भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० १

कहा भी है—

बाह्य और मध्य वलि में स्थित अर्श रोग की वैद्य को चिकित्सा करनी चाहिये। अभ्यन्तर वलि में स्थित अर्श रोग का निराकरण करके—(असाध्य समझकर) चिकित्सा करनी चाहिये ॥१६॥

प्रकृपितास्तु दोषा मेदसमिप्रपन्ना मांसशोणिते प्रदूष्य कण्डू जनयन्ति। ततः कण्डूयन्तात् क्षतं समुपजायते, तस्मिंश्च क्षते दुष्टमांसजाः प्ररोहाः पिच्छिलरुधिरस्त्राविणो जायन्ते कूर्चकिनोऽभ्यन्तरमुपरिष्टाद्वा, ते तु शोको विनाश-यन्त्युपदन्ति च पुस्त्यं, योनिमभिप्रपन्नाः सुकुमारान् दुर्गन्धान् पिच्छिलरुधिरस्त्राविणश्चक्राकारान् करोराञ्जनयन्ति, ते तु योनिमुपदन्त्यार्तव च, नाभिमभिप्रपन्नाः सुकुमारान् दुर्गन्धान् पिच्छिलान् गण्डूपदमुखसदृशान् करोराञ्जनयन्ति। त एवोर्ध्वभागताः श्रोत्राक्षिघ्राणवदनेष्वर्शास्युपनिर्वर्तयन्ति, तत्र कर्णजेषु वाधियं शूलं पूतिकर्णता च, नेत्रजेषु वर्त्तावरोधो वेदना स्नावो दर्शनताश्च घ्राणजेषु प्रतिश्यायोऽतिमात्रं क्षयथुः क्रुच्छ्रोच्छ्रासता पूतितस्य सातुनासिकवाक्यत्वं शिरोदुःखं च, वक्त्रजेषु कण्ठोष्ठतालूनामन्यतमस्मिस्तैर्गदगदवाक्यता रसा-ज्ञानं मुखरोगाश्च भवन्ति ॥१७॥

मेदूादि में अर्श—

कृपित हुए वातादि दोष—मेदू (मेहन) में आश्रित होकर मांस एवं रक्त को दूषित करके कण्डू उत्पन्न करते हैं। कण्डू के कारण व्रण उत्पन्न हो जाता है। इस क्षत में दूषित मांस जन्य प्ररोह (अंकुर) शिरन के मणि भाग पर या त्वचा के ऊपर (बाह्यचर्म) उत्पन्न हो जाते हैं। ये अंकुर—पिच्छिल (चिकने), रुधिर का स्नाव करनेवाले और कूर्चकि (सुअर के बाल के समान-मोटे दीर्घ) के समान शिरन के ऊपर या अन्दर होते हैं। ये अंकुर शिरन का नाश कर देते हैं और पुरुषत्व को भी मिटा देते हैं। दूषित दोष योनि का आश्रय करके मांस एवं रक्त को दूषित करके सुकुमार (कोमल), दुर्गन्ध युक्त, चिकने, रक्तस्वावि, छतरी के आकारवाले अंकुरों को उत्पन्न करते हैं। ये अंकुर योनि और आर्तव दोनों का नाश कर देते हैं। ये ही दूषित दोष आन्तों में पहुँचकर कोमल, दुर्गन्धयुक्त, चिकने, गण्डूपद (गिढीये) के मुख के समान अंकुरों को उत्पन्न करते हैं। ये ही दोष श्रोत, आँख, नासिका और मुख में ऊपर की ओर आकर अर्श रोग को उत्पन्न करते हैं। इनके कारण कानों में वधिरता, शूल, कान से पूय (दुर्गन्ध) आना, आँखों में वर्त्तावरोध (आँख की पलक का बन्द होना), पीड़ा, स्नाव तथा अन्धापन उत्पन्न होता है। नासिका में अर्श होने से प्रतिश्याय, छींकों का बहुत आना, कठिनाई से श्वास लेना, पूतितस्य

(नाक से दुर्गन्ध आना), सातुनासिक वाक्य (नासिका मिश्रित वचन) और शिर में वेदना होती है। मुख में—कण्ठ, ओष्ठ, ताखु—इनमें से कहीं पर अर्श होने से, गदगद (अस्पष्ट) वाणी, रस की अज्ञानता और मुख के रोग होते हैं।

वि० मन्तव्य—टाउंसल कण्ठ के अर्श हैं। ये कफ कारक आहार से उत्पन्न होते हैं और कफ नाशक चिकित्सा से शान्त हो जाते हैं। कण्ठरोगों में इन (टाउंसल) का वर्णन नहीं मिलता, किछु कल्पना करना दूसरी बात है। अर्श के समान यद्यपि इनका भी छेदन किया जाता है, परन्तु “अंशस्तत्र सुदारुणः” (च० वि० अ० १४) इसमें थोड़ी भी भूल भीषण होती है ॥१७॥

व्यानस्तु प्रकृपितः श्लेष्माण् परिगृह्य बहिः स्थिराणि कीलवदर्शांसि निर्वर्तयति, तानि चर्मकौलान्यर्शासीत्या-चक्षते ॥१८॥

प्रकृपित व्यान वायु कफ के साथ मिलकर गुदोष्ठ से बाहर (अथवा अन्यत्र त्वचा में) स्थिर (कठोर), कील के समान (शंकु-खुण्टे की भांति) अर्श (अंकुरों) को उत्पन्न करती हैं। इनको चर्मकील रूप अर्श कहते हैं ॥१८॥

भवन्ति चात्र—

तेषु कोलेषु निरस्तोदो मारुतेनोपजायते।

श्लेष्मणा तु सर्वाण्यं ग्रन्थित्वं च विनिर्दिशेत् ॥१९॥

पित्तशोणितजं रौदयं कृष्णत्वं श्लक्ष्णता तथा।

समुदीर्णखरत्वं च चर्मकौलस्य लक्षणम् ॥२०॥

कहा भी है—

इन चर्मकीलों में विशेष रूप से शूल का होना वायु का लक्षण है। कफ के कारण चर्मकीलों का रङ्ग कफ के समान श्वेत और ग्रन्थि रूप इनका आकार होता है। पित्त एवं रक्त-जन्य चर्मकीलों में—रुक्षता, कालापन चिकना रङ्ग तथा समुदीर्णखरत्व (अतिशय खरता) होता है ॥

वि० मन्तव्य—एक आश्रय—चर्मकील इष्टदेवता की कोई मनोती मानने पर लुप्त हो जाते हैं, अर्श-मन्त्राभिमन्त्रित चान्दी का छल्ला पहनने से शान्त हो जाते हैं। अनेक सज्जन इस प्रकार के छल्ले बाँटते हैं। खोज कीजिये ॥१९, २०॥

अर्शासं लक्षणं व्यासादुक्तं सामान्यतस्तु यत्।

तत्सर्वं प्राग्विनिर्दिष्टात्साधयेद्विषजां वरः ॥२१॥

मेदू आदि स्थानों में उत्पन्न अर्श के जो लक्षण संक्षेप में कहे हैं, इनको पूर्व कहे हुए (वात आदि के भेद से विस्ती रूप में—कहे हुए) लक्षणों द्वारा वैद्य को जानना चाहिये। (अथवा अर्श संक्षेप में छेः प्रकार का और विस्तार में पन्द्रह प्रकार का है ऐसा कोई आचार्य मानते हैं) ॥२१॥

अर्शःसु दृश्यते रूपं यदा दोषद्वयस्य तु।

संसर्गं तं विजानीयात् संसर्गः स च षड्विधः ॥२२॥

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