सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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जिस समय अर्श में दोनों के लक्षण स्पष्ट दीखते हों, उस समय इसको संसर्ग जानना चाहिये। यह संसर्ग (मिश्रण) छेः प्रकार का है। यथा—वात-पित्त, वात-कफ, पित्त-कफ, वात-रक्त, पित्त-रक्त, कफ-रक्त, इनके लक्षणों को सूत्रस्थानोक्त वर्ण-वेदना के लक्षणों से जानना चाहिये१ ॥२२॥
त्रिदोषाण्यल्पलिक्लानि याप्यानि तु विनिर्दिशेत्।
द्वन्द्वजानि द्वितीययां बली यान्याश्रितानि च ॥२३॥
कृच्छ्रसाध्यानि तान्याहुः परिसंवत्सरणि च।
सन्निपातसमुत्थानि सहजानि तु वर्जयेत् ॥२४॥
वात-पित्त-कफ इन तीनों दोषों से उत्पन्न, अल्प लक्षणों-वाले अर्श याप्य हैं। द्वन्द्व (संसर्ग) जन्म) जन्म अथवा दूसरी बलि में आश्रित एवं एक साल पुराना अर्श रोग कष्ट साध्य है। सन्निपातजन्म एवं सहजन्म (जन्म के) अर्श सर्वथा असाध्य हैं।
सर्वाः स्थुर्वल्यो येषां दुर्नामभिरुपद्रुताः।
तैस्तु प्रतिहतो वायुरपानः सन्निवर्तते ॥२५॥
ततो व्यानेन सङ्गम्य व्योतिर्मुद्भूनाति देहिनाम् ॥२६॥
अनिमान्द्य का कारण—
जिन पुरुषों की सब बलियाँ अर्श रोग (अंकुरों) से भरी होती हैं, उन पुरुषों में अवरोध होने से अपान वायु रुक जाती है (बाहर नहीं निकलती)। यह अपान वायु व्यान वायु से मिलकर पुरुषों की व्योति (पश्चात्सक) अग्नि को मन्द कर देती है। यह उपद्रव प्रायः करके सहजन्म अर्श रोग में होता है ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थानेऽर्शोनिदानं
नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥ २ ॥
तृतीयोऽध्यायः
अथातोऽश्रमरीणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
गुदा और वस्ति का एक ही समान आश्रय होने से इस रजतीयधर्म की अपेक्षा से अर्श रोग के पीछे अश्रमरी निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
चतस्रोऽश्रमर्या भवन्ति, श्लेष्माधिष्ठानाः। तद्यथा—
श्लेष्मणा, वातेन, पित्तेन, शुक्लेण चेति ॥३॥
अश्रमरी रोग चार प्रकार का है, श्लेष्मा इन अश्रमरियों
१ पन्द्रह भेद—उपरोक्त छेः भेद, वातपित्त-रक्त, वातकफ-रक्त, पित्त-कफ-रक्त, वातजन्म, पित्तजन्म, कफ-जन्म, रक्तजन्म, सन्निपातजन्म और वात पित्त-कफ एवं रक्तजन्म, ये पन्द्रह भेद हैं : सहज अर्शों का इन्हों में अन्तर्भाव होता है।
का अधिष्ठान (समवायी कारण) है। यथा—कफजन्म, वातजन्म, पित्तजन्म, और शुक्लजन्म।
वि० मन्तव्य—अश्रमरी को पथरी कहते हैं। यह वृद्ध की विकृति—से मूत्राशय में आगत श्लेष्मा को केन्द्रित (मूल) बना कर धीरे-धीरे निर्मित होती रहती है और कभी वृद्ध में भी इसका निर्माण हो जाता है। जैसे पाषाण की खान में पाषाण का छोटा कण भी कालान्तर में अपने उपादान का संग्रह करते-करते बड़ा हो जाता है वैसे अश्रमरी भी बढ़ती रहती है। आजकल के चिकित्सक (एलोपैथ) यकृत या पित्तकोश में भी अश्रमरी की सचा मानते हैं, परन्तु वह पित्तग्रन्थि होती है “पित्तेषु इव रोचना गोः” जैसे गौ के पित्त में रोचना (पित्तग्रन्थि) का निर्माण हो जाता है। मेरे प्रिय शिष्य—श्री पं० शिवरामजी वैद्य (खाड़ अम्बाल) ने सन् १९४१ या ४२ में पित्ताश्रमरी (पित्त ग्रन्थि) उदर पर ईख पीड़ने की बेदन घुमा कर पुरीष के साथ निकाली थी, जो छोटे अंगूर के समान थी, परन्तु वह ४-५ मास में सूखकर मटर से भी छोटी हो गई थी, किन्तु मूत्राशय की अश्रमरी सूखकर छोटी नहीं होती। जब मूत्र में वे पदार्थ आकर वस्ति में सन्निहित होने लगते हैं, जो कि मूत्र के साथ निकल जाने चाहिये, तब अश्रमरी का रूप घारण कर लेते हैं ॥३॥
तत्रासंशोधनशीलस्यापध्यकारिणः प्रकुपितः श्लेष्मा मूत्रसंपृक्तोऽनुप्रविश्य वस्तिमश्रमरीं जनयति ॥४॥
सम्पापित—(वात-पित्त और कफ दोषजन्म अश्रमरी की) असंशोधन शील (जो कि वमन, विरेचन नहीं करता), अपध्यकारी (निदान सेवी) व्यक्ति में कफ कुपित होकर मूत्र के साथ मिलकर वस्ति (मूत्राशय) में पहुँचकर अश्रमरी को उत्पन्न करता है। जैसे कहा है—
“संहन्त्यपो यथा दिव्या मास्तोऽपिन्मिश्र वैद्युतः।
तद्वद्वद्वलासं वस्तिस्थम्भूमा संहन्ति सानिलः” ॥४॥
तासां पूर्वरूपाणि—ज्वरो वस्तिपीडारोचकौ मूत्रकृच्छ्रं वस्तिशिरोमुष्कशेफसां वेदना कृच्छ्रावसादो वस्तगन्धित्वं मूत्रस्येति ॥५॥
पूर्वरूप—
ज्वर, वस्ति पीड़ा (वस्ति में आस्मान), अर्शन्धि, मूत्रकृच्छ्र (कठिनाई से मूत्रस्त्राव), वस्ति शिर (बृद्ध एवं गवोनी-मूत्र प्रणाली), मुष्क (अण्डकोष) और शेफ (शिरन) में वेदना (पीड़ा), ज्वर, कृच्छ्रावसाद (कष्टयुक्त अङ्ग ग्लानि, मूत्र में वस्त-गन्ध (बकरे की गन्ध) आना, ये अश्रमरी रोग के पूर्वरूप हैं। (वस्ति शिर का अर्थ शीघ्राणकर जो ने Internal urethral orifice) किया है ॥५॥