भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ४६ ]

सूत्रस्थानम्

२२३

दाहपाककरस्तीक्ष्णः स्नावणो भृदुरन्यथा । सादोपलेपबलकृद् गुरुस्तर्पणबृहणः ॥५१८॥ लघुस्तद्विपरीतः स्याल्लेखनो रोपणस्तथा । दशाद्याः कर्मतः प्रोक्तास्तेषां कर्मविशेषणेः ॥५१९॥ दशैवान्यान्यत्र प्रवद्यासि द्रवादींस्तान्निबोध से । दवः प्रकलेदनः, सान्द्रः स्थूलः स्याद्वन्धकारकः ॥५२०॥ इल्लक्षणः पिच्छिलवज्ज्येयः, कर्कशो विजदो यथा । सुखानुबन्धी सूक्ष्मश्च सुगन्धो रोचनो मृदुः ॥५२१॥ दुर्गन्धो विपरीतोऽस्माद्बृहत्तासारचिकारकः । सरोऽनुलोमनः प्रोक्तो मन्दो यात्राकरः स्मृतः ॥५२२॥ व्यवायी चाखिलं देहं व्याप्य पाकाय कल्पते । विकासी विकसन्नेवं धातुबन्धान् विमोक्षयेत् ॥५२३॥ आशुकारी तथाऽऽशुत्वाद्वावत्यस्मभसि तैलवन्त । सूक्ष्मस्तु सौक्ष्म्यात् सूक्ष्मेषु क्षोतः रवन्तुसरः स्मृतः ॥ गुणा विंशतिरित्येवं यथावत्परिकीर्तिताः ।

इसके आगे गुणों के कर्मों को विस्तार से कहते हैं। चूँकि नाना द्रव्यों में आश्रित शुभाशुभ २० गुण कर्मों से ही जाने जाते हैं। शीत गुण—ह्लादक (सुख दायक), स्तम्भक है, मूर्च्छा, प्यास, स्वेद और दाह का नाशक है। उष्णगुण शीत-गुण के विपरीत गुणोंवाला और विशेष कर पाचक (व्रणादि को पकानेवाला) है। स्निग्ध गुण—स्नेहन, मार्दव (कोमलता), वल एवं वर्ण को उत्पन्न करता है। रूक्षगुण—स्निग्ध के विपरीत गुणोंवाला तथा विशेष करके स्तम्भक एवं खर (कर्कश) है। पिच्छिलगुण—जीवनदायक, बलकारक, सन्धानकारक, कफवर्धक और गुरु है। विशुद्धगुण—पिच्छिलगुण के विपरीत है, इसलिये—आद्रता का नाश करनेवाला और रोहण करता है। तीक्ष्णगुण—दाह (जलन), पाक (व्रण को पकाना) उत्पन्न करता है, और सावक है। मृदुगुण, तीक्ष्णगुण के विपरीत है। गुरुगुण—साद (अङ्ग ग्लानि), उपलेप (मलबृद्धि), बल (कफ) वर्धक, तर्पण (तृप्तिकर), बृहण (देह वर्धक) है। लघुगुण—गुरु गुण के विरुद्ध तथा लेखन (पतला) करनेवाला, और रोपण है। शीत आदि दस गुणों के कर्मों को कह दिया, अब द्रव आदि दस गुणों के कर्मों को कहते हैं। द्रवगुण अक्लेदक (क्लिन्न करनेवाला), सान्द्रगुण स्थूल, बन्धकारक (उपचयकारक) है। रूक्षगुण—पिच्छिल के समान है, कर्कशगुण—विशद के समान है। सुगन्ध गुण—सुखदायक सूक्ष्म, रोचक और मृदु है। दुर्गन्ध गुण—सुगन्ध के विपरीत है, इसलिये—जी मच-लाना तथा अशुचिकारक है। सरगुण—वायु का अनुलोमक है, मन्द गुण—शरीर के वर्चन को कराता है। व्यवयी गुण—प्रथम सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर पीछे से जीर्ण होता है। विकासी गुण—अपक्वावस्था में ही सम्पूर्ण शरीर में फैलकर,

मद्य एवं विष के समान, सब शरीर-धातुओं को शिथिल करता है। आशुकारी गुण—जिस प्रकार पानी में तैल फैल जाता है, उसी प्रकार शीघ्र धातुओं में फैल जाता है। सूक्ष्म गुण—सूक्ष्म होने के कारण सूक्ष्म क्षोतों में फैल जाता है। इस प्रकार के वीस गुणों को कह दिया है।

वि० मन्तव्य—इस पाठ में २० गुणों के व्याख्यान की प्रतिष्ठा की गई है, परन्तु २२ गुण गिन दिये गये हैं—सुगन्ध एवं दुर्गन्ध अधिक हैं। यद्यपि “साध्यां गुर्वाद्यो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः। गुणाः प्रोक्ताः” च० सू० अ० १ के अनुसार अर्थ—शब्द आदि विषयों को भी गुण कहा जाता है। अतः सुगन्ध एवं दुर्गन्ध को गुणों में गिना जा सकता है, तथापि च० सू० अ० २५ में आहार के २० ही गुण माने हैं और उनमें सुगन्ध एवं दुर्गन्ध नहीं पड़े गये हैं। और इस सुश्रुत संदर्भ के अनुसार व्यवयी एवं विकासी भी चरक के उत्क्रमकरण वाग्भट सू० स्थान अ० १ में भी नहीं पड़े गये हैं। अस्तु ॥५१४-५२४॥

संप्रवदयाभ्यतश्चोर्ध्वमाहारगतिनिश्चयम् ॥५२५॥

जिस जिस प्रकार का अन्न-जीर्ण होकर जिस द्रव्य का पोषण करता है, उसका निर्णय कहते हैं ॥५२५॥

पञ्चभूतात्मके देहे ह्याहारः पाञ्चभौतिकः ।

विपक्कः पञ्चधा सम्यग्गुणान् स्वातन्त्रिर्बर्धयेत् ॥५२६॥

इस पृथ्वी आदि पञ्चभूतात्मक शरीर में, आहार की पञ्चमहाभूतों की अग्नि द्वारा पक्कर अपने गुणों को बढ़ाता है। पृथ्वी गुणवाले आहार-पार्थिव को बढ़ाने हैं, द्रव गुणवाले जलीय गुण को बढ़ाते हैं ॥५२६॥

अविदग्धः कफः, पित्तं विदग्धः, पवनं पुनः ।

सम्यग्निवपको निःसार आहारः परिबृंहयेत् ॥५२७॥

अविदग्ध (अधुर आहार) आहार कफ को बढ़ाता है, विदग्ध (अस्लीभूत) आहार पित्त को बढ़ाता है। भली प्रकार से पका आहार—सार रहित होने से (मल द्वारा) वायु को बढ़ाता है ॥५२७॥

विष्णुमूत्रमाहारमलः सारः प्रागगिरितो रसः ।

स तु न्यानेन विक्षिप्तः सर्वान् धातून् प्रतपयेत् ॥५२८॥

शोणित वर्णनीय अध्याय में—विट् (मल) और मूत्र और रस की आहार से उत्पत्ति कह दी। यह रस न्यान वायु के द्वारा प्रेरित होकर केदारकुल्या न्याय से सब धातुओं का पोषण करता है ॥५२८॥

१—चरक में भी कहा है—

“प्रथास्वरेन पुन्युत्ते देहे द्रव्यगुणाः पृथक् ।

पार्थिवाः पार्थिवानेवं शेषाः शेषाश्च कृत्स्नशः ॥”