भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ५।

निदानस्थानम्

२४९

आ जाती है। जिस समय यह विचर्चिका पांव में होती है, उस समय इसमें खाज, जलन और पीड़ा होती हो, तो इसको विपादिका कहते हैं।

किटिभ कुष्ठ—खावयुक्त वृत्त (गोल), घन (स्थिरकठिन) तीन कण्डुयुक्त, स्निग्धकृष्ण (उज्ज्वल कृष्ण) होता है ॥१३॥

यत् खावि वृत्तं घनमुग्रकण्डु तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं (मं) वदन्ति ।

साक्षावकण्डुपरिदाहकाभिः

पामाऽणुकाभिः पिडकाभिरूह्या ॥१४॥

स्फोटैः सदहैरति सैव कच्छूः

स्फिकृपाणिपादप्रभवेनिरूप्या ।

पामा—कुष्ठ में—छोटी छोटी बारीक पिडकायें उत्पन्न होती हैं। इन पिडकाओं से खाव बहता रहता है, इनमें खाज और जलन होती हैं। जिस समय यह पामा स्फिकू (नितम्ब), पाणि (हाथ) और पांव में उत्पन्न हो जाये और इनमें स्फोट (बड़े-बड़े छाले—पिडकायें नहीं) काले रङ्ग के उत्तरन् हो जायें इनमें जलन और खाज हो तो इसको “कच्छू” कहते हैं ॥१४॥

कण्डुवृन्विता या पिडका शरीरे

संखावहीना रकसोच्यते सा ॥१५॥

रकसा-सम्पूर्ण शरीर में—खाज युक्त एवं खाव रहित जो पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं, उनको रकसा कहते हैं ॥१५॥

अरुः ससिधमं रकसा महुरुच

यच्चैकवृष्टं कफजन्यमूनित् ।

वायोः प्रकोपात् परिस्पर्मैकं

शेषाणि पित्राप्रभवणि विद्यात् ॥१६॥

इन ग्यारह लुट्ट कुष्ठों में—अरुक्, विधम, रकसा, महाकुष्ठ और एक कुष्ठ, ये कफजन्य हैं। परिस्पर्म कुष्ठ वायु से उत्पन्न होता है। शेष (विसर्प, किटिभ, विचर्चिका, पामा, चर्मदल) कुष्ठ पित्तजन्य हैं ॥१६॥

किलासमपि कुष्ठविकल्प एव, तत्त्रिविधं—वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा चेति । कुष्ठकिलासयोरन्तरं—त्वग्गत-मेव किलासमपरिस्त्रावि च । तद्वातेन मण्डलमरुणं पुरुषं परिध्वंसि च, पित्तेन पद्मपत्रप्रतीकांशं सपरिदाहं च, श्लेष्मणा श्वेतं स्निग्धं वहलं कण्डुमरुच । तेषु संबद्धमण्डलमन्तेजातं रक्तरोम चासाध्यमस्निग्धदर्थं च ॥१७॥

किलास (Leucoderma) भी कुष्ठ का ही भेद है। यह रोग तीन प्रकार का है, यथा—वायुजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य । कुष्ठ और किलास में अन्तर—त्वचा में ही स्थित (लसीका रक्त—मांस में नहीं) और खाव रहित को किलास कहते हैं।

१ कहा भी है—“सैव स्फोटैस्तीव्रदाहैस्तेताः, जेयाः पाण्योः कच्छूस्माः स्फिकोश्च ।”

वायुजन्य किलास मण्डलाकार, अरुण (लाल), पुरुष (कठिन) और परिध्वंसि (रोमनाशक) पित्त के कारण उत्पन्न किलास—कमल पत्र के समान आकार का और दाहयुक्त होता है। कफजन्य-श्वेत, स्निग्ध, वहल (स्थूल-कठिन) और कण्डु युक्त होता है। इनमें जिस किलास में मण्डल परस्पर मिले (सम्बद्ध) हो, जो अन्त स्थानों में (ओठ, पाणि, पांव या गुह्य प्रदेश में) उत्पन्न हो, जिसमें बाल लाल हो जायें, तथा अग्नि से जलने से जो उत्पन्न हुआ है, वह किलास असाध्य सेमझना चाहिये ॥

कुष्ठेषु तु स्वकसंकोचस्वापस्वेदशोफभेदकौण्यस्वरोपघाता वातेन, पाकावद्रणाङ्गुलिपतनकर्णनासाभङ्गाक्षिरागसन्तोत्पत्तायः पित्तेन, कण्डुवर्णभेदशोफास्वावगौरवाणि श्लेष्मणा ॥१८॥

कुष्ठ में त्वचा का संकोच, त्वचा में स्पृश नाश, पसीना न आना, सूजन, त्वचा का फटना, कौण्य (हाथों की विकलता) और स्वरभंग, ये वायु के कारण उत्पन्न होते हैं। पकना, फटना, अंगुलियों का गिरना, कान, नाक का नाश, आंखों में लालिमा सन्तोत्पत्ति (कमियों का उत्पन्न होना), ये पित्त के कारण से होता है। खाज, वर्ण का नाश, सूजन, खाव और भारीपन कफ के कारण से होता है ॥१८॥

तत्रादिवलप्रवृत्तं पौण्डरीकं काकणं चासाध्यम् ॥१९॥

इनमें आदि बल (शुक्र शांति के दोषजन्य) से प्रवृत्त, पुण्डरीक और काकण्य के तीनों कुष्ठ असाध्य हैं ॥१९॥

भवन्ति चात्र—

यथा वनस्पतिर्जातैः प्राप्य कालप्रकर्षणम् ।

अन्तर्भूमिं विगाहेत मूलैर्वृष्टिविवर्धितैः ॥२०॥

एवं कुष्ठं समुत्पन्नं त्वचि कालप्रकर्षतः ।

क्रमेण धातून् व्याप्नोति नरस्याप्रतिकारिणः ॥२१॥

कहा भी है—२०, २१॥

जिस प्रकार से उत्पन्न वनस्पति समय की अधिकता से, मूल (जड़) पकड़कर-वृष्टि से बढ़कर भूमि के अन्दर स्थिर हो जाती है, उसी प्रकार से त्वचा में उत्पन्न हुआ कुष्ठ-चिकित्सा न करनेवाले पुरुष में समय की अधिकता से रक्त आदि धातुओं में फैल जाता है ॥

१ कहा भी है—

“गुह्य पाणितलीष्टेषु जातमप्यचिरस्तनम् ।

वर्जनीयं विशेषण किलासम् ॥”

(२) किलास जिस समय त्वचा से आगे रक्तादि धातुओं में आ जाता है, तो इसका नाम स्वित्र हो जाता है। स्वित्र किलास का ही भेद है। यथा—

“त्वग्गतं तु यदाऽस्त्रावि किलासं तत् प्रकीर्चितम् ।

यदा त्वचमतिक्राम्य तद् धातुमवगाहते ।

हित्वा किलाससंज्ञं तत् स्वित्रसंज्ञा लभेत च ॥”