भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ४१ ]

चोपादीन् वेदनाविशेषाञ्जनयति, अप्रतिक्रियमाणं च पाकमुपैति, व्रणश्चानिन्धाराभ्यामिव दहते, दुर्गन्धमुष्ण-मात्सावं स्तवति, उपेक्षितश्च वातमूत्रपुरीषरेतांसि विस्मृजति, तं भगन्दरमुष्टुप्रोविमित्याचक्षते ॥ ६ ॥

अपथ्य सेवन से पित्त प्रकृपित होकर वायु के द्वारा नीचे की ओर प्रेरित होकर पूर्व की भांति निश्चल बनकर लाल रङ्ग की पतली, ऊपर को उठी हुई ऊँट की श्रीवा के समान बीच में से दबी हुई पिङ्का उत्पन्न करता है। इसमें चोष ( जलन ) आदि वेदनायें होती हैं। चिकित्सा न करने पर यह पिङ्का पक जाती है। व्रण में, अग्नि एवं क्षार से पकने के समान वेदना होती है, जलन होती है। दुर्गन्ध युक्त गरम स्नायु बहता है, उपेक्षा करने पर व्रण में से वायु-मूत्र-मल-शुक्र बाहर आता है। इस भगन्दर को 'उष्टुप्रोव' कहते हैं ॥ ६ ॥

श्लेष्मा तु प्रकृपितः समीरणेनाथः प्रेरितः पूर्ववद-वस्थितः शुक्लावभासां स्थिरां कण्डुमतीं पिङ्कां जनयति, साऽस्य कण्डुवादीन् वेदनाविशेषाञ्जनयति, अप्रतिक्रिय-माणं च पाकमुपैति, व्रणश्च कठिनः संरम्भी कण्डुप्रायः, पिच्छिलमजस्त्रमात्सावं स्तवति, उपेक्षितश्च वातमूत्रपुरीष-रेतांसि विस्मृजति, तं भगन्दरं परिस्राविणमित्याचक्षते ॥

अपथ्य सेवन से कफ कृपित होकर वायु के द्वारा नीचे प्रेरित होकर पूर्व की भांति निश्चल बनकर मोती की चमक-वाली श्वेत रङ्ग की स्थिर एवं कण्डुयुक्त पिङ्का को उत्पन्न करता है। यह पिङ्का-कण्डु आदि वेदनाओं को उत्पन्न करती है। चिकित्सा न करने पर पक जाती है। इसमें व्रण कठिन, संरम्भी ( निरन्तर वेदनाशील ), कण्डुबहुल होता है। निरन्तर चिकना स्नायु बहता रहता है। उपेक्षा करने पर व्रण से वायु-मूत्र-मल-शुक्र बहने लगता है। इस भगन्दर को 'परिस्रावी' कहते हैं ॥ ७ ॥

वायुः प्रकृपितः प्रकृपितौ पित्तश्लेष्माणौ परिगृह्याधो गत्वा पूर्ववदवस्थितः पादाङ्गुष्ठप्रमाणां सर्वलिङ्गां पिङ्कां जनयति, साऽस्य तोददाहकण्डुवादीन् वेदनाविशेषाञ्जन-यति अप्रतिक्रियमाणं च पाकमुपैति, व्रणश्च नानाविध-वर्णमात्सावं स्तवति, पूर्णनदीगम्बूकावर्तवैचात्र समुत्ति-ष्ठन्ति वेदनाविशेषाः, तं भगन्दरं अम्बूकावतमित्याचक्षते ॥

अपथ्य सेवन से कृपित वायु कृपित पित्त कफ को साथ लेकर नीचे की ओर आकर पूर्व की भांति निश्चल होकर, पाँव के अँगूठे के समान, तीनों दोषों के लक्षणों से युक्त पिङ्का को उत्पन्न करती है। इसमें तोद, दाह, कण्डु आदि के रूप में वेदनायें होती हैं। चिकित्सा न करने पर यह पिङ्का पक जाती है। व्रण में से नाना प्रकार का स्नायु बहता है। भरी हुई नदी के समान अथवा शम्बूक ( शंख ) के आवर्त ( भँवर-चक्कर )

