सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ५ ]
क्षिप्रोत्थानप्रपाकभेदित्वानि क्रमिजन्म च सामान्यानि लिङ्गानि । श्लेष्मणा पुण्डरीकपत्रप्रकाशानि पोण्डरीकाणि, अतसोपुष्पवर्णानि ताम्राणि वा विसर्पणि पिडकावन्ति च ददुकुष्ठानि तयोद्वेयोरप्युत्सन्नता परिमण्डलता कण्डुश्चिरोत्थानत्वं चेति सामान्यानि रूपाणि ॥१॥
इनमें अरुण कुष्ठ—वायु के कारण से लाल (काला मिश्रित) झाँईवाला, पतला, फैलेनेवाला, तोद (चुभने की दर्द), मेद, स्वाप (स्पर्श शून्यता) युक्त होता है। पित्त के कारण उदुम्बर कुष्ठ—पके हुए गूल्ह के फल की आकृति एवं वर्ण (रङ्ग) वाला होता है, ऋष्यजिह्वा कुष्ठ—ऋष्य (हरिण मेद) की जीभ के समान खर (ककश) होता है, कपाल कुष्ठ—कृष्णकपालिका (काली मिट्टी) के समान होता है, काकणककुष्ठ—काकणान्तिका (गुञ्जा-रत्ती) के फल के समानाकार एवं बहुत लाल एवं काला होता है। इन चारों में ओष (अग्नि के पास बैठने के समान दाह), चोष (चूसने के समान वेदना), परिदाह (जलन) और धूमयान (धूम के आकार का कृष्ण वमन), ये लक्षण होते हैं। ये कुष्ठ शीघ्र उत्पन्न होते हैं, शीघ्र पकते हैं, और शीघ्र ही फूट जाते हैं, इनमें क्रमि भी जल्दी उत्पन्न होते हैं। ये इन कुष्ठों के सामान्य लक्षण हैं।
पुण्डरीक कुष्ठ पुण्डरीक (गन्ध) के पत्र के समान होता है, ददुकुष्ठ—अतसी (अलसा) के फूल के समान अथवा ताम्रवर्ण, फैलेनेवाली, छोटी छोटी पिडकाओं से युक्त होता है। इन दोनों पुण्डरीक और ददुकुष्ठ में उत्सन्नता 'उभार' और परिमण्डलता (चक्कर-वत्सलाकार घेरा), कण्डु (खाज) एवं देर में उत्पन्न होना—ये सामान्य लक्षण हैं ॥१॥
चन्द्रकुष्ठान्यत ऊर्ध्व-बद्ध्यामः—
स्थूलानि सन्धिष्वतिदारुणानि
स्थूलाशेष स्युः काठनान्यरूपि ।
स्वकोचभेदस्वपनाङ्गसादाः
कुष्ठे महस्पृष्युते भवन्ति ॥१॥
इसके आगे क्षुद्र कुष्ठों को कहते हैं—
स्थूलाश्च कुष्ठ में—अरूपि (फुसियाँ) स्थूल मूलवाली सन्धियों में उत्पन्न अतिकष्ट साध्य स्थूल एवं कठिन (कठोर) होती है।
महाकुष्ठ में—त्वचा का संकोच, त्वचा का भेदन (स्फुटन),
१ पुण्डरीक का लक्षण—
“श्वेतं च रक्तपर्यन्तं पुण्डरीकदलोपमम् ।
सोत्सेषं च सरागञ्च पुण्डरीकं तदुच्यते ॥” चरक ।
२ ददुकुष्ठ दो प्रकार का है—श्वेत (सित) और कृष्ण (असित)। इनमें असित कुष्ठ—महान कष्टसाध्य होने से महाकुष्ठों में पड़ा है। सितकुष्ठ-सुखसाध्य होने से, पीड़ा करने से चरक में क्षुद्रकुष्ठों में पड़ा है।
त्वचा का स्वाप (संज्ञा नाश) एवं अंगसाद (अंग ग्लानि) होता है ॥१॥
कृष्णारुणं येन भवेच्छरीरं
तदेककुष्ठं प्रवदन्ति कुष्ठम् ।
स्युयेन कण्डुव्यथनौषधोषा—
स्तलेषु तत्त्वमर्दलं वदन्ति ॥१०॥
एक कुष्ठ में—जिस कुष्ठ में शरीर काला लाल हो जाता है, उसको एक कुष्ठ कहते हैं।
चर्मदल कुष्ठ में—हाथ-पाँव के तलुओं में कण्डु (खाज), व्यथा (पीड़ा) ओष (दाह) और चोष (चूसने) की वेदना होती है ॥१०॥
विसर्पवत् सर्पति सर्वतो य-
स्वप्रक्तमांसान्यभिभूय शीघ्रम् ।
मूच्छूर्विदाहारतितोदपाकान्
क्तवा विसर्पः स भवेद्विकारः ॥११॥
विसर्प कुष्ठ—त्वचा, रक्त, मांस को दूषित करके शीघ्र ही (और कुष्ठ के समान देर में नहीं) विसर्प रोग की भाँति फैलने लगता है इसमें मूच्छूर्वा, विदाह (जलन) अरति (बेचैनी) तोद (शूल) पाक (पकाना) आदि विकार होते हैं ॥११॥
शनेः शरीरे पिडकाः स्ववन्द्यः
सर्पन्ति यास्तं परिसर्पमाहुः ।
कण्डुवन्वितं श्वेतमपाय सिध्मं
विद्यात्तन्तु प्रायश ऊर्ध्वकाये ॥१२॥
परिसर्प कुष्ठ में—शरीर के ऊपर धीरे-धीरे फैलेनेवाली, एवं सावयुक्त पिडकायें निकल आती हैं।
सिध्म कुष्ठ—खाजयुक्त, श्वेतवर्ण, अपाय (अकष्टकारि); तनु (सूक्ष्म आकार का) प्रायः शरीर के ऊर्ध्वभाग में (छाती एवं मुख पर) होता है ॥१२॥
राज्योऽतिकण्डुवतिरुजः सरुक्षा
भवन्ति गात्रेषु विचर्चिकायाम् ।
कण्डुमती दाहुरजोपपन्ना
विपादिका पादगतेयमेव ॥१३॥
विचर्चिका—रोग में हाथ पाँव पर राजि (बाह्य त्वचा के फटने से रेखायें) उत्पन्न हो जाती हैं, अति कण्डु (बहुत खाज की पीड़ा—खजूरों पीड़ा—कौंच के लगने पर जैसी पीड़ा होती है), रुज (पीड़ा), एवं सरुक्षा
१ विसर्प रोग इस कुष्ठ से भिन्न है—क्योंकि विसर्प रोग धीरे फैलता है। विसर्पकुष्ठ तीन ही दोषों तक सीमित रहता है।
२ सिध्मकुष्ठ दो प्रकार का है। यथा—पुष्पिका और सिध्म। पुष्पिकाकुष्ठ सुखसाध्य होने से सुश्रुत में क्षुद्र कुष्ठों में पड़ा है। सिध्मकुष्ठ साध्य न होने से चरक ने महाकुष्ठ में पड़ा है। सिध्म—“शीत से नष्ट हो जाता है।” (अपायि शीतर्त्ता विनाशि)।
अ० ५।
निदानस्थानम्
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आ जाती है। जिस समय यह विचर्चिका पांव में होती है, उस समय इसमें खाज, जलन और पीड़ा होती हो, तो इसको विपादिका कहते हैं।
किटिभ कुष्ठ—खावयुक्त वृत्त (गोल), घन (स्थिरकठिन) तीन कण्डुयुक्त, स्निग्धकृष्ण (उज्ज्वल कृष्ण) होता है ॥१३॥
