सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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सब ही भगन्दर वीर ( कष्टदायक ) एवं कुच्छ्रास्य हैं । इनमें से स्रिपातजन्य एवं क्षतजन्य ( आगन्तुज ) भगन्दर असाध्य हैं ॥१३॥ इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने भगन्दरनिदानं नाम चतुर्थोऽध्यायः ॥४॥
पञ्चमोऽध्यायः
अथातः कुष्ठनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
भगन्दर रोग के समान असाध्य कुष्ठ रोग के निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१, २॥
मिथ्याहाराचारस्य विशेषाद् गुरुविरुद्धासात्म्याजी- र्णाहिताशिः स्नेहपीतस्य वान्तस्य वा व्यायामप्राग्यधर्म- सेविनो ग्राम्यानुपौदकमार्साणि वा पयसाऽभोक्षणमस्ततो यो वा मज्जत्यस्मृष्माभितमः सहसा छर्दिवा प्रतिहन्ति, तस्य पित्तश्लेष्माणी प्रकृपितौ परिगृह्यानिःलः प्रवृद्धस्ति- यंग्माः सिराः संप्रपद्य समुद्धृत्य बाह्यमार्गं प्रति समन्ता- द्विक्षिपति; यत्र यत्र च दोषो विक्षिप्रो निश्चरति तत्र तत्र मण्डलानि प्रादुर्भवन्ति, एवं समुत्पन्नस्वचि दोषस्तत्र तत्र च परिवृद्धि प्राप्याप्रतिक्रियमाणोऽभ्यन्तरं प्रतिपद्यते धातुनभिदूषयन् ॥३॥
मिथ्या (अनुचित) आहार (अन्न पान) एवं आचार (मनु धर्मीक-आचमन-स्नान आदि नियमों) से, विशेष करके गुरु (मारी), विशुद्ध (हिताहितीय अध्याय में कहे हुए), असाध्य (आत्मा के प्रतिकूल) भोजन से, अजार्ण में भोजन करने से, अहित वस्तुओं के सेवन से, स्नेह पान करके अथवा वमन कर्म करके व्यायाम, ग्राम्यधर्म (मेथुन) के सेवन से, अथवा बहुत करके दूध के साथ ग्राम्य अथवा आनूर (जल बहुल) मांस के सेवन से, ऊष्मा (अग्नि) से, अभितम (गरम) होने पर स्नान करने से, एकदम से वमन के वेग को रोकने से वायु कुपित होकर पित्त एवं कफ को साथ में लेकर, तिरछी जानेवाली शिराओं में पहुँचकर इनको दूषित करके बाह्यमार्ग (रक्त- लसीका-स्वचा और मांस) को चारों ओर से घेर लेते हैं। जिस स्थान पर दोष प्रक्षित होकर बाहर निकलता है, उस उस स्थान में मण्डल (चक्के) उत्पन्न हो जाते हैं। इस प्रकार से स्वचा में उत्पन्न दोष उस उस स्थान में बढ़कर, चिकित्सा न करने पर रोम मार्ग से अन्दर पहुँचकर धातुओं को दूषित कर देता है ॥३॥
तस्य पूर्वरूपाणि—स्वकृपासूक्ष्मकस्माद्वोमहर्षः कण्डुः स्वेदबाहुल्यमस्वेदनं वाऽङ्गप्रदेशानां स्थापः क्षत- विसर्पणमसजः कृष्णता चेति ॥४॥
कुष्ठ के पूर्वरूप—स्वचा में कठोरता, बिना कारण के ही रोमांच होना, शरीर में कण्डु, पसीने का बहुत आना वा
