भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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मुमुक्षुसंहिता

[ ३० ]

यथास्ववेदनावण दुष्टं सान्द्रमथाविलम् ।

पूर्वरूपेऽरमनः कृच्छ्रान्मूत्रं सूजति मानवः ॥६॥

वातादि दोष के अनुसार वेदना तथा मूत्र में वर्ण (रङ्ग), सान्द्र (घनता), आविल (गदलापन) होता है। अश्मरी रोग के पूर्वरूप में, रोगी कठिनाई से मूत्रत्याग करता है ॥६॥

अथ जातासु नाभिबस्तिसेवनीमेहनेऽवन्यतमस्मिन् मेहतो वेदना मूत्रधारासङ्गः सहधिरमूत्रता मूत्रविकिरणं गोमेदकप्रकाजमत्याविलं ससिकतं विसूजति, धावनलङ्घनप्लवनपृष्ठयानोष्णाध्वगमनैश्चास्य वेदना भवन्ति ॥ ७ ॥ सामान्य लक्षण—

अश्मरी के उत्पन्न होने पर मूत्र प्रवाहण के समय बस्ति (मूत्राशय), सेवनी (perinium) और मेहन इनमें से किसी एक में वेदना (पीड़ा), मूत्र मार्ग में अश्मरी के आने से मूत्र की धारा का निरोध, रक्त मिश्रित मूत्र का आना, अश्मरी के मार्ग से हट जाने पर मूत्र का रङ्ग गोमेदक मणि के समान अति आविल (बहुत गदला) होता है। सिकता (बालुका) मिश्रित मूत्र त्याग करता है। भागना, कूदना, तैरना, पृष्ठयान (छोड़े आदि की सवारी), उष्ण गमन (गरमी में चलना, पखीने के रास्ते जलीय भाग कम होने से अथवा ग्रीष्म ऋतु में), अध्वगमन (सफर करने) से वेदना होती है ॥ ७ ॥

तत्र श्लेष्माश्मरी श्लेष्मलमलमस्थयवहरोऽत्यर्थमुपलिप्याधः परिवृद्धि प्राप्य बस्तिमुखमधिष्ठाय स्रोतो निरुणद्धि, तस्य मूत्रप्रतिघाताहात्यते भिद्यते निस्तुद्यत इव च बस्ति-गुरुः शीतश्च भवति, अश्मरी चात्र श्वेता स्निग्धा महती कुक्कुटपण्डप्रतीकाशा मधुकृष्णवर्णा वा भवति, तां श्लेष्मिकीमिति विद्यात् ॥८॥

इनमें श्लेष्माश्मरी—कफवर्धक अन्न को अधिक मात्रा में सेवन करने से कफ नवघट पंकन्याय से नीचे की ओर बढ़ता हुआ बस्ति मुख (मूत्राशय) का आश्रय करके मूत्र स्रोतों को रोक देता है। मूत्र के रक्त जाने से बस्ति में कुल्हाड़े से काटने के समान वेदना, आरी से चीरने के समान पीड़ा, सूइयों के चुमने के समान शूल होता है, बस्ति भारी और शीतल हो जाती है। कफ जन्म अश्मरी—श्वेत, स्निग्ध, महान् कुक्कुट के अण्डे के समान अथवा महुवे के फूल के रङ्ग की होती है। इसको कफ जन्म अश्मरी कहते हैं ॥८॥

पित्तायुतस्तु श्लेष्मा संघातमुपगम्य यथोक्तां परिवृद्धि प्राप्य बस्तिमुखमधिष्ठाय स्रोतो निरुणद्धि, तस्य मूत्रप्रति-

१ कहा भी है—

“विशीर्णधारं मूत्रं स्यात्तया मार्गनिरोधने ।

तद्व्यपयायासुखं मेहदच्छं गोमेदकोपमम् ।

तत्संशोभात् चते साक्षम् ॥”

