भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० २

रक्त अथवा शुक्र के दुष्ट होने से गुदार्भकमात्र बीज के दूषित होने से जन्म के साथ ही उत्पन्न होती है।

वि० मन्तव्य—विधि भेद से अर्श २ प्रकार के होते हैं— १—सहज, २—जन्मोत्तर कालज। पुनश्च—१—शुष्कार्श—वातज एवं कफज और २—आर्द्रार्श पित्तज एवं रक्तज ॥३॥

तत्रानात्मवतां यथोक्तैः प्रकोपपौर्विरुद्धाध्यजनस्त्री-प्रसङ्गोक्तदुकासनपृष्ठयानवेगविधारणादिभिर्विशेषैः प्रकुपिता दोषा एकत्रो द्विशः समस्ताः ओणतसंहिता वा यथोक्तं प्रस्तुताः प्रधानधमनीरनुप्रपद्याधो गत्वा गुदमाग्न्य प्रदूष्य गुदवलीमांसग्रोहाञ्जनयन्ति विशेषतो मन्दाग्नेः, तथा तृणकाष्ठोपल्लोष्टवस्त्रादिभिः शीतोदकसंस्पर्शनाद्वा कन्द्राः परिवृद्धिमासादयन्ति, तान्यर्शासीत्याचक्षते ॥ सामान्य कारण—

अजितेन्द्रिय पुरुषों में यथोक्त वात प्रकोपक कारणों ( बलवान् के साथ लड़ाई, रूक्ष, शीत, अमिताशन आदि ), से विरुद्ध भोजनों से, अध्यशन से, अति स्त्री-सेवन से, उत्कटासन ( अकडु बैठने ), पृष्ठयान ( घोड़े-वाड़ीसिकल आदि सवारी ) से, वेगविधारण ( मलमूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने ) आदि कारणों से दोष अलग-अलग अथवा दो-दो दोष मिलकर या समस्त रूपमें अथवा रक्त के साथ कुपित होकर क्रमशः फैलकर प्रधान धमनी ( रक्त वाहिनी ) में पहुँचकर गुदा की वलियों को ( छुरियों को ) दूषित करके मांसांकुरों को उत्पन्न करते हैं। मन्दाग्नि पुरुष में यह रोग विशेष रूप से होता है। तिनके, काष्ठ-उपल ( पत्थर ), लोष्ट, वस्त्र आदि से एवं ठण्डे पानी के स्पर्श से ये अंकुर विशेष रूप में बढ़ते हैं। इन अंकुरों को 'अर्श' कहते हैं।

वि० मन्तव्य—मलाशय के नीचे त्रिवलिमय अवयव का नाम गुद है, उसका निम्न भाग "गुदौष्ट" ( गुद का ओठ ) कहलाता है, यह पुरीषोत्सर्ग का मार्ग है, इसमें मांसमय अंकुर-मस्से उत्पन्न हो जाते हैं, जो अर्श कहे जाते हैं, इसे "ववासीर" कहते हैं। ये गुदौष्ट पर भी होते हैं, जो सर्वदा वाहर ही वर्तमान रहते हैं। यह अंकुर एक भी और एकाधिक भी होते हैं। अर्शादि अधिमांसविकाराः ( च० चि० अ० १४ ) अर्थात् ये अर्श मांस के मस्से हैं। मांस में अधिष्ठित विकार हैं ॥४॥

तत्र स्थूलान्नप्रतिबद्धमधपञ्चाकुलं गुदमाहुः, तस्मिन् वलयस्तिस्रोऽध्यर्धाकुलान्तरसमूताः प्रवाहणी विस-

र्जनी संवरणी चेति चतुरङ्गुलायताः, सर्वास्तिर्गने-काङ्कुलोच्छ्रिताः ॥५॥

गुदा—स्थुलान्न से सम्बन्धित साड़े चार अंगुल परिमित भाग को गुदा कहते हैं। इसमें तीन वलियाँ आधे-आधे अंगुल के अन्तर से स्थित हैं। इन वलियों के नाम-प्रवाहिणी, विसर्जनी और संवरणी हैं। ये सब चार अंगुल मोटी ( संकुचिता-वस्था में ) हैं और मूत्र वलियों बिना अन्तर के एक अंगुल ऊपर स्थित हैं।

वि० मन्तव्य—प्रवाहणी-पुरीष का प्रवाहण करती है, उसे निकालने का प्रयत्न करती है, विसर्जनी—उसे त्यागती है, संवरणी—उसे रोकती है। यदि पुरीष नहीं ही रुकता तो गुदौष्ट तब तक रोकता है, जबतक पुरीषोत्सर्गार्थ बैठ जाता है ॥५॥

शङ्खावतनिभाश्चापि उपर्युपरि संस्थिताः। गजतालुनिभाश्चापि वर्णतः संप्रकीर्तिताः। रोमान्तेभ्यो यवाध्यर्घां गुदौष्टः परिकीर्तिताः ॥६॥

प्रथमा तु गुदौष्टादङ्कुलमात्रे ॥७॥ ये वलियाँ शंख के ऊपर-ऊपर पड़े आवर्त्त ( भँवरों ) के समान एक दूसरे के ऊपर स्थित हैं। इनका वर्ण—हाथी के तालु के समान ( कुछ काला लाल ) है। रोम प्रान्तों से ( रोम-राजि से ) डेढ़ यव ऊपर गुदौष्ट है। प्रथम वलि गुदौष्ट से एक अंगुल भर दूर है। एक अंगुल = ८ यव के बराबर या ३।४ इंच है ॥६,७॥

तेषां तु भविष्यतां पूर्वरूपाणि-अन्तेऽश्रद्धा क्रुच्छ्रात पत्किरम्लीका परिदाहो विष्टम्भः पिपासा सकथिसदन-माटोपः कार्यसुदुग्गरबाहुल्यमदणोः रचयथुरन्त्रकृज्जं गुदपरिकर्तनमाशंका पाण्डुरोगप्रहृणीदोषशोषाणां कास-शवासौ बलहानिर्भ्रमस्तन्द्रा निद्रेन्द्रियदौर्बल्यं च ॥८॥

पूर्वरूप— भोजन में अरुचि, भोजन का कठिनाई से पचना, अम्लीका ( खड़े डकार आना ), परिदाह ( हृदय में जलन ), सकथिसदन ( टांगों से न चला जाना-ग्लानि ), आटोप ( आध्मान ), कार्य ( क्रुशता ), उदुग्गर बाहुल्य ( डकारों का आना ), आँखों में सूजन, अन्त्रकृजन ( आँतों में गुड़गुड़ाहट ), गुदपरिकर्तन ( गुदा में कटने के समान क्षत ), पाण्डुरोगप्रहृणीदोषशोषा की आशंका, कास-शवास, शक्तिहास, भ्रम ( चक्कर आना ), तन्द्रा निद्रा और इन्द्रियों में दुर्बलता—ये भावि अर्श के पूर्वरूप हैं ॥८॥ जातेष्वेतान्येव लक्षणानि प्रव्यक्ततराणि भवन्ति ॥९॥ अर्शरोग के उत्पन्न होने पर यही लक्षण अधिक स्पष्ट होते जाते हैं ॥९॥

१ त्रयो विकाराः प्रायेण ये परस्परहेतवः । अर्शासि चातिसारश्च ग्रहणीदोष एव च ॥ एषामनिबले हीने वृद्धिर्दो परिसयः ॥ चरक ।