऽभयां वा स सुखं लभेत ॥५११॥
जिस पुरुष के भोजन करने के उपरान्त आमाशय में विदग्धाजीर्ण हो जाता है, और हृदय कोष्ठ और गले में जलन होती है, उसके लिये द्वाक्षा और हरड को शहद में मिलाकर देना चाहिये। अथवा खाली अभया ( हरड ) को शहद में मिलाकर चाटना चाहिये ॥५११॥
भवेदजीर्णं प्रति यस्य शङ्का स्तिग्धस्य जनतोर्बलिनोऽन्नकाले ।
प्रातः सप्तुष्टीसभयामशङ्को
मुञ्जीत संप्राश्य हितं हितार्थी ॥५१२॥
जिस बलवान् एवं स्तिग्ध शरीरवाले पुरुष को भोजन के समय अजीर्ण की आशङ्का हो, उसको चाहिये कि प्रातःकाल सौठ और अभया ( हरड ) को खा ले। फिर बेफिकरी के साथ हितकारी भोजन को खाये ॥५१२॥
स्वरूपं यदा दोषविबद्धमांसं लीनं न तेजःपथमावृणोति ।
भवत्यजीर्णोऽपि तदा दुभुक्षा
या मन्ददुद्धि विषवन्निहन्ति ॥५१३॥
जिस समय—थोड़ा-एक पार्श्व में छिपा आमदोष के साथ मिलाकर, अनिर्माग्न को नहीं रोकता, उस समय अजीर्णावस्था में भी खाने की इच्छा उत्पन्न होती है। यह इच्छा-मन्ददुद्धि पुरुष को विष के समान मार देती है, इस समय में भोजन करने से दोष-रोग अधिक बढ़ जाता है१ ॥५१३॥
अत ऊर्ध्वं प्रवद्यामि गुणानां कर्मवित्तरम् । कर्मभित्स्त्वनुमीयन्ते नानाद्रव्याश्रया गुणाः ॥५१४॥ द्वादशः स्तम्भनः शीतो मूर्च्छावृट्स्वेददाहजित् । उष्णस्तद्विपरीतः स्यात्पाचनश्च विशेषतः ॥५१५॥ स्नेहमाद्वैवकृतं स्तिग्धो बलवर्णकरस्तथा । रूक्षस्तद्विपरीतः स्याद्विशेषात् स्तम्भनः खरः ॥५१६॥ पिच्छलो जीवन्तो वत्यः सन्धानः इलेषमलो गुरुः । विशदो विपरीतोऽस्मात् क्लेदाचूषणरोषणः ॥५१७॥
१ कुछ लोग तित्त पाठ आधिक मानते हैं— अन्तेन कुशेद्वैविशो पानैर्नैकं च पुर्येत । आशयं पवनादीनां चतुर्थमवशेष्येत ॥