यत् खावि वृत्तं घनमुग्रकण्डु तत् स्निग्धकृष्णं किटिभं (मं) वदन्ति ।
साक्षावकण्डुपरिदाहकाभिः
पामाऽणुकाभिः पिडकाभिरूह्या ॥१४॥
स्फोटैः सदहैरति सैव कच्छूः
स्फिकृपाणिपादप्रभवेनिरूप्या ।
पामा—कुष्ठ में—छोटी छोटी बारीक पिडकायें उत्पन्न होती हैं। इन पिडकाओं से खाव बहता रहता है, इनमें खाज और जलन होती हैं। जिस समय यह पामा स्फिकू (नितम्ब), पाणि (हाथ) और पांव में उत्पन्न हो जाये और इनमें स्फोट (बड़े-बड़े छाले—पिडकायें नहीं) काले रङ्ग के उत्तरन् हो जायें इनमें जलन और खाज हो तो इसको “कच्छू” कहते हैं ॥१४॥
कण्डुवृन्विता या पिडका शरीरे
संखावहीना रकसोच्यते सा ॥१५॥
रकसा-सम्पूर्ण शरीर में—खाज युक्त एवं खाव रहित जो पिडकायें उत्पन्न हो जाती हैं, उनको रकसा कहते हैं ॥१५॥
अरुः ससिधमं रकसा महुरुच
यच्चैकवृष्टं कफजन्यमूनित् ।
वायोः प्रकोपात् परिस्पर्मैकं
शेषाणि पित्राप्रभवणि विद्यात् ॥१६॥
इन ग्यारह लुट्ट कुष्ठों में—अरुक्, विधम, रकसा, महाकुष्ठ और एक कुष्ठ, ये कफजन्य हैं। परिस्पर्म कुष्ठ वायु से उत्पन्न होता है। शेष (विसर्प, किटिभ, विचर्चिका, पामा, चर्मदल) कुष्ठ पित्तजन्य हैं ॥१६॥
किलासमपि कुष्ठविकल्प एव, तत्त्रिविधं—वातेन, पित्तेन, श्लेष्मणा चेति । कुष्ठकिलासयोरन्तरं—त्वग्गत-मेव किलासमपरिस्त्रावि च । तद्वातेन मण्डलमरुणं पुरुषं परिध्वंसि च, पित्तेन पद्मपत्रप्रतीकांशं सपरिदाहं च, श्लेष्मणा श्वेतं स्निग्धं वहलं कण्डुमरुच । तेषु संबद्धमण्डलमन्तेजातं रक्तरोम चासाध्यमस्निग्धदर्थं च ॥१७॥
किलास (Leucoderma) भी कुष्ठ का ही भेद है। यह रोग तीन प्रकार का है, यथा—वायुजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य । कुष्ठ और किलास में अन्तर—त्वचा में ही स्थित (लसीका रक्त—मांस में नहीं) और खाव रहित को किलास कहते हैं।
१ कहा भी है—“सैव स्फोटैस्तीव्रदाहैस्तेताः, जेयाः पाण्योः कच्छूस्माः स्फिकोश्च ।”
वायुजन्य किलास मण्डलाकार, अरुण (लाल), पुरुष (कठिन) और परिध्वंसि (रोमनाशक) पित्त के कारण उत्पन्न किलास—कमल पत्र के समान आकार का और दाहयुक्त होता है। कफजन्य-श्वेत, स्निग्ध, वहल (स्थूल-कठिन) और कण्डु युक्त होता है। इनमें जिस किलास में मण्डल परस्पर मिले (सम्बद्ध) हो, जो अन्त स्थानों में (ओठ, पाणि, पांव या गुह्य प्रदेश में) उत्पन्न हो, जिसमें बाल लाल हो जायें, तथा अग्नि से जलने से जो उत्पन्न हुआ है, वह किलास असाध्य सेमझना चाहिये ॥
कुष्ठेषु तु स्वकसंकोचस्वापस्वेदशोफभेदकौण्यस्वरोपघाता वातेन, पाकावद्रणाङ्गुलिपतनकर्णनासाभङ्गाक्षिरागसन्तोत्पत्तायः पित्तेन, कण्डुवर्णभेदशोफास्वावगौरवाणि श्लेष्मणा ॥१८॥
कुष्ठ में त्वचा का संकोच, त्वचा में स्पृश नाश, पसीना न आना, सूजन, त्वचा का फटना, कौण्य (हाथों की विकलता) और स्वरभंग, ये वायु के कारण उत्पन्न होते हैं। पकना, फटना, अंगुलियों का गिरना, कान, नाक का नाश, आंखों में लालिमा सन्तोत्पत्ति (कमियों का उत्पन्न होना), ये पित्त के कारण से होता है। खाज, वर्ण का नाश, सूजन, खाव और भारीपन कफ के कारण से होता है ॥१८॥
तत्रादिवलप्रवृत्तं पौण्डरीकं काकणं चासाध्यम् ॥१९॥
इनमें आदि बल (शुक्र शांति के दोषजन्य) से प्रवृत्त, पुण्डरीक और काकण्य के तीनों कुष्ठ असाध्य हैं ॥१९॥
भवन्ति चात्र—
यथा वनस्पतिर्जातैः प्राप्य कालप्रकर्षणम् ।
अन्तर्भूमिं विगाहेत मूलैर्वृष्टिविवर्धितैः ॥२०॥
एवं कुष्ठं समुत्पन्नं त्वचि कालप्रकर्षतः ।
क्रमेण धातून् व्याप्नोति नरस्याप्रतिकारिणः ॥२१॥
कहा भी है—२०, २१॥
जिस प्रकार से उत्पन्न वनस्पति समय की अधिकता से, मूल (जड़) पकड़कर-वृष्टि से बढ़कर भूमि के अन्दर स्थिर हो जाती है, उसी प्रकार से त्वचा में उत्पन्न हुआ कुष्ठ-चिकित्सा न करनेवाले पुरुष में समय की अधिकता से रक्त आदि धातुओं में फैल जाता है ॥
१ कहा भी है—
“गुह्य पाणितलीष्टेषु जातमप्यचिरस्तनम् ।
वर्जनीयं विशेषण किलासम् ॥”
(२) किलास जिस समय त्वचा से आगे रक्तादि धातुओं में आ जाता है, तो इसका नाम स्वित्र हो जाता है। स्वित्र किलास का ही भेद है। यथा—
“त्वग्गतं तु यदाऽस्त्रावि किलासं तत् प्रकीर्चितम् ।
यदा त्वचमतिक्राम्य तद् धातुमवगाहते ।
हित्वा किलाससंज्ञं तत् स्वित्रसंज्ञा लभेत च ॥”
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स्पशहानिः स्वेद नत्वमीषत्कण्ड्श्च जायते । बेवण्यं रूपभावश्च कुष्ठे त्वचि समाश्रिते ॥२२॥
त्वचागत कुठ के लक्षण-स्पशज्ञान की हानि, पसीने का योडा आना, कण्ड (८ खाज ), विषणंता ( रङ्ग परिवत्तन )
ओर रूक्षता होती है ॥ २२ ॥ ॥
त्वक्स्वापौ रोमहषंरच स्वेदस्याभिप्रवतनम् । कण्डरविपूयकञ्चेव कुष्ठे ओगितसंभ्रते ॥२३॥
बाहुल्यं वक्त्रशोषश्च काकश्यं पिडकोद्रमः।
तोदः स्फोटः स्थिरत्वं व कुष्ठे मांससमाभरिते ॥२४॥.
