भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ५ ]

क्षिप्रोत्थानप्रपाकभेदित्वानि क्रमिजन्म च सामान्यानि लिङ्गानि । श्लेष्मणा पुण्डरीकपत्रप्रकाशानि पोण्डरीकाणि, अतसोपुष्पवर्णानि ताम्राणि वा विसर्पणि पिडकावन्ति च ददुकुष्ठानि तयोद्वेयोरप्युत्सन्नता परिमण्डलता कण्डुश्चिरोत्थानत्वं चेति सामान्यानि रूपाणि ॥१॥

इनमें अरुण कुष्ठ—वायु के कारण से लाल (काला मिश्रित) झाँईवाला, पतला, फैलेनेवाला, तोद (चुभने की दर्द), मेद, स्वाप (स्पर्श शून्यता) युक्त होता है। पित्त के कारण उदुम्बर कुष्ठ—पके हुए गूल्ह के फल की आकृति एवं वर्ण (रङ्ग) वाला होता है, ऋष्यजिह्वा कुष्ठ—ऋष्य (हरिण मेद) की जीभ के समान खर (ककश) होता है, कपाल कुष्ठ—कृष्णकपालिका (काली मिट्टी) के समान होता है, काकणककुष्ठ—काकणान्तिका (गुञ्जा-रत्ती) के फल के समानाकार एवं बहुत लाल एवं काला होता है। इन चारों में ओष (अग्नि के पास बैठने के समान दाह), चोष (चूसने के समान वेदना), परिदाह (जलन) और धूमयान (धूम के आकार का कृष्ण वमन), ये लक्षण होते हैं। ये कुष्ठ शीघ्र उत्पन्न होते हैं, शीघ्र पकते हैं, और शीघ्र ही फूट जाते हैं, इनमें क्रमि भी जल्दी उत्पन्न होते हैं। ये इन कुष्ठों के सामान्य लक्षण हैं।

पुण्डरीक कुष्ठ पुण्डरीक (गन्ध) के पत्र के समान होता है, ददुकुष्ठ—अतसी (अलसा) के फूल के समान अथवा ताम्रवर्ण, फैलेनेवाली, छोटी छोटी पिडकाओं से युक्त होता है। इन दोनों पुण्डरीक और ददुकुष्ठ में उत्सन्नता 'उभार' और परिमण्डलता (चक्कर-वत्सलाकार घेरा), कण्डु (खाज) एवं देर में उत्पन्न होना—ये सामान्य लक्षण हैं ॥१॥

चन्द्रकुष्ठान्यत ऊर्ध्व-बद्ध्यामः—

स्थूलानि सन्धिष्वतिदारुणानि

स्थूलाशेष स्युः काठनान्यरूपि ।

स्वकोचभेदस्वपनाङ्गसादाः

कुष्ठे महस्पृष्युते भवन्ति ॥१॥

इसके आगे क्षुद्र कुष्ठों को कहते हैं—

स्थूलाश्च कुष्ठ में—अरूपि (फुसियाँ) स्थूल मूलवाली सन्धियों में उत्पन्न अतिकष्ट साध्य स्थूल एवं कठिन (कठोर) होती है।

महाकुष्ठ में—त्वचा का संकोच, त्वचा का भेदन (स्फुटन),

१ पुण्डरीक का लक्षण—

“श्वेतं च रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम् ।

सोत्सेषं च सरागञ्च पुण्डरीकं तदुच्यते ॥” चरक ।

२ ददुकुष्ठ दो प्रकार का है—श्वेत (सित) और कृष्ण (असित)। इनमें असित कुष्ठ—महान कष्टसाध्य होने से महाकुष्ठों में पड़ा है। सितकुष्ठ-सुखसाध्य होने से, पीड़ा करने से चरक में क्षुद्रकुष्ठों में पड़ा है।

त्वचा का स्वाप (संज्ञा नाश) एवं अंगसाद (अंग ग्लानि) होता है ॥१॥

कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं

तदेककुष्ठं प्रवदन्ति कुष्ठम् ।

स्युयेन कण्डुव्यथनौषधोषा—

स्तलेषु तत्त्वमर्दलं वदन्ति ॥१०॥

एक कुष्ठ में—जिस कुष्ठ में शरीर काला लाल हो जाता है, उसको एक कुष्ठ कहते हैं।

चर्मदल कुष्ठ में—हाथ-पाँव के तलुओं में कण्डु (खाज), व्यथा (पीड़ा) ओष (दाह) और चोष (चूसने) की वेदना होती है ॥१०॥

विसर्पवत् सर्पति सर्वतो य-

स्वप्रक्तमांसान्यभिभूय शीघ्रम् ।

मूच्छूर्विदाहारतितोदपाकान्

क्तवा विसर्पः स भवेद्विकारः ॥११॥

विसर्प कुष्ठ—त्वचा, रक्त, मांस को दूषित करके शीघ्र ही (और कुष्ठ के समान देर में नहीं) विसर्प रोग की भाँति फैलने लगता है इसमें मूच्छूर्वा, विदाह (जलन) अरति (बेचैनी) तोद (शूल) पाक (पकाना) आदि विकार होते हैं ॥११॥

शनेः शरीरे पिडकाः स्ववन्द्यः

सर्पन्ति यास्तं परिसर्पमाहुः ।

कण्डुवन्वितं श्वेतमपाय सिध्मं

विद्यात्तन्तु प्रायश ऊर्ध्वकाये ॥१२॥

परिसर्प कुष्ठ में—शरीर के ऊपर धीरे-धीरे फैलेनेवाली, एवं सावयुक्त पिडकायें निकल आती हैं।

सिध्म कुष्ठ—खाजयुक्त, श्वेतवर्ण, अपाय (अकष्टकारि); तनु (सूक्ष्म आकार का) प्रायः शरीर के ऊर्ध्वभाग में (छाती एवं मुख पर) होता है ॥१२॥

राज्योऽतिकण्डुवतिरुजः सरुक्षा

भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम् ।

कण्डुमती दाहुरजोपपन्ना

विपादिका पादगतेयमेव ॥१३॥

विचर्चिका—रोग में हाथ पाँव पर राजि (बाह्य त्वचा के फटने से रेखायें) उत्पन्न हो जाती हैं, अति कण्डु (बहुत खाज की पीड़ा—खजूरों पीड़ा—कौंच के लगने पर जैसी पीड़ा होती है), रुज (पीड़ा), एवं सरुक्षा

१ विसर्प रोग इस कुष्ठ से भिन्न है—क्योंकि विसर्प रोग धीरे फैलता है। विसर्पकुष्ठ तीन ही दोषों तक सीमित रहता है।

२ सिध्मकुष्ठ दो प्रकार का है। यथा—पुष्पिका और सिध्म। पुष्पिकाकुष्ठ सुखसाध्य होने से सुश्रुत में क्षुद्र कुष्ठों में पड़ा है। सिध्मकुष्ठ साध्य न होने से चरक ने महाकुष्ठ में पड़ा है। सिध्म—“शीत से नष्ट हो जाता है।” (अपायि शीतर्त्ता विनाशि)।