भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 287, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 287

अ० ३ ]

निदानस्थानम्

२३६

के बहुत अधिक न बढ़ने से सुख पूर्वक खींचकर बाहर निकाली जा सकती है। बड़े पुरुषों में शुक्राशमरी शुक्र के कारण से उत्पन्न होती है ॥ ११ ॥

मैथुनविद्यादातिमैथुनाद्वा शुक्रं चलिप्तमर्निगच्छद्भि- मार्गगमनादनिलोडभिः संगृह्य मेदवृषणयोरन्तरे सहंरति, संहृत्य चोपशोषयति; सा मूत्रमार्गमावृणोति, मूत्रक्रुच्छं बस्तिवेदनां वृषणयोश्च श्वयश्रुमापादयति, पीडितमात्रे च तस्मिन्नेव प्रदेशे प्रविलयमापद्यते; तां शुक्राशमरीमिति विद्यात् ॥ १२ ॥

एकाएक मैथुन रोकने से, अथवा अति मैथुन के कारण अपने स्थान से चलायमान शुक्रमार्ग से बाहर न आकर अथवा विमार्ग ( उल्टे रास्ते ) में जाकर-वायु द्वारा, ऊपर-नीचे- पाश्वरंथ दोनों धमनियों से एकत्रित होकर, मेद, वृषण के मध्य ( बस्ति द्वार के नीचे, शुक्राशय ) में इकटठा, गोलाकार बन जाता है। इसको एकत्रित करके वायु सुखा देती है। यह शुक्र शुक्ररूपी अशमरी मूत्रमार्ग को बन्द कर देती है। इसके कारण—मूत्र का कठिनाई से आना, बस्ति में वेदना तथा दोनों अण्डकोषों में सूजन उत्पन्न हो जाती है। शुक्राशय पर दबाव डालने से ( गुदा में अंगुलि प्रवेश करके ) इसी प्रदेश में अशमरी-छोटी होने से विलीन हो जाती है। इसको शुक्रा- शमरी समझना चाहिये। ( ये लक्षण नूतन अशमरी के सम- झना चाहिये ) ॥ १२ ॥

वदन्ति चात्र—

शर्करा सिकता मेहो भस्माख्योऽशमरिवैकृतम् ।

कहा भी है—

शर्करा ( बारीक रेत ) मेह, सिकता ( दानेदार वाणुका ) मेह और भस्माख्य ( मूत्र शुक्र नामक मूत्र रोग ) ये अशमरी के विकार ( कार्य ) हैं ॥

अशमर्या शर्करा ज्ञेया तुल्यव्यञ्जनवेदना ॥ १३ ॥

पवनेऽनुगुणे सा तु निरेत्यल्पा विशेषतः ।

शर्करा में अशमरी के समान ही लक्षण और वेदना होती है। खासकर यदि अशमरी छोटी हो, तो वायु के अनुकूल होने पर बाहर निकल आती है।

वि० मन्तव्य—अशमरी प्रारम्भ में जब वह छोटी होती है तो मूत्र के साथ निकल भी जाती है और बड़ी होने पर भी यदि वह टूट २ कर कण रूप में परिणत या विभक्त होने लागी है तो मूत्र के साथ निकलती रहती है, यही सिकता या शर्करा कहलाती है। जैसे पाषाण का चूर्ण—सिकता ( बारीक वाल्ड ) तथा शर्करा ( मोटा वाल्ड रेत ) कहलाता है। भस्मक मेह में—भस्म के घोल कासा मूत्र होता है ॥ १३ ॥

सा भिन्नमूर्तिर्वातेन शर्करेत्यभिधीयते ॥ १४ ॥

हृत्पीडा सक्रियसदनं कुक्षिशूलं च वेपथुः ।

तृष्णोर्ध्वगोऽनिलः काष्ण्यं दौर्बल्यं पाण्डुग्रात्रता ॥ १५ ॥ अरोचकाविपाकौ तु शर्करातं भवन्ति च ।