कुष्ठ के रक्त मे होने पर-स्वचा का सश नाश, रामाच,
स्वेद का बहत आना, कण्ड् ओर विपूयक ( पूथोखत्ति ) होती
है । मांख मे कुष्ठ होने पर- बाहुल्य ( स्थूल-कटोर मण्डल ),
मुख की श॒ष्कता, पिङकाओं का उ्नन होना, तोद ( पीड़ा ); स्फोट ८ छाठे ), रिथरत्व ( कठिनता ) होते है ॥ २२,२४॥
दो गेन्ध्यमुपदेहच पूयोऽथ छर मयस्तथा । गात्राणां मेदनं चापि ष्ठे मेदःसमाशिते ॥२५॥
नासाभङ्गोऽक्षिरागश्च क्षते च कृमिसंभवः।
भवेत् स्वरोपघातश्च ह्यस्थिमञ्जसमाश्चिते ॥२६॥ कौण्यं गतिक्चयोऽङ्गानां संभेदः क्षतसपेणम् ।
शुक्रस्थानगते लिङ्गं प्रागुक्तानि तथेव च ॥२७
सेद में दुष्ठ पर्हुचने पर-दुगन्धता, उपदेह ८ परिटिमप्तता)
पूय कृमिरथों कौ उद्पत्ति, शरीर का विदीणं दोना होता दै ।
अस्थि ओर सञ्जा मे कुष्ठ होने पर- नासिका नाच, आंखों
मे रक्तिमा, क्षत-ब्र्णो मे कृमि कौ उद्पत्ति तथा स्वर भङ्ग होता द। शुक्र स्थान मे कुष्ठ के पर्हुचने पर -कोण्य ( अङ्गो मे
विकर्ता ), गतिक्षय { चलना-फिरना नष्ट होना ), अङ्गां का पटना, रण का फेना तया उप्यक्त ( त्वचा से टेकर मञ्जा तक के ) लक्ष होते हं ॥ २५-२७ ॥ |
खीपुंखयोः इष्टदोषाद् दुष्टो णितुक्योः ।
यद्पत्यं तयोजीतं ज्ञयं तदपि कुष्ठितम् ॥२८॥ कुष्ठ दोष के कारण जिन पिता-माता का शुक्र ओर
शोणित दुप्रित होता है, उनकी यदि सतान उद्मनन होती हे, तो
बह भी कुष्ठ राग से पीड़ित होती हे ॥ २८॥ कुष्टमार्मवतः साध्यं त्वग्रक्तपिशिताशितम् ।
मेदोगतं भवेद्याप्यमसाध्यमत उत्तरम् ॥२<९॥
आत्मवान् ( जितेन्द्रिय ) पुरुष का त्वचा रक्त ओर मांस
मे आधित ऊुष्ठरोग खाध्य हे, मेद मे आश्रित याप्य है, शेष स्थानों मे पर्हूचा असाध्य है ॥ २६ ॥ `
रह्म सज्जनवधपरस्वहरणादिभिः । कमभिः पापरोगस्य प्राहुः कुष्ठस्य संभवम् ॥३०॥ ब्रह्महत्या, खीहत्या; सञ्जन वध, दुसरे के धन के हरने के
कारण-इस पापरोग-कुष्ठ कौ उद्यत्ति होती है ।इख प्रकार ते कमंजन्य ङुष्ठ को कहा है ॥ ३०॥
सश्रतसंहिता
प्रियते यदि कुष्ठन पुनजोतेऽपि गच्छति ध: 9 | ^|
नातः कष्टतरो रोगो यथा कुष्ठं प्रकीर्तितम् ॥३१॥ यदि कुष्ठरोग से मनुष्य मरता है, तो उखन्न होने | फिर इसको कुष्ठ रोग होता ई । इसखियि कुष्ठ से अधिक दुः दायी ओर दूसरा कोई रोग नदीं ३ । ३१॥ | आहाराचारयोः प्रोक्तामास्थाय महतीं क्रियाम् ओषधीनां विशिष्टानां तपसश्च निषेवणात् | यस्तेन मुच्यते जन्तुः स पुण्यां गतिमाप्तुयात्॥३२॥ वणित आहार एवं आचार के नियमों का पालन करते हए |
बड़ी भारी विचारणा को करने से, विशेष ओषधियों के तथा तप ( चन्द्रायण आदि त्रत) के सेवन सेजो पुरुष कुष्ठ रोग | | से सुक्त हो जाता है वह पुण्य गति को प्राप्त करता है? ॥३२॥ | प्रसङ्गाद् गात्रसंस्पञञौन्निः्ासात् सह मोजनात्। | सहशय्यासनाच्चापि बखमात्यानुल्ेपनात् ॥३३॥ | कुष्ठं वर्च शोषश्च नेत्राभिष्यन्द् एव च । | ओपसर्गिकरोगाश्च सक्रामन्ति नरान्नरम् ॥२४॥ प्रसंग ( संक्रान्त व्यक्तिसे मेथुन करने ) से, संक्रान्त व्यप
के शरीर-स्पशं से, संक्रान्त व्यक्ति के निःश्वास से, सक्र न्त्य । के साथ भोजन केसे, संक्रान्त व्यक्तं के साथ सोनेरे, |
| वैठने से, उसकी उपयुक्त वस्तु वख माटा या अनुप (अङ्गराग)
को कगाने से, कुष्ठ, उवर, शोथ (श्चय ), ने्रामिष्यन्द (नेत्र
रोग) ओर ओपसर्गिकर ( मसूरिका, रोमान्तिका, आदि ) रोग, । एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति मे आ जति हं ॥ ३३,३४॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने कुष्ठनि दानं
नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
षष्ठोऽध्यायः
अथातः प्रमेहनिदान व्याख्यास्यामः ॥ १॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २॥
कुष्ठ के त्रिदोषजन्य होने पर मी एक एक दोष ॥
त्ख जन्य प्रमेह । ्रतरख्ता से कुष्ठ को कहकर अव्र त्रिदोषजन्थ भ्र.
१ यह् रोग क्मजन्य है । जेसा # कहा है--
“यथाशास्त्रं विनिर्णीतो यथाविधि चिकित्सितः
न शमं याति यो व्याधिः स॒ जेयः कर्म्मजो बुधैः ॥*
इसल्यि कर्म्मो के क्षय होने से इसका क्षय हं । यतः--
““कम्मेक्षयात् कर्म्मता दोषजाः स्वरमेषजः । `
कम्म॑दोषोद्धवा यान्ति कर्म्मदोषक्षयात् चयम् ॥' _ +, |
इसलिये भ्रीषघ एवं तप आदि के -सेवन का विधान किया ° |
२ भ्रापसगिकरोग- ` अ.
मसुरिकार्च रोमान्त्यो. ग्रन्धि्वीसपं एव च । `
उपदंशर्न कण्डवाद्या भरोपसगिकयं्काः ॥
॥ बणादिभेदेन भेदो मेहेषु कल्पते ॥1*
न | |
| प्या वक 1
व
क र निदानस्थानम् (
ङो कहते है, जेखा किं भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के | का आपस मे उलश्चा रहना, ओर नखो का शीघ वदृना-ये कहा था ॥१,२॥ प्रमेह क पूवरूप ह ।॥५॥ दिबाल्वप्नाभ्यायामालस्यप्रसक्त जोतस्निरधमधुरदरवान्नपानसेविन पुरुष जानीयात् प्रमेदी भवि-
यतीति ॥३॥
प्रह के कर्ण
दिन मे खोने, व्यायाम (शारीरिक परिम) न करने.
वाहि, निरन्तर सदा आल्सी, सीत स्निग्ध (घृत बहुल), मधुर,
च (मेदवरधक) द्रव (तरल) खान-पान को सेवन करनेवाले
ष मे प्रमेह उद्यनन होता हे " ॥३॥
तस्य चैवंप्रवृत्तस्यापरिपक्रा एव वातपित्तश्छेषमाणो
यदा मेदसा सहैकत्वमुपेत्य मूत्रवाहिखार्तास्यनुमूस्याधो
गला वस्तेमंखमाश्रिव्य निर्भि्न्ते तद् प्रमेहाग्जनयन्ति |
हस प्रकार के आहार-विहार को सेवन करनेवाले पुखष के
अपयिक्व (आमावस्था के) अवस्थामें दी वात, पित्त ओर
कृफ मेद (एवं वखा) के साथ मिलकर मूत्रवाही खोतों के
आश्रय से नीचे की ओर आकर वस्ति मुख का आश्रय लेकर
जब बाहर निकलने लगते है, तव प्रमेहं की उत्ति होती दै ॥
तेषा तु पूंरूपाणि-हस्तपादतख्दाहः स्निग्धपिच्छि-
रगुरता गात्राणां मधघुरजक्छमूत्रता तन्द्रा सादः पिपासा दुगेन्धश्च शासस्ताटुगठजिह्वादन्तेषु मलोसपत्तिजेटिटीमावः
केशानां बृद्धि नखानाम् ।(५॥ |
प्रमेह के पूवरूप --
` हाथ ओर पांव के तल्ुओं मँ जलन, शरीर मँ रि्निग्धता
चेहरे पर बिना ते के “तेर की. क्षलक), चिकनापन ओर भारीपन होना, मूतर में मधुरता ओर सफेदपन, तन्द्रा (आरस्य),
णद (अज्ञ मे ग्लानि), प्यास, श्वास मे दुगंन्ध, श्वास-तालुः
ग
पके-जिहा ओर दांतों मे मल का बहुत उत्पन्न होना, बालो
