भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० १ ]

निदानस्थानम्

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का प्राणन-करता है । इसका प्रभाव श्वास क्रिया पर है । श्वास क्रिया से ही भाषित आदि की प्रवृत्ति होती है ॥१५॥

आमपकाशयचरः समानो बह्विसङ्गतः ।

सोऽन्तं पचति तज्जांश्च विशेषान्विचिनक्ति हि ॥१६॥

गुल्मानिसादातीसारप्रभृतीन् कुष्ठते गदान् ।

समान वायु—पच्यमान आहार के आशय स्थान आमाशय में, बहि (जठराग्नि) से संगत (पार्श्व में) रहती है१ । यह समान वायु अन्न का पाचन करती है, तथा अन्न से उत्पन्न होने वाले रस, द्रोण, मूत्र, मलों को पृथक् करती है और विकृत होने पर—गुल्म, अग्निसाद (अग्निमान्द्य), अतीसार आदि रोगों को उत्पन्न करती है ।

वि० मन्तव्य—समान—सं-सम्यक् आसमन्तात् अनिति इति समानः । इसका प्रभाव-अधिकार पाचन क्रिया पर है ॥

कृत्स्नदेहचरो व्यानो रससंवहन्तोद्यतः ॥१७॥

स्वेदासृक्खावणश्चापि पञ्चधा चेष्टयत्यपि ।

कुद्वक्ष कुष्ठते रोगान् प्रांयशः सर्वदेहगान् ॥१८॥

व्यान वायु—सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त है, तथा रसादि को प्रेरित करती है । स्वेद, एवं रक्त का विस्वावण करती है । प्रसारण, आकुंचन, विन्मनन, उन्मनन, तिर्ण्यग्ग गमन (या गति प्रसारण-उत्क्षेप, निमेष-उन्मेष) आदि—यह पाँच प्रकार की चेष्टायें करती है । कुपित होने पर सर्व शरीर व्यापी ज्वर, अतीसार आदि रोगों को उत्पन्न करती है ।

वि० मन्तव्य—व्यान—विशेषेण आ-समन्तात् अनिति इति व्यानः । इसका प्रभाव समस्त शरीर पर है ॥

पक्वाधानाल्योऽपानः काले कर्षति चाप्यधः ।

समीरणः शकृन्मूत्रं शुक्रगर्भात्वाति च ॥१९॥

कुद्वक्ष कुष्ठते रोगान् घोराग् बस्तिगुदाश्रयान् ।

अपान का स्थान पक्वाशय है । यह वायु समय होने पर मल-मूत्र-शुक्र-गर्भ और आर्त्तव को नीचे की ओर खींचती है । कुद्व होने पर बस्ति आश्रित (अश्मरी आदि) एवं गुदाश्रित (भगन्दर आदि) भयंकर रोगों को उत्पन्न करती है ।

वि० मन्तव्य—अप अघस्तात् आ—समन्तात् अनिति इति अपानः । इसका प्रभाव—मलाशय, गुद, मूत्राशय-मूत्र संस्थान तथा गर्भाशय और शुक्रवहस्रोतस् तथा डिवकोश आदि बस्तिगह्वर के अवयवों पर है ॥१९॥

शुक्रदोषप्रमेहास्तु व्यानापानप्रकोपजाः ॥२०॥

युगपत् कुपिताश्चापि देहं भिन्द्युरसंग्रयम् ॥

व्यान और अपान वायु के मिलित अवस्था में कुपित होने

से शुक्रजन्म एवं प्रमेह रोग उत्पन्न होते हैं१ । एक साथ यदि सव वायु कुपित हो जायें तो, निःसन्देह शरीर का नाश कर देते हैं ॥२०॥

अत ऊर्ध्वं प्रवद्व्यामि नानास्थानान्तराश्रितः ॥२१॥

वहुशः कुपितो वायुविकारान् कुष्ठते हि यान् ।

वायुरामाशये क्रुद्धःच्छर्घादीन् कुष्ठते गदान् ॥२२॥

मोहं मूर्च्छं पिपासां च हृदग्रहं पार्श्ववेदनाम् ।

पक्वाशयस्थोऽन्त्रकूजं शूलं नाभौ करोति च ॥२३॥

क्रुच्छमूत्रपुरीपत्तमानाहं त्रिकवेदनाम् ।

श्रोत्रादिष्विबन्दित्रयवधं कुर्यात् क्रुद्धः समांरणः ॥२४॥

इसके आगे नाना स्थानों में आश्रित वायु के प्रकोप से होनेवाले रोगों को कहता हूँ । आमाशय में कुपित वायु-छर्दि (वमन), ऊर्ध्व रक्तपित्त, हृत्तस्म आदि रोगों को मोह (चेतना नाश), मूर्च्छा, प्यास, हृदयग्रह (हृत्पीडा), पार्श्वशूल को उत्पन्न करती है । पक्वाशय में स्थित वायु कुपित होकर आंतों में गुड-गुड़ाहट, नामि में शूल, मल-मूत्र की कठिनाई से प्रवृत्त होना आनाह (आध्मान), त्रिक वेदना (कटिशूल), श्रवण दर्शन आदि विषयों में कुपित वायु कर्णादि इन्द्रियों का नाश करती है । मान-वर्त्तमान है, तथापि वह कारणभेद से किसी एक दो अवयवों में भी विकार रोग उत्पन्न कर देता है ॥२१-२४॥

वैवर्ण्यं स्फुरणं रौदयं सुप्तिं चुमुचुमायनम् ।

त्वक्स्थो निस्तोदनं कुर्यात् त्वग्भेदं परिपोटनम् ॥२५॥

व्रणाश्च रक्तगो, ग्रन्थीन् सङ्गुलान् मांससंश्रितः ।

तथा मेदः श्रितः कुर्याद् ग्रन्थीन्मन्दरुजोऽव्रणान् ॥२६॥

कुर्यात् सिरागतः शूलं सिराकुञ्चनपूरणम् ।

स्नायुप्राप्तः स्तम्भकम्पौ शूलमाक्षेपणं तथा ॥२७॥

हन्ति सन्धिगतः सन्धीन् शूलशोफो करोति च ।

अस्थिशोषं प्रभेदं च कुर्याच्छूलं च तच्छ्रुतः ॥२८॥

तथा मज्जगते रुक् च न कदाचित् प्रगाम्यति ।

अप्रवृत्तिः प्रवृत्तिर्वा विकृता शुक्रगोऽनिले ॥२९॥

त्वचा में स्थिर वायु कुपित होकर विवर्णता स्फुरण (फड़-कना), रुक्षता, सुप्ति (स्पर्श शान का नाश), चुमुचुमायन (शरीर पर सरसों का कल्क लगाने के समान चुनचुनाहट), त्वचा में शूल, त्वचा का सम्पूर्ण रूप में फटना एवं बिदीर्ण होना उत्पन्न करती है । मांस में आश्रित वायु कुपित होकर रक्तजन्म व्रणों को तथा शल्युक्त ग्रन्थियों को उत्पन्न करती है । मेद में आश्रित वायु कुपित होकर व्रण रहित तथा मन्द वेदना

१ शुक्र के सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने से, प्रमेह के रस दूष्य प्रभाव से उत्पन्न होने के कारण व्यानजन्म तथा मेदद्वार में आश्रित होने से अपानजन्म रोग होते हैं ।

१ यथा चरक में—“अन्तरनेक्ष्व पार्श्वस्थः समानः ॥”