सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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अन्यवाये' तथा स्थूले वातरक्तं प्रकृप्यति ॥४१॥
वातरक्त रोग का कारण—
मिथ्या—अनुचित आहार एवं विहार (काय-बाह्य-मन का व्यापार) से, रोग से, अश्व (मार्ग), प्रमदा (स्त्री), मद्य, और व्यायाम के अति सेवन से, ऋतु के विपरीत होने से सत्य के विपरीत होने से, स्नेहादि पंचकर्मों के अतियोग—अयोग या मिथ्या योग से, व्यवय (मैथुन) करने से, स्थूल एवं सुकुमार पुरुषों में वायु के कारण वातरक्त विशेष रूप में कुपित हो जाता है।
वि० मन्तव्य—वातरक्त रोग-वायु के रक्त के साथ मिलने तथा रक्त द्वारा आहत होने पर होता है ॥४१॥
हस्त्यश्वोष्ट्रैर्गच्छतोऽन्यैश्च वायुः
कोपं यातः कारणैः सेवितैः स्वैः ।
तीक्ष्णोष्णाम्लक्षारशाकादिभोज्यैः
संतापाद्यैर्भूयसा सेवितैश्च ॥४२॥
क्षिप्रं रक्तं दुष्टिमायाति तच्छ
वायोर्मागं संरुणद्वयाशु यातः ।
कृद्धोऽत्यर्थं मार्गरोधात् स वायु-
रत्युद्विक्तं दूषयेद्रक्तमाशु ॥४३॥
तत् संघुक्तं वायुना दूषितेन
तत्प्राबल्यदादुच्यते वातरक्तम् ।
तद्वत् पित्तं दूषितेनासूजाऽऽक्तं
श्लेष्मादुष्टो दूषितेनासूजाऽऽक्तः ॥४४॥
सम्पाति—
हाथी—घोड़े ऊँट की सवारी से अथवा अन्य मार्गगमन आदि कार्यों से एवं स्वयं सेवन किये, विदाह कारक तीक्ष्ण-उष्ण-अम्ल-क्षार-शाक आदि भोजनों से, अथवा सन्ताप (धूप सेवन) आदि कार्यों के सेवन से रक्त क्षीप्र दूषित हो जाता है। यह दूषित रक्त क्षीप्रगामी वायु के मार्ग को रोक लेता है। मार्ग के रुक जाने से वायु अत्यन्त कुपित होकर रक्त को विशेष मात्रा में दूषित कर देती है। यह रक्त-दूषित वायु के साथ संयुक्त होने से एवं वायु की प्रधानता के कारण (रक्त की अप्रधानता से) 'वातरक्त' कहा जाता है। इसी प्रकार से दूषित रक्त के साथ मिलकर पित्त भी दूषित हो जाता है, दूषित रक्त से मिलकर कफ भी दूषित हो जाता है।
वि० मन्तव्य—हाथी, घोड़ा तथा ऊँट आदि पर पाँव लटककर सवारी करने से—पाँव में रक्त उत्तर आने से होता है ॥
१—डल्हणाचार्य ने अन्यवाय का अर्थ—मैथुनवर्जित कियों है। यहाँ पर नश्व-अप्रशस्त अर्थ में है, क्योंकि कहा भी है—“भवतो विधिहीनश्च स्वप्नजागरमैथुनम् ॥”
स्पशोऽद्विग्नो तोदभेदप्रशोष-
स्वापेपेतौ वातरक्ततेन पादौ ।
पित्तासूरभ्यासुप्रदाहौ भवेता-
मत्थ्यर्थोष्णो रक्तशोको मृदू च ॥४५॥
कण्डूमन्तौ श्वेतशीतो सशोको
पौनस्तन्वो श्लेष्मदुष्टे तु रक्ते ।
सर्वदुष्टे शोणिते चापि दोषाः
स्वं स्वं रूपं पादयोर्दर्शयन्ति ॥४६॥
जिस समय 'वातरक्त' में वायु की प्रधानता रहती है, तब पाँवों में स्वर्ष की असहिष्णुता, तोद (चुमने की वेदना), भेद (विदीर्णता), प्रशोष (शुष्कता), स्वाप (स्वर्ष ज्ञान का नाश) होता है। जब पित्त एवं रक्त की प्रधानता रहती है, तब-तीव्र ज्वलन, अतिशय उष्णता, लालरङ्ग की एवं कोमल सृजन (दबाने से दबनेवाली) होती है। जिस समय वातरक्त में कफ की प्रधानता रहती है—तब पाँव में खाज होती है, पाँव श्वेत एवं शीतल रहते हैं, सृजन होती है, मोटे हो जाते हैं, पाँवों में जड़ता रहती है। जिस समय वातरक्त में तीनों दोष मिले रहते हैं, उस समय सब दोषों के लक्षण पाँव में स्पष्ट होते हैं ॥
प्रामपे ज्ञिथिलौ स्विन्नौ शीतलौ सविषयंयो ।
चैवण्यंतोदसुस्तवगुरुवौषसमन्वितौ ॥४७॥
पूर्वरूप—पाँव शिथिल के विपरीत कठिन, स्विन्न के विपरीत स्वेद रहित, शीतल के विपरीत उष्ण होते हैं। पाँवों में विवर्णता, तोद (वेदना), सुस्ता (स्वर्षज्ञान का अभाव), मारीपन और दाह होता है ॥४७॥
पादयोर्मूलमास्थाय कदाचिद्वस्तयोरपि ।
आखोविषमिव कुट्टं तदेहमनुसपति ॥४८॥
कभी कभी यह वातरक्त पाँव या हाथ के मूल (तलुने) का आश्रय प्राप्त करके—समूर्ण शरीर में चूहे के विष के समान फैल जाता है। जिस प्रकार कि चूहे का विष प्रथम एक स्थान पर रहकर पीछे समूर्ण शरीर में फैलता है, उसी प्रकार वातरक्त रोग भी।
वि० मन्तव्य—आखुविष के लिये देखिये—कल्प स्थान का मूषिक कल्याणाय ७ ॥४८॥
आजानुस्फुटितं यच्छ प्रभिन्नं प्रसृतं च यत् ।
उपद्रवैश्च यज्जुष्टं प्राणमांसक्षयादिभिः ॥४९॥
शोणितं तदसाध्यं स्याद्याप्यं संवत्सरोर्यितम् ।
असाध्य लक्षण—
जो वात रक्त जानु पर्यन्त फटा (व्याप्त) हो, जिसमें से साव बहता हो और जिसमें त्वचा विदीर्ण हो जाये, प्राण—(बल) एवं मांस का क्षय हो रहा हो (अंगुलिबकता, अर्बुद आदि हो) वह वातरक्त असाध्य है। एक साल पुराना वातरक्त याप्य होता है ॥४९॥
यदा तु धमन्तोः सर्वाः कुपितोऽभ्येति मार्कृतः ॥५०॥