र १ कई आचार्य्यो का कथन ह कि प्रमेहरोग स्वियों को नहीं हेता । इसके लिये वे कहते है कि--
रजः भ्रसेकान्नारीणां मासि मासि विशुध्यति
सवं शरीर दोषार्च न प्रमेहन्त्यतः स्तियः ॥ *
ट वचन ठीक नहीं है | वोंकि किसी तन्त्र ने इसको नहीं
त भरत्यक्ष के विरुद्ध ह । परन्तु यह भी सत्य है किं जिस
ऋतु धमं ठीक प्रकार से आता रहता है, इसको मूत्र दोष
पाकम होते है] शरोर जिस को प्रमेह होता है, उनको
रोष को शिकायत रहती है। विशेष चिक्तित्स्ास्थान मे देखे । ९्हा सी | |
रोषष्याविरोेऽपि तत्संयोगविशेषतः ॥
तत्राविटप्रभूतमूत्रलक्षणाः समे एव्र प्रमेहा भवन्ति ॥६॥ सव प्रमेहो मे मूत्र का गदलापन ओर मात्रा मूत्रका बहुत आना सामान्य लक्षण दै ।
वि० मन्तव्य--आहार का परिपाक हो जाने के पश्चात्- मछ द्रव का जलीयांश आचूषित होकर रख के समान दी रक्त म॑ मिल्ता दै ओर रतम आहार रस मय सव धातुओं क उपादान विद्यमान रहते हँ । रतम से इच्छं द्वारा मूत्रं
छनता दै, तव यदि धातुओं के उपादान भी मूत्रे छनने कगते ह ओर अप--धातु (जितने जर की शरीर को सव॑दा आवश्यकता होती है--रदती है उतना जल) मी अधिक छनने गता हे तो मूत्र-आविल (अखच्छ) तथा अपेक्षाकृत अधिक
आने छगता हं | फलतः धातुओं का उचित पोषण नदीं होता।
इसी रोग का नाम प्रमेह” या मेह है। शेष सव्र लक्षणों पर ध्यान दं । ओर-स्थूढः प्रमेदी वलवान् इह एकः कृशः
तथेकः परिदुवंक्श्च | (च० चि० अ० १) जिख रोगी के मेदस्
तथा ओजस् सुरश्चित रहते हँ बह स्थूरं ओर बलवान् बना रहता
है | जिखके नहीं वहं कुश एवं दुब हो जाता हे ॥६॥
सवे एव सवेदोषसमुर्थाः सह पिडकाभिः॥७॥ सब् प्रमेह एवं प्रमेह जन्य सव पिडकायेँ (कुष्ठ की भाति ) सवर दोषों से उत्पन्न होती है ॥७॥
तत्र, कफादुदकेश्चबालिकाघुरासिकताशनैखेवणपिष्टसान्द्रशुक्फेनमेहा द साध्याः, रकषदूष्याणां समक्रियप त्वात् , पित्तान्नीखह रिपद्राम्डक्षारमक्जिष्ठाशोणितसदहाः षड याप्याः, दोषदूष्याणां विषमक्रियस्वात्, वातात् सपिवसा- ‡
्षौद्रहस्तिमेहदाश्चस्ारोऽसाध्यतमाः, महाययिकस्वात्॥८॥
इनमें कफ के कारण से दस प्रकार के प्रमेह उन्न होते
है । यथा-उदकमेह, इक्तवालिकामेह, सुरामेह, सिकतामेह,
शनेमेह, ल्वणएमेह, सानदरमेह, पि्टमेह, शुक्रमेह ओर फेनमेह ।
ये दसो प्रमेह साध्य हैँ । क्कि इनम दोष (कफ) ओर दूष्य
(मेद-मञ्जा आदि) को चिकित्सा कायं एक समान हे । अथात्
कफ ओर मेद दोनों दी रक्ष एवं उष्ण तथा कटु तिक्त कषाय
से शान्त होते है, इसल्यि साध्य हे । पित्त के कारण से--नीलमेह, ह रद्रामेह, अम्बमेह, मड््ठामेह ओर शोणितमेह-ये छ
प्रमेह उत्पचच हेते ई । छे प्रमेह याप्य हँ । क्योकि इनमे दोष
(पित्त) ओर दूष्य (मेद-लघीका आदि) का चिकित्सां
विषम रूप है । अर्थात् पित्त मधुर एवं शीत, सिनिग्ध क्रिया से
शान्त होता है, जोर मेद लीका--उष्ण एवे कटु सुश्च क्रिया
से शान्त होती है, श्सव्यि याप्य हे । वायु के काणसे- 1
सपद, वसामेद, शोदरमह, ओर हस्तमिह चार ब ९०
~ ४ "~+ =
म - रर च,
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नि कक ~ र -- त्य ॐ "न
२४८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
है। ये अतिशय असाध्य है। क्योंकि—महात्म्यिक होने से—अर्थात् अतिशय धातु क्षय करने के कारण शीघ्र विनाशकारी है एवं इनमें भी विषम क्रिया है। (मधुर रस वायु को शमन करता है, स्निग्ध गुण वायु का शामक है, परन्तु ये दोनों दूष्य-मेद को बढ़ाते हैं) ॥१॥
तत्र वातपित्तमेदोभिरन्वितः श्लेष्मा श्लेष्मप्रमेहाञ्च नयति, वातकफशोणितमेदोभिरन्वितं पित्तं पित्तप्रमेहान्, कफपित्तवसा मज्जमेदोभिरन्वितो वायुवातप्रमेहान् ॥१॥
इनमें वायु-पित्त और मेद (मांस आदि भी१) से युक्त कफ-कफजन्य प्रमेहों को उत्पन्न करता है। वायु-कफ और रक्त एवं नेद से मिश्रित पित्त-पित्तजन्य प्रमेहों को, कफ-पित्त वसा मज्जा और मेद से मिश्रित वायु-वातजन्य प्रमेहों को उत्पन्न करती है ॥१॥
तत्र, श्वेतमवेदनमुदकसहसा मुदकमेही मेहति, इलुरसतुल्यमिलुवालिकामेही, सुरातुल्यं सुरामेही; सरुजं सिकतानुविद्धं सिकतामेही; जनैः सकफं मृत्स्नं शनैर्मही; विगदं लवणतुल्यं लवणमेही; हृष्टरोमः पिष्टरसतुल्यं पिष्टमेही; आविलं सान्द्रं सान्द्रमेही; शुक्रतुल्यं शुक्रमेही; स्तोकं स्तोकं सफेनमच्छं फेनमेही मेहति ॥१०॥
इनमें उदकमेही रोगी—श्वेतवर्ण मूत्र-विना किसी पीड़ा के—पानी के समान स्वच्छ प्रवाहण करता है। इलुमेही रोगी—गन्ने के समान, सुरामेही—सुरा के समान, सिकतामेही—पीड़ा के साथ सिकता (द्रूषित कफ वालुका में परिवर्तित होता है—इसलिये वालुका) मिश्रित, शनैर्मही—धीरे धीरे—कफ मिश्रित मृत्स्न (पिच्छल-चिकासयुक्त), लवणमेही विशद (निमल), लवणरस युक्त, एवं लवणोदक के समान, पिष्टमेही—हृष्टरोमा (शरीर में रोमांच उत्पन्न होकर), पिष्टरस (पिड़ीमिले पानी) के समान, सान्द्रमेही—आविल (कलुषित), सान्द्र२ (घन), शुक्र-मेही—शुक्र के समान चिकना, फेनमेही—धीरे-धीरे फेन मिश्रित मूत्र प्रवाहित करता है ॥१०॥
अत ऊर्ध्वं पित्तनिमित्तान् वक्ष्यामः—सफेनमच्छं नीलं नीलमेही मेहति; सदाहं हरिद्राभं हरिद्रामेही; अम्ल-रसगन्धमम्लमेही; स्तुतक्षारप्रतिमं क्षारमेही; मज्जिष्ठोदकप्रकाशं मज्जिष्ठामेही; शोणितप्रकाशं शोणितमेही मेहति ॥११॥
इसके आगे पित्तजन्य प्रमेहों की व्याख्या करते हैं—नील-
१ चरक में कहा है कि—
“स विसपन् संधारीरे मेदसेवाहितः मिश्रीभावं गच्छति। मेदसो बहुवदधत्वात्”।
२ यदा पश्युपित्तं मूत्रं सान्दीभवंति भाजने ।
पुरुषं कफकोपेन तमाहूः सान्द्रमेहिनम् ॥
मेही रोगी—फेनयुक्त अच्छे (निर्मल), नीलवर्ण (द्रूषित पित्त के कारण से) मेहन करता है। हरिद्रामेही—दाह से युक्त एवं हरिद्रा मिश्रित जल के समान, अम्लमेही—अम्लरस एवं अम्ल-गन्ध युक्त, क्षारमेही—स्तुतक्षार (गलित क्षार द्रव) के तुल्य, मज्जिष्ठामेही—मज्जिष्ठामिश्रित पानी के समान लाल, शोणित-मेही—रक्त के समान मूत्र प्रवाहण करता है ॥११॥
अत ऊर्ध्वं वातनिमित्तान् वक्ष्यामः—सर्पिःप्रकाशं सर्पिर्मही मेहति; वसाप्रकाशं वसामेही; क्षौद्ररसवर्णं क्षौद्रमेही; सत्मातक्कवदनुप्रबन्धं हस्तिमेही मेहति ॥१२॥
