भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ३ ]

मूत्राशय रूपी मलाधार ( किङ् रूप मल का आश्रय ) और प्राणों का श्रेष्ठ स्थान है, इस पक्वाशय में रहनेवाली मूत्र-वहा नाडियाँ मूत्रद्वारा वस्ति को सदा भरती रहती हैं, जिस प्रकार कि नदियाँ सागर को भरती हैं । इन नाडियों के हजारों मुख सूक्ष्म होने के कारण पता नहीं लगता । आमाशय तथा पक्वाशय के बीच से नाडियों द्वारा लाये हुए मूत्र के निःस्पन्द ( मन्द-मन्द क्षरण ) से जाग्रत एवं स्वप्नावस्था में ( रात दिन ) वस्ति भरती रहती है । जिस प्रकार कि नये घड़े को गले तक पानी में डुबोकर रखने पर पारशों से पानी रिस रिस कर घड़े को भर देता है, उसी प्रकार मूत्र द्वारा वस्ति भरती है । श्री घाणेकरजी का कहना है कि “यह वर्णन प्रत्यक्ष विरुद्ध अतएव अप्रामाणिक है” ।

वि० मन्तव्य—नाभि....पूर्वतै—इस पाठ में वस्ति के आकार तथा मूत्र निर्माण आदि का बहुत ही सुन्दर एवं युक्ति-युक्त वर्णन दिया गया है, परन्तु खेद है कि यह श्रीगणनाथ सेन जी तथा श्रीघाणेकरजी को पसन्द नहीं आया और अपनी ओर से उक्त दोनों सज्जनों ने अप्रिय आक्षेप भी कर डाले हैं । मला, हम उनको दुहराना पसन्द नहीं करते, परन्तु इस पाठ की अच्छाई-सच्चाई दिखा देने का यत्न अवश्य करेंगे—वस्ति जहाँ बतलाई गई है वहीं है इसमें कोई विप्रतिपत्ति नहीं है । यह मूत्र का आशय—आकर शयन करने—ठहरने का स्थान है और उसका अधः की ओर एक मुख भी है ( तीन नहीं ) । इसमें जितना भी मूत्र संचित होता है वह वस्तुतः पक्वाशय ( मलाशय ) के द्रवमल ( मूलपुरीष मय मलसार-रस से रहित मल ) का द्रवांश ही है, रक्त में जो आहार का सार-भूत रस मिलता है वह तो धातु पोषण में व्यय होता है न कि उसका मूत्र ( जो मल है ) बनता है । इसका प्रत्यक्ष प्रत्येक पाठक स्वतः कर सकता है—यदि पुरीषोत्सर्ग में विलम्ब कर दिया जाय तो मूत्र अधिक आता है और पुरीष अपेक्षाकृत गाढा आता है । अतएव “पक्वाशयगताः मूत्रवहा नाड्यः ( नाल्यः-सिराः ) मूर्त्रं सदा तर्पयन्ति” लिखा है । “यथा सरितः सागरं तर्पयन्ति” उदाहरण मात्र है, जैसे छोटी २ नदियाँ बड़ी नदियों में मिलकर सागर को सर्वदा भरती रहती हैं । परन्तु इसके मुख-मुहाने इतने सूक्ष्म हैं कि चर्मचतुर्भुओं से उपलब्ध-सम्यक् ज्ञात नहीं होता, यही वृक्ष हैं जो वस्ति शिर नाम से इसी सन्दर्भ में कहे गये हैं । इनमें मूत्र का निःस्पन्द वैसे ही होता है जैसे कोरे घड़े को जल में गले तक डुबाकर रखने से घड़े के भीतर जल का निःस्पन्द होता रहता है । वृक्षों से आनेवाले दोनों छोटों को वैदिक कालीन ऋषि भी जानते थे जो “गवीनी” नामकरण कर गये और सुश्रुत भी

जानता था जो इसी सु०शा०अ० ६ में “मूत्रवहे द्वे” ( छोटसी भवतः ) लिख गया है और चरक भी जानता था जो “मूत्र वहानां छोटसां वस्तिः वंक्षणी च मूलम्” लिख गया है । भले ही गणनाथ सेन और श्री घाणेकरजी आदि सज्जन—ऐलौपैथी के “शारीर” के पूर्व न जानते हों । वंक्षण शब्द-वांशी-कांक्षायां धातु से बनता है जो तूट का वाचक है और तूट ( तृष् ) तृष्-पिपासा का वाचक है । वंक्षण जब अधिक जल खींचने लगते हैं तब पिपासा भी अधिक लगती है, यथा—प्रमेह में “तूट स्वादु आस्थं च जायते” पिपासा अधिक हो जाती है । आहार रस भी यद्यपि तरल होने के कारण जलीय है तथापि वह उतना ही जल अपने में लेता है, जितने से वह उचित रूप में तरल बने यदि अधिक जल लेता है तो उसका अभिष्यन्द होने लगता है, जिससे अवयवों में शोथ हो जाता है । वंक्षण—वस्ति सिरस का वाचक है, क्योंकि वस्ति सिरस—मूल-प्रारम्भ स्थल वही है ‘ऊर्ध्वमूलमधः शाखं ( गीता )’ । और अन्न का पाचन पीला पित्त-आहार रस के साथ नहीं जाता-छनता-मिलता । फलतः रस श्वेत बना रहता है, परन्तु वह मल द्रव में से अधिकांश—द्रवांश के साथ जाता है और वृक्ष—रक्त में से भी—पित्त मिश्रित द्रवांश को लेते हैं, फलतः मूत्र का वर्ण पीला रहता है और सुनिये—यदि २-३ दिन पुरीषोत्सर्ग न किया जाय तो पुरीष का वर्ण काला रह जाता है और वह सूखकर मँगान बन जाता है । इससे भी प्रमाणित होता है कि मलद्रव से ही मूत्र बनता है, रस से या रक्त से नहीं ॥ २०-२३ ॥

घटो यथा तथा विद्धि बस्तिमूर्त्रेण पूर्वतै ।

एवमेव प्रवेशेन वातः पित्तं कफोऽपि वा ॥ २४ ॥

जिस प्रकार से घड़े में स्नेह पहुँच जाता है, उसी प्रकार से वात, पित्त, कफ मूत्र के साथ मिलकर वस्ति में पहुँच कर अश्वरी रोग उत्पन्न करते हैं ॥ २४ ॥

मूत्रयुक्तमुपस्नेहात् प्रविश्य कुशतेऽश्वरीम् ।

अप्यु स्वच्छा (स्था) स्वपि यथा निषिक्तामु नवे घटे ॥

कालान्तरेण पङ्कः स्यादश्वरीसंभवस्तथा ।

संहन्यापो यथा दिव्या मारुतोऽग्निश्च वैद्युतः ॥ २५ ॥

तद्वलासं वस्तिस्थमूष्मा संहन्ति सानिलः ।

नूतन ( अति स्वच्छ ) घड़े में अत्यन्त स्वच्छ पानी के रखने पर भी, कालान्तर में कीचड़ उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार से वस्ति में निर्मल मूत्र से भी अश्वरी बन जाती है । जिस प्रकार से दिव्य ( अन्तरिक्ष ) जल को वायु, अग्नि और विजली कठोर ( ओले के रूप में ) बना देती है, उसी प्रकार से मूत्राशय स्थित बलास ( कफ ), को ऊष्मा ( पित्त ) और वायु कठोर बना देती है ।