यही अशमरी जब वायु द्वारा छोटे-छोटे परमाणुओं में विभक्त हो जाती है तब इसको शर्करा कहते हैं। शर्करा रोगी में—हृदय प्रदेश में वेदना, सक्रिय सदन ( टांगों में रूखनि ) उदरशूल, कम्पन, तृष्णा, वायु का ऊपर को आना, कृष्णवर्णता, दुर्बलता, शरीर में पीलापन ( रक्त की कमी ), अरुचि और अजीर्ण होता है ॥ १४, १५ ॥

मूत्रमार्गप्रवृत्ता सा सक्ता कुर्यादुपद्रवान् ॥ १६ ॥

दौर्बल्यं सदनं कार्यं कुक्षिशूलमरोचकम् ।

पाण्डुत्वमुष्णवातं च तृष्णां हृत्पीडनं वमिम् ॥ १७ ॥

जिस समय अशमरी मूत्रमार्ग में पहुँचकर रुक जाती है, उस समय—दुर्बलता, बेचैनी, कुशता, उदरशूल, अरुचि, पाण्डुरोग, उष्णवात ( मूत्ररोग ), तृष्णा, हृदय में वेदना और वमन—इन उपद्रवों को उत्पन्न करती है।

वि० मन्तव्य—यदि वह शर्करा कुछ बड़ी होती है तो मूत्रमार्ग में अटक जाती है ॥ १६, १७ ॥

नाभिपृष्ठकटीमुष्कगुदवृद्धक्षणशेफसाम् ।

एकद्वारस्तनुत्वक्को मध्ये बस्तिरधोमुखः ॥ १८ ॥

अलाब्धा इव रूपेण सिरास्तानुपरिग्रहः ।

बस्तिर्बस्तिजिरश्चैव पौरुषं वृषणो गुदः ।

एकसंबन्धिनो ह्येते गुदास्थिविराश्रिताः ॥ १९ ॥

नाभि, पृष्ठ ( पीठ ), कटि, अण्डकोष, गुदा, वंक्षण ( Groin ) और शेफ ( शिरन ), इनके मध्य में—नीचे की ओर मुख किये—एक द्वारवाली बस्ति है, बस्ति की स्वचा बहुत पतली ( सूक्ष्म ) है। बस्ति—( मूत्र से खाली होने पर ) अलाबु ( घिया कदवू ) के समान रूपवाली है, ( मूत्र से भरने पर हंस के डिम्ब के आकार की भाँति होती है )। बस्ति में सिरा स्तानु का जाल है, ( मांस नहीं है ) बस्ति ( मूत्राशय ) बस्ति शिर पौरुष ( शिरन या भग ), वृषण ( अण्डकोष ) और गुदा—ये एक समान आश्रयवाले हैं, अर्थात् गुदास्थित विवर में स्थित हैं ॥ १८, १९ ॥

मूत्राग्नयो मलाधारः प्राणायतनमुत्तमम् ॥ २० ॥

पक्वाग्नयगातास्तत्र नाड्यो मूत्रवहास्तु याः ।

तर्पयन्ति सदा मूत्रं सरितः सागरं यथा ॥ २१ ॥

सूक्ष्मत्वान्नोपलभ्यन्ते मुखान्यासां सहस्रजः ।

नाडीभिरुपनीतस्य मूत्रस्यामाग्यानन्तरात् ॥ २२ ॥

जाग्रतः स्वपतश्चैव स निःस्पन्दनेन पूर्यते ।

आमुखात्सलिले न्यस्तः पाश्चैभ्यः पूर्यते नवः ॥ २३ ॥

१ कबिराज हाराणचन्द्र जी ने—‘अलाब्धा इव रूपेण’ आदि पाठ एक सम्बन्धिनी से पूर्व पढ़ा है। यह ठीक है ॥