इसके आगे वातजन्य प्रमेहों की व्याख्या करते हैं—सर्पिर्मही—सर्पि (घी) के समान, वातमेही वसा के समान, क्षौद्र-मेही—मधु के समान रस एवं वर्णयुक्त, हस्तिमेही—सत् हाथी के समान निरन्तर वेग पूर्वक और पीछे से बिना वेग के धीरे धीरे प्रवाहण करता है।
वि० मन्तव्य—हस्तिमेह में वस्ति का मुख खुल जाता है, फलतः सर्वदा मूत्र बहता रहता है, रोगी को उसके लिये—रक्ख की थैली मेहन के मुख पर लगानी पड़ती है। कफज मेह में—आहार रस में अधिक मधुरता उत्पन्न होने लगती है। यहाँ तक कि स्वेद और मूत्र भी मधुर होने लगते हैं। (स्वस्थ के स्वेद एवं मूत्र लावणिक होते हैं)। फलतः—शरीर एवं मूत्र पर मझिका बैठने लगती है। यह कफज मेह का उपद्रव है, मेद बढ़ने पर होता है। वातज मेह का उपद्रव—हृदय इससे हृदय की स्वाभाविक गति में रुकावट होने लगती है। फलतः वातप्रमेही को नाड़ी भी रुक-रुक कर चलती है। पाठक नाड़ी देखते समय ध्यान दें। स्तम्भ—गतिशील अवयवों का स्तम्भ हो जाना—देखा सुना जाता है। वात प्रमेह के रोगियों की मृत्यु हस्ततम्भ से (हार्ट फेल होने से) होती है। और उक्त वातज चारों मेह प्रायः सुखी सुकुमार एवं मस्तिष्क से काम लेनेवालों (वकील, जज, विद्वान् तथा धनिकों) को अधिक होते हैं ॥१२॥
मक्षिकोपसर्पणमालस्यं मांसोपचयः प्रतिश्यायः शैथिल्यारोचकाविपाकाः कफप्रसेकच्छर्दिनिद्राकासश्चासाश्चरि श्लेष्मजानासुपद्रवाः; वृषण्योरवदरणं वस्तिमेदो मेदुतोदो हृदि शूलमम्लीकाज्वरातीसारारोचका वमशुः परिघृषणं वाहो मूच्छी पिपासा निद्रानाजः पाण्डुरोगः पीतविष्णून्नेत्रत्वं चेति पैत्तिकानां, हृदप्रहो लोलयमनिद्रा स्तम्भः कम्पः शूलं बद्धपुरीषत्वं चेति वातजानाम्। एवमेते विशतिः प्रमेहाः सोपद्रवा व्याख्याताः ॥१३॥
मक्षिकोपसर्पण (शरीर की मधुरता में स्नान एवं अनुलेपन करने पर भी मक्खियों का आना), आलस्य, मांसोपचय (मांसबृद्धि), प्रतिश्याय, शैथिल्य, (अङ्गों में शिथिलता), अश्चरि, अविपाक, कफप्रसेक (मुख से छालाखाव), छर्दि, निद्रा-कास,
अ० ६ ] ३२
निदानस्थानम्
२४६
श्वेत-ये कफजन्म प्रमेहों के उपद्रव हैं। पित्तजन्म प्रमेहों के उपद्रव-अण्डकोषों का फटना (पकना), मूत्राशय में पोछा, शिरन में वेदना, हृदय शूल, खड़े डकार ज्वर, अतिसार, अर्बुद, वमन, परिधुमायन (उणिमा के कारण-धूमोद्गार या चारों ओर से ताप प्रतीति), दाह, मूर्च्छा, प्यास, निद्रा का नाश, पाण्डुरोग, मल-मूत्र-और नेत्र का पीला होना, पित्तजन्म प्रमेहों के उपद्रव हैं। वायु जन्म प्रमेहों के उपद्रव—हृदय में पीड़ा (बैचैती), लैह्य (सब रसों के खाने की इच्छा), अनिद्रा, तमम (जड़ता), कम्पन, मल का अवरोध (काठिन्य)—ये वात-जन्म प्रमेहों के उपद्रव हैं। इस प्रकार से ये बीस प्रमेह उपद्रवों के साथ कह दिये ॥१३॥
तत्र वसामेदोध्यामभिपन्नशरीरस्य त्रिभिर्दोषैश्चातुगतथातोः प्रमेहिणो दश पिडका जायन्ते। तद्यथा—शराविका, सर्पपिका, कच्छपिका, जालिनी, विनता, पुत्रिणी, मसूरिका, अलजी, विदारिका, विद्रधिका चेति ॥१४॥
वसा (मांस स्नेह) एवं मेद के कारण अभिपन्न (दूषित) शरीरवाले प्रमेही के धातुओं में तीन दोष व्याप्त होकर दस पिडकायें उत्पन्न करते हैं। यथा—शराविका, सर्पपिका, कच्छपिका, जालिनी, विनता, पुत्रिणी, मसूरिका, अलजी, विदारिका और विद्रधि। ये पिडकायें प्रायः शरीर के निचले भाग में (म्रीवा के नीचे) होती हैं ॥१४॥
शरावमात्रा तद्रूपा निम्नमध्या शराविका। गौरसर्पपसंस्थाना तत्प्रमाणं च सार्षपी ॥१५॥
सदाहा कूमसंस्थाना ज्ञेया कच्छपिका बुधैः। जालिनी तीव्रदाहा तु मांसजालसमावृता ॥१६॥
महती पिडका नीला पिडका विनता स्मृता। महत्यल्पचित्ता ज्ञेया पिडका सा तु पुत्रिणी ॥१७॥
मसूरसमसंस्थाना ज्ञेया सा तु मसूरिका। रक्ताऽसिता स्फोटवती दारुणा त्वलजी भवेत् ॥१८॥
शराविका पिडका—शराव (चम्पन) के समान, इसी के आकार की, बीच से दबी होती है। सर्पपिका—श्वेत सरसों के आकार की, सरसों के बराबर बड़ी होती है। कच्छपिका—जलनयुक्त—कल्लुवे के समान बीच में से ऊपर को उठी होती है। जालिनी पिडका—तीव्र दाहयुक्त—एवं मांस एवं शिराजाल से घिरी रहती है। विनता—महान् एवं नीले रङ्ग की होती है। पुत्रिणी—महती (स्थूल) एवं छोटी-छोटी पिडकाओं से व्याप्त (चारों ओर से घिरी) होती है। मसूरिका—मसूर के समान
१ यद्यपि सब प्रमेहियों के लिये पिडकायें कही हैं, तथापि मधुमेही रोगी में विशेष करके पिडकायें उत्पन्न होती हैं, जैसा कि परक के 'कियन्तःशिरसीय' अध्याय में कहा है।
आकार की होती है। अलजी—लाल-काली स्फोटवती (त्वचा के फटने से छाले के रूपवाली), अति कठिन (कष्टदायक) होती है ॥१५-१८॥
विदारीकन्दवदुग्धृत्वा कठिना च विदारिका। विद्रधैलक्ष्यणैर्गुत्का ज्ञेया विद्रधिका बुधैः ॥१९॥ विदारिका—विदारीकन्द के समान गोल एवं कठिन होती है। विद्रधि पिडका—विद्रधि के लक्षणों से युक्त होती है ॥१९॥
ये यन्मयः स्मृता मेहास्तेषामेतास्तु तत्कृताः। जिन दोषों के कारण से प्रमेह उत्पन्न होते हैं, उन्हीं दोषों के कारण से ये प्रमेह जन्म पिडकायें उत्पन्न होती हैं ॥
गुदे हृदि शिरस्यसे पुष्टे मर्मणि चोस्थिताः। सोपद्रवा दुर्बेलाग्नेः पिडकाः परिवर्ज्येते ॥२०॥
गुदा, हृदय, शिर, अंस (वाहुका शिर), पीठ, मर्मस्थानों में उत्पन्न एवं तृषा-कास आदि उपद्रवों से युक्त, एवं अल्पानि तथा अल्पशरीरवाले पुरुष में पिडकायें असाध्य होती हैं ॥२०॥ कृत्स्नं शरीरं निष्पीड्य मेदोमज्जावसायुतः।
अधः प्रक्रमते वायुस्तेनासाध्यास्तु वातजाः ॥२१॥ वायु, मेद, मज्जा और वसा (ओज एवं लवीका) के साथ मिलकर सम्पूर्ण शरीर का विलोइनकर समस्त धातुओं को मूत्र मार्ग द्वारा प्रवाहण करती है, इसलिये शरीर के अधः भाग में पिडकायें वलवान् होती हैं। इसलिये वातजन्म पिडकायें असाध्य हैं ॥२१॥
प्रमेहपूर्वरूपाणामाकृतिर्यत्र दृश्यते। किंचिच्छ्वाप्यधिकं मूत्रं तं प्रमेहिणमादिशेत् ॥२२॥ पूर्वरूपावस्था में सब रोग सुखसाध्य होते हैं—इसलिये कहते हैं कि—जिस रोगी में प्रमेह के पूर्वरूप के लक्षण स्पष्ट होने लगे अथवा मूत्र में कुछ अधिकता आने लगे, तो समझ लेना चाहिये कि यह प्रमेही है—इसको प्रमेह होने-वाला है ॥२२॥