की तरह से निरन्तर तीव्र वेदना उत्पन्न होती है। इस भगन्दर को 'शम्बूकावर्त' कहते हैं। आवर्त अर्थात् Boring pains। मुद्देन मांसलुब्धेन यदस्थिशल्यमन्नेन सहाम्ब्यवहृतं यदाऽवगाढपुरीषोनिश्ममपानेनाथः प्रेरितमसम्यगागतं गुदमपक्षिणोति तदा क्षतनिमित्तः कोथः उपजायते, तस्मिन्च क्षते पृथुरुषिरावकोर्णमांसकोशे भूमाविव जल-प्रकिलन्तार्याक्रमयः संजायन्ते। ते भक्षयन्तो गुदमनेकषा पार्श्वतो दारयन्ति, तस्य तैर्मागैः कृमिकृतैर्वातमूत्रपुरीष-रेतांस्यभिनिःसरन्ति तं भगन्दरमुन्मागिणमित्याचक्षते ॥ आगन्तुज भगन्दर—

मुद् व्यक्ति मांस के लालच में अस्थि शल्य को अन्न के साथ खा जाता है, तब यह शल्य कठिन मल के साथ मिलकर अपान वायु द्वारा नीचे की ओर प्रेरित होकर—अनुचित रूप से ( तिरछा ) आकर गुदा को चोट पहुँचाता है। क्षत के कारण से यहाँ पर कोथ ( पूतिभाव दुर्गन्ध-सङ्गद ) उत्पन्न होता है। पूय और रक्त से भरे इस क्षत में मांस से सड़ने से कृमि उत्पन्न हो जाते हैं, जिस प्रकार कि जल से गीली भूमि में कोई उत्पन्न हो जाते हैं। ये कृमि गुदा को खाते हुए पार्श्वों में गुदा को विदीर्ण कर देते हैं। कृमियों से बनाये इन मागों में से, वायु-मल—मूत्र और शुक्र बाहर निकलने लगता है। इस भगन्दर को 'उन्मागी' ( तिर्यग्गामी ) कहते हैं ॥ ८ ॥

भवन्ति चात्र— उत्पद्यतेऽल्पस्क ओफात् क्षिप्रं चाणुपशाम्यति। पाद्यन्तदेशे पिङ्का सा ज्ञेयाऽन्या भगन्दरात् ॥१०॥ पायोः स्याद् द्रव्यदुल्ल देशे गूढमूला सरुज्वरा। भागन्दरीति विज्ञेया पिङ्काऽप्ता विपर्ययात् ॥११॥ कहा भी है—

सृजन के कारण से थोड़ी वेदनावाली एवं शीघ्र शान्त होने वाली जो पिङ्का गुदा के समीप उत्पन्न होती है वह भगन्दर से भिन्न होती है। गुदा के दो अंगुल परिमित स्थान में गूढ मूल ( गम्भीर मूलवाली ) एवं वेदना तथा ज्वरकारी जो पिङ्का उत्पन्न होती है, इसको उपर्युक्त पिङ्का से भिन्न भगन्दर को उत्पन्न करनेवाली पिङ्का समझना चाहिये ॥११॥ यानयानामल्लोत्सर्गात् कण्डुरदाहशोफवान्। पायुर्भवेद् रुजः कटयां पूर्वरूपं भगन्दरे ॥१२॥

पूर्वरूप में— यान ( रथादि ) की सवारी से अथवा मल के त्याग में प्रथम पायु में, कण्डु, जलन, वेदना और सृजन होती है, कृमि में वेदना होती है ॥ १२ ॥

घोराः साधयितुं दुःखाः सर्व एव भगन्दराः। तेष्वसाध्यच्छिदोषेभ्यः क्षतजश्च भगन्दरः ॥१३॥

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