सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंअ० ४] ३९
निदानस्थानम्
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वि० मन्तव्य—मूत्र के साथ—वायु, पित्त एवं कफ की वृद्धों से छनकर वस्ति में आ जाते हैं, मूत्र में पीलापन पित्त का ही होता है, श्वेतता या लसीलापन कफ का ही होता है। वृद्धों के विकृत होने पर—शरीरोपयोगी अन्य धातुओं के उपादान भी रसमय रक्त में से छनकर मूत्र के साथ बहने लगते हैं। वृद्धों के विषय में आयुर्वेद बहुत कुछ जानकारी रखता है, यथा—मेदोवहानां क्षोतसां वृद्धौ मूल—रक्त में मिश्रित मेदस के उपादान को मूत्र के साथ न बहने देने का मूल-कारण वृद्ध है, अतएव शार्ङ्गधर में लिखा है कि—वृद्धौ पुष्टिकरी शोको जठरस्थस्य मेदसः ॥ २५, २६ ॥
मारुते प्रगुणे वस्तौ मूत्रं सम्यक् प्रवर्तते।
विकारा विविधाश्चापि प्रतिलोमे भवन्ति हि ॥२७॥
वस्ति में वायु के अनुकूल होने पर मूत्र भली प्रकार से प्रवृत्त होता है। वायु के प्रतिलोम होने पर नाना प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं ॥ २७ ॥
मूत्राधाताः प्रमेहाश्च शुक्रदोषास्तथैव च।
मूत्रदोषाश्च ये कचिद्वस्तावेव भवन्ति हि ॥२८॥
वायु के प्रतिलोम होने से ही, वस्ति में, मूत्राधात, प्रमेह, शुक्र दोष और मूत्र दोष सम्बन्धी रोग होते हैं ॥ २८ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थानेऽश्वमेरीनिदानं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥ ३ ॥
चतुर्थोऽध्यायः ✓
अथातो भगन्दराणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
अश्वमेरी और भगन्दर रोग का आश्रय स्थान वस्ति और गुदा है, ये दोनों स्थान समान आश्रय हैं, इसलिये अश्वमेरी निदान के पीछे भगन्दर निदान कहते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥ १, २ ॥
वातपित्तश्लेष्मसन्निपातागन्तुनिमित्ताः शतपोनको-पूश्वीवपरिसाविशन्वृकावर्तन्मार्गिणो यथासंख्यं पञ्च भगन्दरा भवन्ति। ते तु भगगुदवस्तिप्रदेशादराणाच्च भगन्दरा इत्युच्यन्ते। अभिन्नाः पिडकाः भिन्नास्तु भगन्दराः ॥
वायु, पित्त, कफ, सन्निपात एवं आगन्तुज, कारणों से क्रमशः पाँच प्रकार के भगन्दर उत्पन्न होते हैं। यथा—शत-
१ अश्वमेरी कफ जन्य है, क्योंकि शरीर में कफ एक त्रिकास वाला पदार्थ है। इसके न्युक्लियम के चारों ओर दोष एकत्रित होकर अश्वमेरी बनाते हैं। दोषों को एकत्रित होने के लिये एक केन्द्र चाहिये। वह केन्द्र कफ होता है। जैसे बछड़ा खूण्डे से बन्ना होने पर उसके चारों ओर ही घूमता है, इसी प्रकार दोष इसके चारों ओर एकत्रित होते हैं।
पोनक, उष्ट्रग्रीव, परिस्रावि, शम्भुकावर्त्त और उन्मार्गि। ये भग स्थान, गुदा और वस्ति स्थान को दारण करते हैं इसलिये इन्हें भगन्दर कहते हैं। जब तक नहीं पकते तब तक इनका नाम पिडका है, और पककर फटने से इनका नाम भगन्दर है। (बागमह ने परिज्ञेपी, ऋजु और अशोर्ज भगन्दर, ये तीन अधिक कहे हैं) ॥ ३ ॥
तेषां तु पूर्वरूपाणि—कटीकपालवेदना कण्डूदोहः शोफश्च गुदस्थ भवति ॥ ४ ॥
पूर्वरूप—
कटिकगाल (नितम्बास्थि-त्रिकास्थि) में वेदना, गुदा में कण्डू और दाह, और गुदा में सूजन का होना, ये भगन्दरों के पूर्वरूप हैं ॥ ४ ॥
तत्रापथ्यसेविनां वायुः प्रकुपितः सन्निवृत्तः स्थिरी-भूतो गृहसभितोऽङ्गुले द्रवङ्गुले वा मांसजोगिते प्रदूष्यारुणवर्णा पिडकां जनयति, साऽस्य तोदादीन् वेदनात्रिशोषाञ्जनयति, अप्रतिक्रियमाणं च पाकमुपैति, मूत्राशयाभ्यासगतत्वाच्च व्रणः प्रकिलन्तः शतपोनकवदणुमुखैरिच्छिद्रेण पृथ्यते, तानि च छिद्राण्यजस्ममच्छं फेतातुर्विदमधिकमात्माव स्रवन्ति, व्रणश्च ताड्यते भिद्यते छिद्यते सूचीभिरिव निस्तुद्यते, गुदं चावदीयते, उपेक्षिते च वातमूत्रपुरीषरेत-सासप्यागमश्च तैरेव छिद्रैर्भवति; तं भगन्दरं शतपोनकमित्याचक्ष्यते ॥ ५ ॥
अपथ्य सेवन करनेवाले पुरुष में वायु कुपित होकर अपने कार्यों से निवृत्त एवं निश्चल होकर गुदा के चारों ओर एक या दो अंगुल परिमित स्थान में मांस तथा रक्त को दूषित करके, लाल रङ्ग की पिडका उत्पन्न करता है। यह पिडका तोद (चुमने की सी वेदना) आदि रूपी वेदनाओं को उत्पन्न करता है। चिकित्सा न करने पर पिडका पक जाती है। मूत्राशय के समीप में होने से व्रण आर्द्र एवं शतपोनक (आटा छानने की चल्नी), भांति सूक्ष्म मुखवाले छिद्रों से भर जाता है। इन छिद्रों से निरन्तर स्वच्छ, श्वाग से मिश्रित बहुत अधिक स्नाव बहता है। व्रण में ताड्यते (दण्डे से पीड़ने के समान), भिद्यते (कुठार से काटने के समान), छिद्यते (दाँतों से काटने के समान), सूर्य्यों के चूमने के समान वेदना होती है, गुदा फटती सी प्रतीत होती है। वायु मूत्र, मल और शुक्र भी इन्हीं छिद्रों से बाहर आता है। इस भगन्दर को शतपोनक कहते हैं।
पित्तं तु प्रकुपितमनिलेनाधः प्रेरितं पूर्ववदवस्थितं रक्तं तन्वीमुच्छिन्नामुष्ट्रग्रीवाकारां पिडकां जनयति; साऽस्य
१ पिडका के उत्पन्न होने से मूत्र सम्पूर्ण या आधे रूप में रुककर, मांस, शिरा स्नायु को दूषित करके समीपवर्ति स्थान को सदाधार्द्र रखता है।