कृत्स्नान्यर्धोनि वा यस्मिन् पूर्वरूपाणि मानवे। प्रवृत्तामूत्रमत्यर्थं तं प्रमेहिणमादिशेत् ॥२३॥
जिस रोगी में सम्पूर्ण अथवा आधे प्रमेह पूर्वरूप के लक्षण स्पष्ट हों और मूत्र की मात्रा विशेष रूप से बढ़ जाये, उस रोगी को प्रमेह है, ऐसा जानना चाहिये ॥२३॥
पिडकापीडितं गाढमुपसृष्टमुपद्रवैः। मधुमेहिन्माचष्टे स चासाध्यः प्रकीर्तितः ॥२४॥
१ पिडकाओं के उपद्रव—“तूटकासमांसकोयमोहृदिकोमदज्वरा। विषर्पमर्मसंरोधाः पिडकानामुपद्रवाः ॥”
२५०
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
अतिशय रूप में पिड़काओं से पीड़ित एवं प्रमेह जन्य उपद्रवों से युक्त, मेही को मधुमेही कहते हैं, यह असाध्य है१ ॥ स चापि गमनात् स्थानं स्थानादासनमिच्छति ।
आमनाद् वृणुते शय्यां शयनात् स्वप्नमिच्छति ॥२५॥ मधुमेही रोगी चलने की अपेक्षा खड़ा रहना (काम न करना) खड़े रहने की अपेक्षा बैठना, बैठने की अपेक्षा शय्या (विस्तर पर लेटना), शय्या से सोना अधिक पसन्द करता है ॥
यथा हि वर्णानां पञ्चानामुत्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशेषेण शवल्बध्बृकपिलकपोतमेचकादीनां वर्णानामनेकेषामुत्पत्तिर्भवति, एवमेव दोषधातुमलाहारविशेषेणात्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशेषेण प्रमेहाणां नानाकरणं भवति ॥२६॥
जिस प्रकार कि पांच (सत हरित, कृष्ण, पीत और रक्त) रंगों के उत्कर्ष (अधिकता) एवं अपकर्ष (न्यूनता) द्वारा विशेष संयोग करने पर शवल् (मिश्रित वर्ण), बध् (पिगल वर्ण), कपिल (उज्ज्वल पिगल), कपोत (कबूतरी) और मेचक (उज्ज्वल श्याम-वर्ण) आदि अनेक प्रकार के रङ्ग उत्पन्न होते हैं; इसी प्रकार से दोष (वातादि), दूष्य (मेद वसा आदि), मल आहार की
१ जिस प्रकार से जिशु में कूर्ता-शूरता आदि गुण देखकर- 'सिहो माणवकः' यह प्रयोग होता है, उसी प्रकार से मधुमेही शब्द से—मधु के समान मूत्र प्रवाहित होता है, इसका छोटक मधुमेही शब्द है। इसी प्रकार से—उत्पत्तिजन्य तथा सहजज्य दोनों प्रकार का मधुमेह असाध्य है। कहा भी है—
जातः प्रमेही मधुमेही नो वा न साध्य उक्तः स हि बीज-दोषात् । ये चापि केचित्कालजा विकाराः भवन्ति तांश्च प्रवदन्य-साध्यान् ॥
(२) प्रमेह रोग, केवल मूत्रमार्ग का ही रोग है, यह बात नहीं। प्रमेह तो सारे शरीर का एक रोग है। इस रोग का मुख्य लक्षण—'प्रभूत-आविल मूत्रता'—मूत्र का मात्रा में अधिक और मलिन होना है। वह लक्षण शरीर में दोषों के प्रकोप से उत्पन्न होता है। इसी से चरक में कहा है "त्रयाणामेषां निदानादविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते—प्रगतिभूयस्त्वात्, संप्रकृपितः क्षिप्रमेव शरीरे विस्मृति लभते, शरीरशैथिल्यात् । स विसर्पन् शरीरे मेदसैवादितो मिथीभावं गच्छति । मेदसश्चैव बह्वबद्धत्वात् मेदसश्च गुणानां गुणैः समानगुणभूषिष्ठत्वात् ।" इत्यादि ।
चरक० नि० अ० ४ ।
(३) मधुमेह में शरीर की उष्णमा कम हो जाती है। इसी लिये इस रोग में जो पिड़कायें बनती हैं वे पकती नहीं। इसी उष्णमा को बढ़ाने के लिये इन्सुलिन (पितामिन) दी जाती है ।
विशेषता के न्यूनाधिक द्वारा विशेष होने पर नाना प्रकार के प्रमेह उत्पन्न होते हैं ॥२६॥
भवति चात्र— सर्व एव प्रमेहास्तु कालेनाप्रतिकुर्यतः । मधुमेहत्वमायान्ति तदाऽसाध्या भवन्ति हि ॥२७॥ कहा भी है—
सब प्रकार के प्रमेह—प्रथम क्रियाकाल में चिकित्सा न करने पर मधुमेह में परिवर्तित हो जाते हैं। मधुमेह हो जाने पर असाध्य हो जाते हैं ॥२७॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने प्रमेहनिदानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
सप्तमोऽध्यायः
अथात उदराणां निदानं ष्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
प्रमेह की भांति उदररोग भी शीघ्र उत्पन्न हुए ही मुख्य साध्य हैं, इसलिये प्रमेह के पीछे उदररोग की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥
धन्वन्तरिरधिंभूतां वरिष्ठो
राजविरिन्द्रप्रतिसोऽभवद्यः ।
ब्रह्मर्षिपुत्रं । विनयोपपन्नं
गिर्यं शुभं सुश्रुतमन्वशात् सः ॥३॥
धर्ममाओ में श्रेष्ठ एवं राजर्षि इन्द्र के समान आयुर्वेद-ज्ञाता धन्वन्तरि (शल्यशास्त्र के ज्ञाता), विनय से युक्त (जितेन्द्रिय), ब्रह्मर्षिपुत्र (विश्वामित्र के पुत्र—तप से ब्रह्मत्व प्राप्त करने के कारण), विनय शील आदि शुभ गुणों से युक्त, शिष्य रूप से आये सुश्रुत को शिक्षा देने लगे ॥३॥
पृथक् समस्तैरपि चेह दोषैः
प्लीहोदरं बद्धगुदं तथैव ।
आगन्तुकं समसमश्रमं च
द्वकोदरं चेति वदन्ति तानि ॥४॥
इस शास्त्र में उदररोग आठ प्रकार के हैं। यथा—एक एक दोष से (वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य) तीन, सब दोषों से एक, इस प्रकार से चार प्लीहोदर, बद्धगुदोदर, आगन्तुक और द्वकोदर आठवाँ है। (यकृदाल्पुदर का अन्तर्भाव प्लीहोदर में ही होता है) ॥४॥
सुदुर्बलाग्नेरहिताग्रनश्य
संशुष्कत्यपूत्रनिषेवणाद्वा ।
स्नेहादिमिथ्याचरणान्च जनतो-
र्बुद्धिं गताः कोष्ठमभिप्रपन्नाः ॥५॥
ॐ ७ ]
निदानस्थानम्
३५१
गुल्माकृतिन्यञ्चितलक्षणानि कुर्वन्ति चोराण्युदराणि दोषाः ।
कारण— दुर्बल जठराग्निवाला व्यक्ति जब अहिताशन (विरुद्ध-सम-अध्वान—विषमाशन) करता है, अथवा अतिशुष्क, दुर्गन्ध युक्त अन्न के खाने से, पुरुष के स्नेह-स्वेदन, वमन विरेचनादि कार्यों के अनुचित रूप में सेवन करने से, दोष कुपित होकर कोष्ठ (आमाशय, पिताशय और पक्षाशय) का आश्रय करके गुल्मरोग के समान आकार एवं चिह्न रूपी लक्षणों को उत्पन्न करके कष्टदायक उदररोग को उत्पन्न करते हैं ॥५॥
कोष्ठादुपन्नेहवदनन्तसारो निःसृत्य दुष्टोऽनिलवैगनून्तः ॥६॥
त्वचः समुन्तम्भ्य शनैः समन्ता-
द्विवर्धमानो जठरं करोति ।
सम्प्राप्ति—दूषित अनिल (प्राण-अपान वायु) के कारण प्रेरित अन्नसार (अन्नरस), कोष्ठ से उपस्नेह की भाँति (जिस प्रकार से नवीन घट में से तैल सूक्ष्म छिद्रों द्वारा बाहर आता है—उसी प्रकार से) बाहर निकलकर त्वचा को भली प्रकार से तानकर (आध्यान करके), चारों ओर से धीरे-धीरे बढ़ते हुए उदर रोग को उत्पन्न करता है ॥६॥
