भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १ ]

कठिन पदार्थों को खाने से, हृत्पे से, भार उठाने से (शिर पर), विषम या कठिन शय्या से, शिर, नासिका, ओठ, चिखु, ललाट (माथा), नेत्र की सन्धियों में स्थित वायु मुख को पीड़ित करके 'अर्दित' रोग को उत्पन्न करती है। इससे चेहरे का आधा भाग टेढ़ा बन जाता है, श्रीवा भी टेढ़ी हो जाती है शिर हिलता है, वाणी नहीं उठती, (साफ बोला नहीं जाता), नेत्र भ्रूणण्ड आदि विकृत हो जाते हैं। जिस पार्श्व में अर्दित होता है, उस पार्श्व की श्रीवा-चिखु (हनु) और दान्तों में पीड़ा होती है। अर्दित रोग में पूर्वरूप—रोम हर्ष (रोमांच), वेपथु (कम्पन), नेत्रों में मलिनता और (गदलापन) वायु की ऊपर की ओर गति, त्वचा में स्वर्णज्ञान का नाश, तोद (शूल), मन्वास्तम्भ और हनुग्रह उत्पन्न होता है। ये अर्दित रोग के पूर्वरूप हैं, ऐसा रोगविशारद कहते हैं।

वि० मन्तव्य—अर्दित—इसे 'लकवा' कहते हैं। इसका प्रभाव मुख पर ही होता है और आधे मुखमण्डल पर ऊपर से नीचे के आधे भाग पर और कभी २ समय मुखमण्डल पर भी होता है, यथा—अर्धे तस्मिन् मुखार्धे स्यात् केवले वा तद् अर्दितम्। च० वि० अ० २८। अर्थात् पक्षाघात यदि केवल मुख पर ही होता है तो उसे अर्दित कहते हैं ॥६८-७२॥

क्षीणस्थानिस्मिषाक्षस्य प्रसक्तान्युक्तभाषिणः। न सिध्द्यत्यर्दितं बाहं त्रिवर्षं वेपनस्य च ॥७३॥

असाध्य—

जो व्यक्ति क्षीण हो, अनिमेष (स्तम्भ) आँखोंवाले, प्रसक्त (निरन्तर) स्पष्ट बोलनेवाले, पुरुष का एवं बाहम् (गाढ-अतिशय) बढ़ा हुआ, तीन वर्ष का पुराना और वेपन (कम्पन) शील व्यक्ति का अर्दित रोग असाध्य है ॥७३॥

पार्णिप्रत्यङ्कुलीनां तु कण्डरा याऽनिलार्दिता।

सकथनः चेपे निगृह्णीयाद् गुधसीति हि सा स्मृता ॥७४॥

ग्रन्थसी—

गुरुफ के अघो भाग एड़ी एवं अंगुलियों से सम्बन्धित स्थूल कण्डरा वायु से पीड़ित होकर टाँगों की गति को तिरस्कृत कर देती है, उसे ग्रन्थसी कहते हैं ॥७४॥

तलप्रत्यङ्कुलीनां तु कण्डरा बाहुग्रन्थतः।

बाह्योः कर्मक्षयकरी विश्वाचीति हि सा स्मृता ॥७५॥

विश्वाची—

तल (हाथ के अन्तःभाग की कण्डरा)—एवं प्रत्यंगुली (प्रत्येक अंगुलियों) की जो बाह्य कण्डरा है, वह वायु से पीड़ित होने पर बाहुओं की गति का ह्रास करती है, इसको 'विश्वाची' कहते हैं।

वि० मन्तव्य—बाहु की ग्रन्थसी का नाम विश्वाची है।

ग्रन्थसी में—चलने में और विरवाचो में बाहु उठाने में प्रथम कठिनाई होती है, परन्तु पश्चात् वह दूर हो जाती है ॥७५॥

वातशोणितजः शोको जानुमध्ये महारुजः।

शिरः क्रोष्टुकूर्पूवं तु स्थूलः क्रोष्टुकूर्पूवत् ॥७६॥

क्रोष्टुक शीर्ष—

जो सूजन वात एवं रक्त के कारण घुटने में उत्पन्न हो, तीव्र वेदना को करती है, तथा शृंगाल के शिर के समान-स्थूल मोटी होती है, उसे 'क्रोष्टुक शीर्ष' कहते हैं ॥७६॥

वायुः कट्यां स्थितः सकथनः कण्डरामाक्षिपेयाद्।

खञ्जस्तदा भवेज्जनतुः, पङ्कः सकथनोद्धेयोर्यथात् ॥७७॥

खञ्ज और पङ्गु—

जिस समय कटि में आश्रित वायु टाँगों की कण्डरा (सिरा-स्नायुओं) को कार्य हीन कर देती है, उस समय पुरुष खञ्ज—(लंगड़ाकर चलता है) और यदि दोनों टाँगों की गति का नाश हो जाये, तो मनुष्य पङ्गु हो जाता है।

वि० मन्तव्य—खञ्जता तथा पङ्गुता में सकृधि की मांस-पेशियाँ सूज जाती हैं और अस्थियाँ सूज जाती हैं, और संकुचित (छोटी) भी हो जाती हैं। कुणि या अबवाहुक में भी ऐसा ही होता है ॥७७॥

प्रक्रामन् वेपते यस्तु खञ्जन्निव च गच्छति।

कलायखञ्जं तं विद्यान्मुक्तसन्धिप्रवन्धनम् ॥७८॥

कलाय खञ्ज—

जिस समय रोगी चलने के प्रारम्भ में कैंपता है और लंगड़े के समान चलता है उसे 'कलाय खञ्ज' कहते हैं। यह रोग सन्धिबन्धनों के क्षिणित होने से उत्पन्न होता है। (यह रोग कलाय-मटर को खाने से होता है) ॥७८॥

न्यस्ते तु विषमं (मे) पादे रुजः कुर्यात् समीरणः।

वातकण्टक इत्येष विज्ञेयः खुड्डकाश्रितः ॥७९॥

वात 'कण्टक—

जिस समय खुड्डक (एड़ी में अथवा पाद एवं जंघा सन्धि) में आश्रित वायु पाँव के विषम स्थान में पड़ने से वेदना उत्पन्न करती है, उसको 'वात कण्टक' कहते हैं ॥७९॥

पादयोः कुरुते दाहं पिन्तासूकसहितोऽनिलः।

विशेषतश्चक्रक्रमणात् पाददाहं तमादिशेत् ॥८०॥

पाद दाह—

पित्त एवं रक्त के साथ संयुक्त वायु—जिस समय पाँवों में दाह उत्पन्न करती है, इसको पाद दाह कहते हैं। यह रोग अधिक चलनेवालों में विशेष रूप से होता है ॥८०॥

हृष्यतश्चरणौ यस्य भवतश्च प्रसुमवत्।

पादहर्षः स विज्ञेयः कफवातप्रकोपजः ॥८१॥