सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ४६ ]
कफः पित्तं मलः खेपु स्वेदः स्थानन्खरोम च ।
नेत्रविट् त्वच्च च स्नेहो धातूनां क्रमशो मलाः ॥५२६॥
आहार का मल—मल और मूत्र, रस का मल कफ, रक्त का मल पित्त, मांस का मल—कान मुख नासिका का मल, मेदका मल-स्वेद, अस्थियों के मल नख और रोम, मजा का मल—आँख मल, त्वचा का जो स्नेह है, वह मल है, ये धातुओं के क्रमशः मल है। शुक्र—मल रहित है, इसलिये इसका कोई मल नहीं है, जिस प्रकार कि हजारों बार तपाये स्वर्ण में से मल नहीं निकलता। इसलिये—शुक्रस्य सारमोजः। अत्यन्त शुद्धतयास्य मलाभावः ॥
वि० मन्तव्य—रस आदि धातुओं का स्वस्थस्थान में स्वस्वामि द्वारा परिपाक होने पर कफ आदि मलों की उत्पत्ति एवं बृद्धि होती है ॥५२६॥
दिव्या१ विबुद्धे हृदये जाग्रतः पुण्डरीकवत् ॥
१—दिन में मनुष्य चलता-फिरता रहता है, इसलिये दिन में भोजन हानि नहीं करता।
प्रातरात्रे त्वजीर्णेऽपि सायभाशो न दुष्यति ।
दिव्या प्रवृध्यतेऽकंण हृदयं पुण्डरीकवत् ॥
तस्मिन् विबुद्धे लोतांसि स्फुटत्वं याति सर्वशः ।
व्यायामाच्च विहाराच्च विशिष्यन्तवाच्च चेतसः ॥
न बलेदमुपगच्छति दिवा तेनास्य आवतः ।
अबिलन्तेष्वन्मासिकतम्यत्वेपु न दुष्यति ॥
षविदग्ध इव क्षीरे क्षीरमन्यद् विमिश्रितम् ।
रात्रौ तु हृदये म्लाने संवृत्तेष्वनयेपु च ॥
याति कोष्ठे च विकलेदं संवृत्ते देहधातवः ।
किलन्तेष्वन्यदपक्वेपु तेष्वसिकतं प्रवृध्यति ।
विदग्धेषु पयःस्वन्वत् पयस्तप्तेष्विवान्पितम् ॥ चरको-
वि० अ० १५ ।
अन्नमकिलन्नधातुत्वाद्जीर्णेऽपि हितं निजि ॥५३०॥
हृदि संमोलिते रात्रौ प्रसुमस्य विशेषतः ।
किलन्नविस्त्रस्तधातुत्वाद्जीर्णे न हितं दिवा ॥५३१॥
दिन में जागते हुए पुरुष का हृदय कमल के समान खिला रहता है (मनुष्य का मस्तिष्क क्रियाशील रहता है। चेष्टावद् तन्तु गति करते हैं)। धातुओं के अकिलन्न होने से, रात्रि में, अजीर्णावस्था में भी किया गया भोजन हितकारी होता है। रात्रि में खासकर सोने से हृदय संकुचित हो जाता है (ज्ञान तन्तु सुतावस्था में रहते हैं), इसलिये धातुओं के किलन्न एवं शिथिल होने से अजीर्णावस्था में दिन के समय भोजन करना हितकारी नहीं। सायंकाल के भोजन करने से यदि अजीर्ण उत्पन्न हो तो प्रातःकाल भोजन नहीं करना चाहिये। प्रातःकाल के भोजन करने से यदि अजीर्ण उत्पन्न हो तो सायंकाल का भोजन हानिकारक नहीं है ॥५३०,५३१॥
इमं विधिं योऽनुमतं महामुने-
र्नुपर्विमुद्यस्य पठेद्वि यत्ततः ।
स भूमिपालाय विधातुमौषधं
महात्मनां चाहंति सूरिसत्तमः ॥५३२॥
इसका फल—
जो मनुष्य महामुनि एवं राजर्षियों में अग्रगण्य धन्वन्तरि से अनुमत—सूत्रस्थान में वर्णित इस आधार विधि को पढ़ता है, वह सूरिसत्तम (पण्डित प्रधान)—राजा के लिये औषध बना सकता है, तथा राजाओं के समान सत्कार को पाने के योग्य भी होता है ॥५३२॥
इति भगवता श्रीधन्वन्तरिणोपदिष्टायां तच्छिष्येण
महर्षिणा सुश्रुतेन विरचितायां सुश्रुतसंहितायां
सूत्रस्थाने षट्चत्वारिंशत्तमोध्यायः ।