तत्पूर्वरूपं बलवर्णकाङ्क्षा-
बलीविनाशो जठरे हि राज्यः ॥७॥
जीर्णीपरिज्ञानविदाहवत्यो
बस्तौ रुजः पादगतश्च शोफः ।
उदररोग के पूर्वरूप—रोगी में बल और वर्ण की चाह रहती है (बल वर्ण घट जाता है), उदर की बलियाँ (हृदिर्या) नष्ट हो जाती हैं, उदर पर रेखायें (उदर में आध्यान होने से) उत्पन्न हो जाती हैं । भोजन के जीर्ण या अजीर्ण होने का शान नहीं होता; विदाह (जलन) होती है, बस्ति में दाहयुक्त वेदना और पाँवों में सूजन आ जाती है ॥७॥
संगृह्य पाश्चोदरपृष्ठनाभी-
यद्वर्धते कृष्णसिराबनद्धम् ॥८॥
सशूलमानाहवदुमशब्दं
सतोदभेदं पवनात्मकं तत् ।
वातोदर—जब वायु—कृष्णरक्तवाही शिराओं का आश्रय करके पाश्च उदर-पीठ और नाभि को घेरकर बढ़ती है, तब इसमें शूल, आनाह के समान तीव्र गुड़गुड़ शब्द, तोद एवं भेद (कुल्हाड़े के काटने के समान) होती है—इसको वातोदर कहते हैं ॥८॥
यच्चोपतृष्णाञ्चरदाहयुक्तं
पीतं सिरा भान्ति च यत्र पीताः ॥९॥
पीताक्षिविण्मूत्रनखानन्त्य
पितोदरं तत्त्वचिराभिबुद्धि ।
पितोदर—उदररोग में चोष (चूसने के समान वेदना), तृष्णा, उच्चर, दाह हो; जब पीली शिरायें (पित्तवह सिरायें) अधिक पीली हो जायें, आँख, मल-मूत्र-नख और चेहरा भी पीला हो जाता है तो पितोदर बहुत शीघ्रता से बढ़ता है ॥९॥
यच्छीतलं शुक्लसिराबनद्धं
गुरु स्थिरं शुक्लनखानन्त्य ॥१०॥
स्तिग्धं महच्छोफयुतं ससादं
कफोदरं तत्त्वचिराभिबुद्धि ।
कफोदर में—उदर शीतल एवं उदर पर शिराजाल श्वेत-सा दीखता है । उदर भारी, स्थिर (कठिन) हो जाता है । रोगी का चेहरा और नख श्वेत हो जाते हैं । उदर, स्तिग्ध, महान्—शोफयुक्त होता है, अङ्गों में ग्लानि होती है, उदर चिरकाल में बढ़ता है ॥१०॥
खियोऽन्नपानं नखरोममूत्र
विडारितवैयुक्तमसाधुवृत्ताः ॥११॥
यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो शरांश्च
दुष्टाभ्वदूषीविषसेवनाद्धा ।
तेनाशु रक्तं कुपिताश्च दोषाः
कुवन्ति घोरं जठरं त्रिलिङ्गम् ॥१२॥
तच्छीतवाताश्रसमुद्धवेवु
विशेषतः कुप्यति दद्यते च ।
स चातुरो मूच्छति संप्रसक्तं
पाण्डुः क्रशः कूष्यति तृष्णया च ॥१३॥
प्रकीर्तितं दूष्युदरं तु घोरं
सनिपातोदर—दुराचारी स्त्रियाँ एवं अविवेकी पुरुष नख रोम-मूत्र-मल-आर्त्तव युक्त खान-पान को, शत्रु गर (संयोगजन्य कृत्रिम विष) जिस व्यक्ति को देते हैं—उसको एवं दूषित जल (विष-मत्स्यदि युक्त), दूषीविष (जो विषदावाग्निवायु और आतप के कारण मन्द हो जाये) के सेवन करने से रक्त और वातादि दोष शीघ्र कुपित होकर त्रिलिंग (वात-पित्त-कफ के लक्षणवाला), घोर उदररोग को उत्पन्न करते हैं । शीत से, वायु से, बादलों के आने पर विशेष रूप में यह रोग बढ़ता है, इसमें जलन होती है । रोगी निरन्तर मूर्च्छित रहता है, रोगी पाण्डुवर्ण, क्रश हो जाता है, प्यास से गला शुष्क हो जाता है । इस उदर को घोर (भयानक-कष्टकारी) एवं दूष्युदर (दुष्प्रतीकार होने से निन्दनीय) कहते हैं ।
वि० मन्तव्य—सोभाय की दुरभिलाषा से प्रेरित नारियाँ कर्मांग का प्रयोग करती हैं, तथा दुष्टा अपने जारों के बहकावे में आकर पति को उक्त प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग कर बैठती हैं और शत्रु—तत्काल पुलिस की कार्यवाही आदि के भय से दूषीविषों का अलक्षित प्रयोग करते हैं । फलतः वह अमाया घुल-घुल कर महीनों खटिया सेकर मरता है ॥११-१३॥
२५२
सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध ।
विदाह्यभिष्यन्दिनरस्य जन्तोः
प्रदुष्टमत्यर्थमसूक्तं कफश्च ॥१४॥
प्लीहाभिषुद्धि सततं करोति
प्लीहोदरं तत् प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।
वामे च पार्श्वं परिबुद्धिमेति
विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र ॥१५॥
मन्दस्वरामिः कफपित्तलिङ्गैः
रूपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ।
इसके आगे प्लीहोदर कहते हैं—उसे जानो—
विदाही एवं अभिष्यन्दि (दोष-धातु मल स्रोतों के क्लेद कारक) पदार्थों के निरन्तर सेवन करने से रक्त और कफ अतिशय रूप में कुपित होकर निरन्तर प्लीहा की वृद्धि को करते हैं, इसको विद्वान् प्लीहोदर कहते हैं। प्लीहा की वृद्धि वामपार्श्व में (पसलियों के नीचे) होती है, रोगी को विशेष रूप में अंग ग्लानि होती है। रागी को मन्द (थोड़ा २) ज्वर रहता है, अग्नि मन्द पड़ जाती है, कफ और पित्तजन्य उदरों के लक्षण रहते हैं। रोगी का वल बहुत घट जाता है, शरीर अत्यन्त पीला पड़ जाता है ॥१४, १५॥
सन्चेतरस्मिन् यकृति प्रदुष्टे
ज्ञयं यकृहात्युदरं तदेव ॥१६॥
तदेव (यही प्लीहोदर-दूषित कफ और रक्त) सन्चेतर (दक्षिण) पार्श्व में यकृत के दूषित होने पर 'यकृद् दाल्युदर' कहाता है। (इसका अन्तर्भाव प्लीहोदर में ही है) ॥१६॥
यस्यान्त्रमन्नेरुपलैपिभिर्वा
बालारमभिर्वा सहितैः पृथग्वा ।
संचीयते तत्र मलः सदोषः
क्रमेण नाङ्याभिवा संकरो हि ॥१७॥
निरुच्यते चास्य गुदे पुरोषं
निरांत कृच्छ्रादपि चाल्यमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये पारबुद्धिर्मात
त (य) बोदरं विट्समगन्धिकं च ॥१८॥
प्रच्छ्रदयन् बद्धगुदो विभाग्यः,
जिस पुरुष की आँतों में—उपलैपि (पिच्छलकेषुकादि) अन्न के कारण से अथवा बाल या अश्म (पत्थर के कणों) से पृथक्-पृथक् अथवा समुदित रूप में, तीनों दोषों से सम्मिलित मल एकत्रित हो जाता है, जिस प्रकार कि नाड़ी (प्रणाली) में (झाड़ू से एकत्रित की गई) धूल का ढेर हो जाता है, उसी प्रकार से गुदा में मल संचित होता है। बड़ी कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा मल बाहर आता है। उदर हृदय और नाभि के मध्य में बढ़ने लगता है। प्रच्छ्रदयन् (आँतों के आमाशय को दबाने से जो वमन आता है, वह) उदर मल के समान गन्धयुक्त होता है, इसको बद्धगुदोदर कहते हैं ॥१७, १८॥
ततः परिष्ठाण्युदरं निबोध ॥
शल्यं यदत्रोपहितं तदन्त्रं
भिनन्ति यस्यागतमन्यथा वा ॥१९॥
तस्मात् सूतोऽन्नात् सलिलप्रकाशः
स्त्रावः श्ववेद्वै गुदतस्तु भूयः ।
नाभेरधश्चोदरमेति वृद्धि
निस्तुद्यतेऽतीव विदह्यते च ॥२०॥
एतत् परिष्ठाण्युदरं प्रदिष्टं
इसके आगे परिष्ठावि उदर को कहते हैं—उसे जानो—
