भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

तदाक्षिपत्याशु मुहुर्मुहुर्देहं मुहुश्चरः ।

मुहुर्मुहुस्तदाक्षेपादाक्षेपक इति स्मृतः ॥५१॥

आक्षेपक—

जिस समय कुपित वायु सम्पूर्ण धमनियों में (नाडियों) में व्याप्त हो जाती है, उस समय वार वार गति करनेवाली वायु शरीर को बार-बार आकुंचन एवं प्रसारण करती है। बार-बार आक्षेप उत्पन्न करने से इसको आक्षेपक कहते हैं।

वि० मन्तव्य—आक्षेपक—इस रोग में बार-बार आक्षेपण-क्षतके लगना—गिर जाना होता है ॥५०, ५१॥

सोऽपतानकसंज्ञो यः पातयत्यन्तराऽन्तरा ।

कफान्वितो भृशं वायुस्तास्वेव यदि तिष्ठति ॥५२॥

स दण्डवत् स्तम्भयति कृच्छ्रो दण्डापतानकः ।

हनुग्रहस्तदाऽत्यर्थं सोऽन्तं कृच्छ्रान्विषेवते ॥५३॥

धनुस्तुल्यं नमेघस्तु स धनुःस्तम्भसंज्ञकः ।

अङ्गुलीगुल्फजठरहृदक्षोगलसंश्रितः ॥५४॥

स्नायुप्रतानमनिलो यदाऽऽक्षिपति वेगवान् ।

विष्टब्धाक्षः स्तब्धहनुर्भन्तपार्थः कफं वमन् ॥५५॥

अभ्यन्तरं धनुरिव यदा नमति मानवः ।

तदाऽस्याभ्यन्तरायामं कुरुते मारुतो बली ॥५६॥

बाह्यस्नायुप्रतानस्थो बाह्यायामं करोति च ।

तमसाध्यं बुधाः प्राहूर्वक्षःकट्यूरुभञ्जनम् ॥५७॥

कफपित्तान्वितो वायुर्वायुरेव च केवलः ।

कुर्यादाक्षेपकं स्वन्यं चतुर्थमभिघातजम् ॥५८॥

जो आक्षेपक बीच-बीच में रोगी को मोहित कर देता है, उसको अपतानक१ कहते हैं। जिस समय वायु का कफ के साथ अधिक सम्पर्क होता है और पित्त के साथ कम होता है, उस समय वायु धमनियों में व्याप्त होकर शरीर को दण्ड की भाँति जड़ बना देती है, इसको 'दण्डापतानक' कहते हैं। यह रोग कष्ट साध्य है। यदि वायु के कारण हनु सन्धि जाम हो जाती है, इसे हनुग्रह कहते हैं। इसमें रोगी अब को कठिनाई से चबाता है। वायु शरीर को धनुष की भाँति झुका दे तो 'धनुस्तम्भ' होता है। जिस समय बलवान् वायु—अंगुलि गुल्फ (गिद्धे), जठर (उदर), हृदय, वक्ष (उरःस्थल), गलका आश्रय करके सिरा स्नायु जाल में आक्षेप उत्पन्न करती है, उस समय रोगी 'विष्टब्धाक्ष' (निश्चलनेत्र), स्तब्ध हनु (स्थिर हनु सन्धि-वाला), पार्श्व टूटते हुए एवं कफ (श्लेष्मा), का वमन करते हुए, अन्दर की ओर धनुष के समान मुड़ जाता है, इस अवस्था को अन्तरायाम कहते हैं और जिस समय बलवान् वायु, पादमूल-पिण्डिकाकटि-पीठ, श्रीवा पश्चिम भाग—इन स्थानों के बाह्य स्नायु जालों का आश्रय करके शरीर को बाहर

की ओर झुकाती है, उसको 'बाह्यायाम' कहते हैं। वक्षकटि और ऊरु के टूटने पर यह रोग असाम्य है (यदि वक्षकटि और ऊरु का भंग न हो तो रोगी की चिकित्सा करनी चाहिये)। आक्षेप रोग चार प्रकार का है। यथा—कफयुक्त, पित्तयुक्त, केवल वातजन्य और चौथा अभिघात जन्य१।

वि० मन्तव्य—आक्षेपक—इस रोग में अप-विपरीत अनुचित तनाव होता है। दण्डापतानक—शरीर सीधा तन जाता है। धनुस्तुल्यं नमेत्—धनुष खींचने पर जैसे नमता है वैसे—शरीर या उसके अवयव वेग के समय नमते हैं, सर्वदा के लिये नहीं नम जाते। आयाम—खिचाव या झुकाव—यह भी वेग के समय होता है, सर्वदा नहीं ॥५२-५८॥

गर्भपातनिमित्तश्च शोणितातिस्त्रावाच्छ यः ।

अभिघातनिमित्तश्च न सिध्यत्यपतानकः ॥५९॥

असाम्य अपतानक—

जो अपतानक रोग गर्भपात के कारण से अथवा अतिरक्त-क्षय से या चोट के कारण से उत्पन्न होता है, वह असाम्य है, यदि भाग्यवश कभी अच्छा भी होता है तो विकृति उत्पन्न कर देता है।

वि० मन्तव्य—अपतानक तथा अपतन्त्रक—गर्भक्षय—पात या प्रसव हो जाने पर प्रायः शान्त हो जाता है, परन्तु यदि इस दशा में उत्पन्न हो जाता है तो असाम्य होता है। अभिघात—शिर के भीतरी भाग में अथवा हृदय आदि मर्म पर आघात होने से होता है ॥५९॥

अधोगमाः सतिर्यंगा धमनीरुधर्वदेहगाः ।

यदा प्रकुपितोऽत्यर्थं मातरिश्चा प्रदह्यते ॥६०॥

तदाऽन्यतरपक्षस्य सन्धिबन्धान् विमोक्षयन् ।

हन्ति पक्षं तमाहुर्हि पक्षाघातं भिषग्वराः ॥६१॥

यस्य क्रुस्तं अरीराधर्मकर्मण्यमचेतनम् ।

ततः पतत्यसून् वाऽपि त्यजत्यनिलपीडितः ॥६२॥

पक्षाघात—

जिस समय अत्यन्त कुपित वायु-अधोगामी, तिर्यग्गामी और शरीर में ऊपर को जानेवाली, धमनियों (सिरा-स्नायु आदि) में व्याप्त हो जाती है, उस समय एक पार्श्व के सन्धिबन्धनों को विथिल बनाकर पक्ष (आधे शरीर) का हनन (चेष्टा नाश) करती है। इसको श्रेष्ठ वैद्य पक्षाघात कहते हैं। जिस पुरुष का सम्पूर्ण आधा शरीर अकर्मण्य (चेष्टा रहित) एवं अचेतन (स्पर्शज्ञान रहित) बन जाता है, वह वायु रोग से पीड़ित मनुष्य प्राणों को शीघ्र छोड़ देता है।

वि० मन्तव्य—पक्षाघात—कहा जाता है और प्रायः देखा भी जाता है कि जीवन में पक्षाघात के तीन दौरे

१—अपतानक चार प्रकार का है—दण्डापतानक, अन्तरायाम, बाहिरायाम और धनुस्तम्भ।

१—आक्षेप चार प्रकार का है—अपतानक, संसृष्टाक्षेपक, केवलाक्षेपक और अभिघात जन्य।