विलकुल न आना, अंग-प्रत्यंगों में स्पर्श ज्ञान का अभाव, क्षत विसर्पण (व्रण का फैलना) और रक्त का काला पड़ना, ये सब कुष्ठों के पूर्वरूप हैं ॥४॥
तत्र सप्त महाकुष्ठानि, एकादश लुद्रकुष्ठानि, एव- मष्टादश कुष्ठानि भवन्ति । तत्र महाकुष्ठान्यस्फोटु- म्बरध्वं (क्षं) जिह्वाकपालकाकणकपुण्डरीकदुद्रकुष्ठानांति । लुद्रकुष्ठान्यपि स्थूलारुहं महाकुष्ठमेककुष्ठं चर्मदलं विसर्पः परिसर्पः सिध्मं विचर्चिका किटिभ (मं) पामा रकसा चेति ॥५॥
सर्वाणि कुष्ठानि सवातानि सपित्तानि सश्लेष्माणि सकृमीणि च भवन्ति, उत्सन्नतस्तु दोषग्रहणसभिभवात् ॥ संख्या—
कुल मिलाकर कुष्ठ अष्टारह प्रकार के हैं। इनमें सात महाकुष्ठ और ग्यारह लुद्रकुष्ठ हैं। महाकुष्ठ यथा—अरुण, उदुम्बर, श्रुध्यजिह्वा, कपाल, काकणिक, पुण्डरीक, दद्रु। लुद्र कुष्ठ यथा स्थूल-अरुह, महाकुष्ठ, एवं कुष्ठ, चर्मदल, विसर्प, परिसर्प, सिध्म, विचर्चिका, किटिभ, पामा और रकसा। सम्पूर्ण कुष्ठ (छोटे-बड़े सब) वायु-पित्त-कफ एवं क्रमि के कारण से उत्पन्न होते हैं। दोष की उत्कटता (प्रबलता) से यह कहा जाता है कि कुष्ठ वातजन्य है, यह पित्तजन्य है, इत्यादि। क्योंकि दूसरे दोषों की उसमें न्यूनता रहती है।
वि० मन्तव्य—ये सब क्रमि—रक्तज क्रमि होते हैं, यथा—केशरोमनखादाश्च दन्तादाः किष्किशस्तथा। कुष्ठजाः सपीसर्पा श्रेयाः शोणितसम्भवाः ॥ सु० उ० अ० ३४ तथा— शोणितजानां (कृमीणां) तु खलु कुष्ठैः समानं समुत्थानम्। निदानम्....अतिद्वद्वानां च त्वक सिरा स्नायुमांसतरुणास्थिभक्ष- णमिति। च० वि० अ० ७। तथा कुष्ठैककर्मणः। मा० नि० १५, ६॥
तत्र वातेनारुणं, पित्तैनोदुम्बरध्वं (क्षं) जिह्वाकपाल- काकणकानि, श्लेष्मणा पुण्डरीकं दद्रुकुष्ठं चेति। तेषां महत्त्वं क्रियागुरुत्वमुत्तरात्तरं धात्वनुपवेशादसाध्यत्वं चेति ॥७॥
इन महाकुष्ठों में—वायु की प्रधानता से अरुण, पित्त की प्रधानता से श्रुध्यजिह्वा, उदुम्बर, कपाल और काकणक, कफ की प्रधानता से पुण्डरीक और दद्रु, इन कुष्ठों की महानता— तीन कारणों से है। यथा—चिकित्साकार्य के महान होने से, उत्तरोत्तर रक्तादि धातुओं में प्रविष्ट होने से, एवं असाध्य होने से ये सातों कुष्ठ महान हैं ॥७॥
तत्र वातेनारुणभानि तन्नूनि विसर्पीणि तोदुर्भेद- स्वापयुक्तान्यरुणानि। पित्तैन पक्वोदुम्बरफलाकृतिवर्णा- न्योदुम्बराणि, श्रुध्य(क्षं) जिह्वाप्रकाशानि खराणि श्रुध्य(क्षं) जिह्वाणि, कृष्णकपालिकाप्रकाशानि कपाल- कुष्ठानि, काकणान्तिकाफलसहशान्यतोव रक्तकृष्णानि काकणकानि; तेषां चतुर्णां मध्योपचोषपरिदाहधूम्रायनानि