सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 273, कुल 872 में से
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अथ निदानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो वातव्याधिनिदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
हेतु, लिंग और औषध ज्ञान इनको वीज रूप से सूत्रस्थान में कहकर हेतु लक्षण का प्रतिपादन करने के लिये इस-निदान-स्थान का आरम्भ करते हैं। इसमें भी वायु के सबसे प्रधान होने से तथा आरोग्य लाभ की इच्छा से सबसे प्रथम 'वात-व्याधि निदान' की व्याख्या करते हैं। जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था१।
वि० मन्तव्य—निदान शब्द का अर्थ—रोगों के हेतु तथा लक्षण का निर्देश-वर्णन जिस प्रकरण में हो उसका नाम निदानस्थान है। जिसके द्वारा रोग का निश्चय किया जाता है उसका नाम निदान है। इस प्रकार निदान, पूर्वरूप, रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति का नाम निदान हो जाता है, परन्तु निदान-रोग के निमित्त, हेतु, आयतन, प्रत्यय, उत्थान, कारण, मूल, प्रवर्त्तक, उत्पादक का नाम भी है, पूर्वरूप-भावी, उत्पत्त्यमान, भविष्यत् रोग के लक्षण का नाम है, रूप-उत्पन्न-वर्त्तमान-विद्यमान रोग के लक्षणों का नाम है, रूप के पर्याय हैं—संस्थान, व्यञ्जन, लिंग, चिह्न, आकृति आदि। इनमें व्यञ्जन वह लक्षण है जो रोग का प्रधान लक्षण या स्व-स्वकीय रूप होता है अर्थात् जिसके बिना वह-रोग "वह रोग" ही नहीं कहला सकता है, यथा—ज्वर का सन्ताप, पाण्डुरोग का पाण्डु-वर्ण, कास का कसन—खाँसना, श्वास का श्वास फूलना तथा अर्ध का अर्धोङ्कुर—मांसाङ्कुर आदि २। उपशय—हेतु एवं रोग के विपरीत अथवा विपरीतार्थकारी (विपरीत न होने पर भी विपरीत अर्थ-फल करनेवाले) औषध, आहार तथा विहार का मुखानुबन्ध (आरोग्य प्रद) उपयोग-सेवन का नाम है और सम्प्राप्ति-रोग की उत्पत्ति के प्रकार का नाम है। इस निदानस्थान में जितने रोग लिखे गये हैं उनके संक्षिप्त अथवा विस्तृत निदान पूर्वरूप, रूप, उपशय तथा सम्प्राप्ति सब लिखे गये हैं। यदि उपशय न भी लिखा गया हो तो समझ लिया जाय कि—जो आहार-विहार रोग के निदान-कारण होते हैं उनसे विपरीत आहार-विहार उपशय होते हैं। वातव्याधि-वातजनित विशिष्ट रोग है ॥ १,२ ॥
धन्वन्तरि धर्मभूतां वरिष्ठममृतोद्भवम्१।
चरणातुपसंगृह्य सुश्रुतः परिपुच्छति ॥ ३ ॥
वायोः प्रकृतिभूतस्य व्यापन्नस्य च कोपनैः।
स्थानं कर्म च रोगांश्च वद मे वदतां वरः ॥ ४ ॥
धर्मात्माओं में वरिष्ठ (श्रेष्ठ) एवं अमृत कलश के साथ उत्पन्न भगवान् धन्वन्तरि के चरणों को छूकर सुश्रुत ने पुनः पूछा कि—हे वक्ताओं में श्रेष्ठ! अपनी प्रकृति (स्वभाव) में स्थित एवं वायु के समान द्रव्य गुण कर्मों के द्वारा कुपित होने से विकृत वायु के स्थान कर्म (सामान्य एवं विशेष) तथा रोगों को मेरे प्रति कहें ॥ ३,४ ॥
तस्य तद्बचनं श्रुत्वा प्रात्रवीक्षिष्यां वरः।
स्वयंभूरेष भगवान् वायुरित्यभिज्ञाद्वितः ॥ ५ ॥
स्वातन्त्र्यान्तित्यभावाच्च सर्वगतत्वात्तथैव च।
सर्वेषामेव सर्वात्मा सर्वलोकनमस्कृतः ॥ ६ ॥
स्थित्युत्पत्तिविनाशेषु भूयानामेष कारणम्।
अव्यक्तो व्यक्तकर्मा च रूक्षः शीतो लघुः खरः ॥ ७ ॥
तिर्यग्गो द्विगुणश्चैव रजोबहुल एव च।
अचिन्त्यवीर्यो दोषाणां नेता रोगसमूहराद् ॥ ८ ॥
आशुकारी सुदृश्वारी पक्वाधानगुदालयः।
भिषजों में श्रेष्ठ धन्वन्तरि ने सुश्रुत के बचन को सुनकर उत्तर दिया—यह वायु भगवान् (समस्त ऐश्वर्य-अणिमादि गुणों से युक्त) है। अपने कार्य में स्वतन्त्र होने से, नित्य तथा सर्वत्र व्याप्त (गतिमान्) होने से (आकाश की भाँति) इसको स्वयम्भू कहते हैं। एवं सूक्ष्म-परमाणु होने से भी स्वयम्भू है। सब स्थावर एवं जंगम पदार्थों में कारण-कार्यात्मक रूप से विद्यमान है। सब प्राणियों की स्थिति (जीवन), उत्पत्ति और विनाश में यही वायु कारणभूत है, इसलिये सम्पूर्ण लोक इसको नमस्कार करता है। अव्यक्त (अहस्य) होते हुये भी इसके कर्म (कार्य) व्यक्त (प्रकट) हैं। वायु के कर्म—रूक्ष, शीत (असंयुक्तवायु) लघु, खर (ककश), तिर्यग्ग (तिर्यग्ग गामी), द्विगुण (शब्द-स्पर्श गुण), रजोबहुल (रजोगुण की प्रधानता), अचिन्त्यवीर्य (अचिन्त्यशक्ति), दोषाणां नेता (दोष-धातु-मल का प्रेरक), पित्त-कफ रक्तादि के रोग समूहों में शोभित होता है, (सबसे अधिक अस्ती वात विकार हैं),
१—यथा चरक में—
“वायोर्वाथा स्तुतिरपि भवत्यारोप्याय।”
१ “अमृतापूर्णकलशं बिभ्रद् वलयभूषितः।”