भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ ३० ]

वाली ग्रन्थियों को उत्पन्न करती है। शिरा में आश्रित वायु कुपित होकर-शिराशूल एवं शिराओं का संकोच एवं शिराओं में रक्त पूर्णता (High Blood Pressure) उपन्न करती है। स्नायु में स्थित वायु कुपित होकर-स्तम्भ (जड़ता) कम्पन, शूल और आक्षेप उत्पन्न करती है। सन्धियों में आश्रित वायु कुपित होकर-सन्धियों का नाश, शूल एवं सूजन उत्पन्न करती है। अस्थियों में आश्रित वायु के कुपित होने पर-अस्थिर शोष (tuberclosis of Bones) अस्थियों का टूटना अथवा अस्थियों में शूल होना है। मज्जा में स्थित वायु के कुपित होने पर, मज्जा का शोष तथा कभी भी शान्त न होनेवाली पीड़ा उत्पन्न करती है। शुक्र स्थान में स्थित वायु के कुपित होने पर, शुक्र की अप्रवृत्ति अथवा अति शीघ्र या बहुत देर में, ग्रथित-विवर्ण शुक्र का आना होता है ॥२५-२६॥

हस्तापादशिरोग्धातुस्तथा संचरति क्रमात् ।

व्याप्नुयाद्वाऽखिलं देहं वायुः सर्वगतो नृणाम् ॥३०॥

स्तम्भनाक्षेपणस्वापशोफगुळानि सर्वगः ।

जिस प्रकार से वायु हाथ पांव-शिर तथा धातुओं में गति करती है, उसी प्रकार से पुरुषों के सम्पूर्ण शरीर में गति द्वारा व्याप्त होकर-स्तम्भन (जड़ता), आक्षेप, अस्वाप (निद्रा नाश), शोफ, एवं शूल को सम्पूर्ण शरीर में उत्पन्न करती है ॥

स्थानेषूक्तेषु संमिश्रः समिश्राः कुरुते रुजः ॥३१॥

उपर्युक्त स्थानों में-पित्त आदि के साथ मिलकर वायु सम्मिलित वेदनायें (दाह आदि) उपन्न करती है ॥३१॥

कुर्याद्वयवप्राप्नो मारुतस्वमितान् गदान् ।

दाहमंतापमूच्छोः स्युवांगी पित्तसमन्विते ॥३२॥

शैत्यशोफगुरुत्वानि तस्मिन्नेव कफावृते ।

सूचीमिरिव निस्तोदः स्पशद्वेषः प्रसुप्तता ॥३३॥

शेषाः पित्तविकाराः स्युमारुते शोणितान्विते ।

अवयवों में पहुँचकर वायु असंख्य रोगों को उत्पन्न करती है। तथा-वायु के पित्त के साथ मिलने पर दाह, सन्ताप (बैचैनी) और मूच्छा उत्पन्न होती है। वायु के कफ के साथ मिलने पर शीतलता, सूजन और शरीर में भारीपन होता है। वायु के रक्त के साथ संयुक्त होने पर-सूई चुमने के समान पीड़ायें, स्पर्श ज्ञान में अप्रति, स्पर्शज्ञान का नाश तथा अन्य पित्तजन्यरोग होते हैं ॥३२,३३॥

प्राणे पितावृते छ्विर्दिद्विहश्चैवोपजायते ॥३४॥

दौर्बल्यं सदन् तन्द्रा चैवण्यं च कफावृते ।

उदाने पित्तसंयुक्ते मूच्छोदाहभ्रमकलमाः ॥३५॥

अस्वेदहर्षा मन्दोऽग्निः शीतस्तम्भो कफावृते ।

समाने पित्तसंयुक्ते स्वेददाहौष्ण्यमूर्च्छन्तम् ॥३६॥

कफाधिकं च विष्मूत्रं रोमहर्षः कफावृते ।

अपाने पित्तसंयुक्ते दाहौष्ण्ये स्यादसुरदरः ॥३७॥

अधःकायगुरुत्वं च तस्मिन्नेव कफावृते ।

व्याने पितावृते दाहो गात्रविक्षेपणं कलमः ॥३८॥

गुरुणि सवगात्राणि स्तम्भनं चास्थिपर्वणाम् ।

लिङ्गं कफावृते व्याने चेष्टास्तम्भस्तथैव च ॥३९॥

प्राणवायु के पित्त के साथ मिलने पर-छ्विदि और दाह (जलन) होती है, प्राण के कफ के साथ मिलने पर-दुर्बलता, अंगों में ग्लानि तन्द्रा और विवर्णता आती है। उदान वायु के पित्त के साथ मिलने पर, मूच्छा, दाह, भ्रम, कलम (विना-परिश्रम के थकना) होता है, कफ के साथ मिलने पर पसीने का न आना, शरीर में रोमांच, अग्निमान्द्य, शीतलता और जड़ता उत्पन्न होती है। समान वायु के पित्त के साथ मिलने पर-स्वेद का आना, दाह, उष्णिमा और मूच्छा, कफ के साथ मिलने पर, कफ युक्त मल एवं मूत्र तथा शरीर में रोमांच होता है। अपान वायु के पित्त के साथ मिलने पर, दाह, उष्णिमा तथा स्त्रियों में रक्त प्रदर (रक्ताविवय) उत्पन्न होता है। अपानवायु के कफ के साथ मिलने पर शरीर के कटि से निचले भाग में विशेषरूप से भारीपन आ जाता है। व्यानवायु के पित्त के साथ मिलने पर-दाह, शरीर की इधर-उधर गति एवं कलम उत्पन्न होता है। व्यान वायु के कफ के साथ मिलने पर-सम्पूर्ण अंगों में भारीपन, अस्थि सन्धियों में जड़ता, गमनादि चेष्टाओं में स्तम्भन होता है।

वि० मन्तव्य-आवृत का अर्थ है रकना-प्राण आदि की गति को उदान आदि यदि रोक देते हैं तो वह "आवरण" या "आवृत होना" कहलाता है। उक्त प्राण आदि पांचों का परस्पर आवरण होता है, फलतः भिन्न २ विकार उत्पन्न हो जाते हैं और रस आदि धातुओं, वात कफ तथा अंत्र आदि से भी वायु का आवरण होता है। यथा-वायोः धातुसंघातं कोपो मार्गस्यावरणेन च। अर्थात्-वायु का कोप दो प्रकार से होता है-१-रसादि धातुओं के क्षय-हास से-शरीर रक्त-शुषिर या खोखला हो जाने से-इस अवस्था में वायु को इधर-उधर दौड़ने फैलने का अवसर मिल जाता है और २-मार्ग के आवरण-अवरोध से-प्रकृत मार्ग न मिलने-रकने से इस अवस्था में वायु रककर विकृत हो जाता है, क्योंकि यह सदागति है-सर्वदा गति करता है तभी शुद्ध रहता है ॥३४-३६॥

प्रायशः सुकुमारानां मिथ्याऽऽहारविहारिणाम् ।

रोगाध्वप्रमदामघन्यायामेइचातिपोडनात् ॥४०॥

श्रुतुसात्क्यविपर्यासात् स्नेहादीनां च विभ्रमात् ।