भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० २ ] ३०

निदानस्थानम्

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पाद हर्ष—

जब दोनों पाँव में हर्ष ( झनझन ) उत्पन्न होता है, और दोनों पाँवों में स्पर्श का अभाव हो जाता है ( अन्दर से शीत ), उसको पादहर्ष कहते हैं, यह रोग कफ-वातके प्रकोप से उत्पन्न होता है ॥ ८१ ॥

अंसदेशस्थितो वायुः शोषयित्वांसवन्धनम् ।

सिराश्राङ्कुष्ठस्य तत्रस्थो जनयत्यववाहुकम् ॥ ८२ ॥

अंस प्रदेश में स्थित वायु स्कन्ध वन्धन ( अंस सन्धि की श्लेष्मा ) को सुखाकर अंस शोष रोग उत्पन्न करती है ! अंस देश में स्थित वायु = अंसप्रदेश की शिराओं का आकुंचन ( संकोच ) उत्पन्न करके अववाहुक रोग को उत्पन्न करती है ॥ ८२ ॥

यदा शब्दवहं स्रोतो वायुराद्युत्थ तिष्ठति ।

मुद्गः श्लेष्मान्वितो वाऽपि बाधिर्यं तेन जायते ॥ ८३ ॥

बाधिर्य—

जब केवल वायु अथवा कफ के साथ ( रक्त-पित्त के साथ भी ) संयुक्त वायु-शब्दवह स्रोतों को घेरकर स्थिर हो जाती है, उस समय मनुष्य बधिर हो जाता है ॥ ८३ ॥

हनुशङ्खशिरोघ्रीवं यस्य भिन्दन्निवानिलः ।

कर्णयोः कुस्तते शूलं कर्णशूलं तदुच्यते ॥ ८४ ॥

कर्णशूल—

जब वायु हनु-शंखप्रदेश, शिर एवं घ्रीवा को विदीर्ण करते हुए, कानों में शूल उत्पन्न करती है, उसे 'कर्णशूल' कहते हैं ॥ ८४ ॥

आयुत्थ सकफो वायुर्धमतीः शब्दवाहिनीः ।

नरान् करोत्यक्रियकान्मूकमिन्मिणगद्दान् ॥ ८५ ॥

जिस समय वायु कफ के साथ मिलकर शब्दवह धमनियों ( नाड़ियों के स्रोतों ) को घेर लेता है, उस समय मनुष्य मूक ( गूढ़ा—Aphosia ), मिन्मिण ( सानुनासिक वाष्पी ), और गद्गद ( अस्पष्ट ) वाणीवाला होता है ॥ ८५ ॥

अधो या वेदना याति वचोर्मूत्रासयोस्थिता ।

भिन्दतीव गुदोपस्थं सा तूनीत्यभिधीयते ॥ ८६ ॥

गुदोपस्थोस्थिता सैव प्रतिलोमविसर्पिणी ।

वेगोः पक्वाशयं याति प्रतितूनीति सा स्मृता ॥ ८७ ॥

तूनी-प्रतितूनी—

जिस समय वन्द ( मलाशय ) और मूत्राशय से उत्पन्न वेदना—गुदा एवं उपस्थ को ( क्रमशः ) विदीर्ण करती हुई नीचे जंघाओं में जाती है, उसे 'तूनी' कहते हैं । जिस समय गुदा तथा उपस्थ से उत्पन्न वेदना प्रतिलोम ( नीचे से ऊपर की ओर ) फैलती है, और रुक-रुककर जोर के साथ पक्वाशय में पहुँचती है, इसको 'प्रतितूनी' कहते हैं ॥ ८६, ८७ ॥

साटोपमस्युप्ररुजमाधमातमुदरं भृशम ।

आधमानमिति जानीयाद्घोरं वातनिरोधजम् ॥ ८८ ॥

आधमान—

जिस समय उदर—कोष्ठ में आटोप ( गुड़गुड़ शब्द ) हो, अत्यन्त वेदना और उदर ( पक्वाशय ) वायु से फूला हो, इसको आधमान कहते हैं । यह रोग कष्टकारी एवं वायु के अवरोध से उत्पन्न होता है ॥ ८८ ॥

विमुक्तपार्श्वहृदयं तदेवामाग्योस्थितम् ।

प्रत्याध्यानं बिजानीयात् कफन्याकुलितानिलम् ॥ ८९ ॥

प्रत्याध्यान—

जिस समय कफ युक्त वायु के कारण आधमान आमाशय से उत्पन्न हो और पार्श्व तथा हृदय में वेदना उत्पन्न करे तो इसको 'प्रत्याध्यान' कहते हैं ॥ ८९ ॥

अष्टीलावद्भ्रान् ग्रन्थिर्मूर्ध्वमायतमुन्नतम् ।

वाताष्टीलां बिजानीयाद् बहिर्मार्गवरोधिनीम् ॥ ९० ॥

अष्टीला—

जिस समय वायु—अष्टीला ( गोल बड़े पाषाण अथवा लुहारों के घन ) के समान—ग्रन्थि के आकार की अति ऊँची—गोलाकार सूजन उत्पन्न करती है इसको वाताष्टीला कहते हैं । यह वायु मल मूत्र के बाह्य वेगों को रोक देती है ॥ ९० ॥

एनामेव रुजायुक्तां वातविण्मूत्ररोधिनीम् ।

प्रत्यष्टीलामिति वदेञ्जठरे तिर्यगुस्थिताम् ॥ ९१ ॥

प्रत्यष्टीला—

जिस समय यही अष्टीला उदर में तिरछी उत्पन्न होकर, वेदना उत्पन्न करती एवं वायु, मल और मूत्र को रोक देती है, इसको 'प्रत्यष्टीला' कहते हैं ॥ ९१ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने वातव्याधिनदानं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥ १ ॥

द्वितीयोऽध्यायः

अथातोऽर्शसौ निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

पाँचों प्रकार की वायु—पित्त एवं कफ के साथ मिलकर अर्शरोग को उत्पन्न करती है, इसलिये अर्श रोग में वायु की प्रधानता होने के कारण वात व्याधि के अनन्तर अर्श निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥

षडर्शांसि भवन्ति वातपित्तकफशोणितसन्निपातैः सहजानि चेति ॥ ३ ॥

अर्श रोग छे प्रकार का है । यथा—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, सन्निपातजन्य और सहज, अर्थात् गर्भ में

१ पञ्चात्मा मासतः पित्तं कफो गुदबलित्रयम् ।

सर्वं एव प्रकुप्यन्ति गुदजानां समुद्भवै ॥