घातादृष्यते चूष्यते दृष्टते पच्यत इव बस्तिरुण्णावातश्च भवति, अश्मरी चात्र सरक्ता पीतावभासा कृष्णा भल्लात-काशियप्रतिमा मधुवर्णा वा भवति, तां पैत्तिकीमिति विद्यात् ॥९॥

पित्त से मिश्रित श्लेष्मा संघात (कठिन) होकर पूर्व की भांति बढ़कर बस्ति मुख का आश्रय करके मूत्रवह स्रोतों को रोक लेता है। मूत्र के अवरोध से बस्ति समीपस्थ अग्नि द्वारा मानो तपाया जाता हो, जलाया जाता हो, अथवा पकाया जाता हो, ऐसा प्रतीत होता है तथा उष्ण वात नामक मूत्र-रोग भी होता है। पित्त जन्म अश्मरी—रक्त मिश्रित-पीली झाई वाली, काली, भिलावे की गुठली के समान अथवा शहद के रङ्ग की होती है। इसको पैत्तिक अश्मरी जानना चाहिये ॥९॥

वातयुतस्तु श्लेष्मा संघातमुपगम्य यथोक्तां परिवृद्धि प्राप्य बस्तिगुणमधिष्ठाय स्रोतो निरुणद्धि, तस्य मूत्रप्रतीघातात्तीव्रा वेदना भवति, तदाऽत्यर्थं पीड्यमानो दन्तास्खादति, नाभिं पीडयति, मेदं प्रभूदनाति, पायुं श्वशति, विशर्धते, विदहति, वातमूत्रपुरीषाणि कृच्छ्रुण चास्य मेहतो निःसरन्ति, अश्मरी चात्र श्वावा परुषा विषमा खरा कदम्बपुष्पवत्कण्टकाचिता भवति, तां वातिकीमिति विद्यात् ॥१०॥

वायु से मिश्रित कफ कठिन होकर पूर्वोक्ता की भांति बढ़कर बस्ति मुख का आश्रय करके मूत्रवह स्रोतों को रोक लेता है। मूत्र के रक्त जाने पर बस्ति में तीव्र वेदना होती है। इस वेदना से अत्यन्त पीड़ित होकर रोगी दांतों को भीखता है, नाभि को दबाता है, मेद (शिशन) को मल्ला है, पायु (गुदा) को छूता है, जोर से चिल्लाता है, परितप्त होता है। मूत्र का प्रवाहण करने पर, वायु-मूत्र और मल कठिनाई से बाहर आते हैं। इसमें अश्मरी—कृष्णवर्ण, कठोर, ऊँची-नीची (टेढ़ी), खुरदरी, कदम्ब के फूल के समान कांटों से व्याप्त होती है, इस को वातजन्म अश्मरी जानना चाहिये ॥१०॥

प्रायेणेतास्तिस्त्रोऽश्मर्यां दिवास्वप्नसमगनाध्यशनशीतस्निग्धगुरुमधुराहारप्रियत्वाद्विशेषेण बालानां भवन्ति; तेषामेवाल्यर्बास्तकायत्वादनुपचितमांसत्वाच्च वस्तेः सुखग्रहाहरणा भवन्ति। महतां तु शक्राश्मरी शुक्रनिर्मिता भवति ॥११॥

प्रायः करके ये तीनों दोषजन्म अश्मरियां बालकों में होती हैं। क्योंकि—दिन में सोने से, हितहित आहार करने से, शीत-गुरु-मधुर आहार के प्रिय होने से बच्चों में होती हैं। इन बालकों में बस्ति के तथा शरीर के छोटा होने से, बस्ति में मांस

१ बारह वर्ष से पूर्व शुक्र उत्पन्न नहीं होता। इस अवस्था में प्रौढ प्रनिय का श्वेत वर्ण प्राप्त होता है, जिसको कि कई शुक्र समझते हैं।