जिस पुरुष में अन्न से मिला शल्य (मत्स्यकण्टक आदि) अथवा अन्यथा (अनुचित तिर्ग रूप में आया तीर, वरछा लुरा आदि शल्य) रूप से आँतों में आकर शल्य आँतों को विदीर्ण कर देता है। इसलिये आँतों से पानी के समान निकला हुआ स्त्राव-गुदा से बार-बार बाहर आता है। उदर में नाभि के निचले स्थान में वृद्धि आरम्भ होती है, चुमने के समान अतिशय वेदना और विदाह होता है। इसको परिष्ठावि उदर कहते ॥१९, २०॥
दकोदरं कीर्तयतो निबोध ।
यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा
वान्तो विरिक्तोऽप्यथवा निरुद्धः ॥२१॥
पिवेञ्जलं शीतलमाशु तस्य
स्रोतांसि दुष्प्यन्ति हि तद्वहानि ।
स्नेहोपलिप्येऽप्यथवाऽपि तेषु
दकोदरं पूर्ववद्भूम्यैति ॥२२॥
स्निग्धं महत् सपरिघुतनाभि
भुञ्जोन्नतं पूर्णमिवाम्बुना च ।
यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च
शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥२३॥
इसके आगे दकोदर को कहते हैं—वह जानो—
स्नेहपान करने पर, अनुवासन कर्म करने पर, वमन करके, विरेचन लेकर, अथवा निरुद्ध कर्म करके जो पुरुष एकदम शीतल जलपान करता है, उस पुरुष के जलवाही स्रोत सहजा दूषित हो जाते हैं। अथवा स्रोतों के स्नेहादि से लिप्त होने पर जब शीतल जल पीता है, तब पूर्व (परिष्ठावि) की भाँति-नाभि के निचले भाग में 'दकोदर' (जलोदर) बढ़ता है। इस रोग में उदर ऊपर से बहुत सा चिकना, नाभि-गोलाकार तथा बहुत ऊँची उठी होती है। जिस प्रकार से मधक पानी से भरी होने पर—जुभित होती है, कम्पन करती है, शब्द करती है, उसी प्रकार से उदर भी जुभित होता है, हिलता है, गति करता है, शब्द करता है, इसको दकोदर (Ascitis) कहते हैं ॥२१-२३॥
आधमानं गमनेऽशक्तिर्दौर्बल्यं दुर्बलामिता ।
शोफः सदन्मक्कानां सङ्को वातपुरीषयोः ।
०८
निदानस्थानम्
२५३
दाहस्तृष्णा च सर्वेषु जठरेषु भवन्ति हि ॥२४॥
सामान्य लक्षण—
आध्यान (अफारा), चलने में अशक्ति, दुर्बलता, अग्नि-मांघ, शोक (सूजन), अंगों में ग्लानि, वात-मल का अवरोध, दाह, वृष्णा—ये लक्षण सब उदररोगों में सामान्य हैं ॥२४॥
अन्ते सलिलभावं हि भजन्ते जठराणि तु।
सर्वाण्येव परीपाकात्तदा तानि विवर्जयेत् ॥२५॥
साध्यासाध्य—
सब उदररोगों के अन्त में उदर के अन्दर पानी उत्पन्न हो जाता है। इसलिये काल के परिणाम से सब उदररोग इस अवस्था में आकर असाध्य हो जाते हैं ॥२५॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने उदरनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥
अष्टमोऽध्यायः
अथातो मूढगर्भनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
उत्तेष की सामान्यता से उदररोगों के उपरान्त मूढगर्भ निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥
प्राग्यधर्मयानवाहनाध्वगमनप्रस्खलनप्रपतनप्रपीडन-धावनाभिघातविषमशयनासनोपवासवेगाभिघातातिरुक्ष-कटुतिकभोजनशोकातिशिरसेवनातिसारवमनविरेचनप्रे-ह्लोहनाजीर्णगर्भशातनप्रभृतिभिर्विशेषैर्वन्धनामुच्यते गर्भः, फलमिव वृन्तवन्धनादभिघातविशेषैः, स विमुक्तवन्धनो गमांशयमतिक्रम्य यकृतस्त्रीहान्नत्रिविरैरवसंसमानः कोष्ठ-संक्षोभमापादयति, तस्या जठरसंक्षोभाद्वायुरपानो मूढः पार्श्वस्तिशीर्षोदरयोनिशुल्कानाम्मूत्रसङ्घातान्मन्यतममापाद्य गर्भं च्यावयति तरुणं शोषितस्त्रावेणः तमेव कदाचिद्विद्वद्भसमस्यागातमपत्यपथसमुप्रागमनिरस्यमानं विगुणा-पानसंमोहितं गर्भं मूढगर्भमित्याचक्ष्यते ॥३॥
मेथुन, रथादि, वाहन (अश्वादि), अध्वगमन (रास्ते की-सुधाफिरी), प्रस्खलन (अकस्मात् पांव का फिसलना), प्रपतन (गिरना) प्रपीडन (दबना), धावन (भागना), अभिघात (चोट लगना), विषम शयन (ऊँची-नीची जगह सोना), विष-मासन (ऊँची-नीची जगह बैठना), उपवास, मल-मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने से, अतिरुक्ष कटु-तिक भोजन से,
१ मूढगर्भ का लक्षण—
सर्वावयवसम्पुणो मनोवदुधादिसंयुतः । विगुणापानसंमूढो मूढगर्भोऽभिधीयते ॥
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शोक से, अतिशार के सेवन से, अतिसार-वमन-विरेचन से, प्रेखोलन (भूला भूलने से), अजीर्ण से (गर्भपात कारक चित्र-कादि औषधियों के सेवन करने तथा अन्य) कारणों से गर्भ बन्धन (नाडीबन्धन) से छूट जाता है, जिस प्रकार कि प्रहारादि के कारण फल वृन्त (गुच्छ, टहनी) से पृथक् हो जाता है, (अकाल में गिर जाता है)।
यह गर्भ नाडीबन्धन से पृथक् होकर गर्भशय्या का उल्ले-घन करके यकृत, प्लीहोदर और अन्न के अन्तराल में से नीचे की ओर गिरता हुआ कोष्ठ (मल-मूत्राशय) में विक्षोभ उत्पन्न करता है। गर्भिणी स्त्री में उदर के विक्षोभ के कारण अपान वायु मूढ़ (क्रिया रहित) होकर पार्श्व-स्तिशीर्ष-उदर-योनि में शूल, आनाह (आध्यान), मूत्रसंग (निरोध)—इनमें से किसी एक रोग को उत्पन्न करके रक्तस्त्राव द्वारा तरुण (अजातसार-अव्यक्त चेतन रूप) गर्भ च्युत करती है। इसी जातसार गर्भ को जब यह निरन्तर बढ़कर असम्यग (विलोम भाग से) रूप से योनिमार्ग में पहुँच जाता है, और अपान वायु के विलोम होने से मच्छित होने के कारण-मार्ग से बाहर नहीं निकलता, तब इसको मूढ़ गर्भ कहते हैं ॥३॥
ततः कौलः प्रतिखुरो बीजकः परिघ इति। तत्र, ऊर्ध्व-बाहुशिरःपादो योनिमुखं निरुणद्धि कौल इव स कौलः; निःस्तुतहस्तपादशिराः कायसङ्घी प्रतिखुरः; यो निर्गच्छत्ये-कशिरोमुजः स बीजकः; यस्तु परिघ इव योनिमुखमावृत्य तिष्ठति स परिघः; इति चतुर्विधो भवतीत्येके भाषन्ते। तत्तु न सम्यक्; कस्मात् ? स यदा विगुणानिलप्रपीडितोऽपत्यपथमनेकधा प्रपद्यते तदा सङ्ख्या हीयते ॥४॥
यह मूढगर्भ चार प्रकार का है। यथा-कौल, प्रतिखुर, बीजक और परिघ। इनमें—जो गर्भ बाहुओं को ऊपर रखकर शिर एवं पांवों द्वारा योनिमुख को रोक लेता है, वह कौल (शंकु) की भाँति होने से 'कौल' है। जो गर्भ हाथ पांव और शिर बाहर निकालकर शरीर के मध्यभाग से योनिमार्ग को रोकता है, वह 'प्रतिखुर' है। जिस गर्भ की एक भुजा और शिर बाहर निकल जाता है, उसे 'बीजक' कहते हैं। और जो गर्भ परिघ (अर्गल) के समान (तिर्यगवस्था-Transvers Position)—योनिमुख को घेर के रहता है इसे 'परिघ' कहते हैं, इस प्रकार से मूढगर्भ चार प्रकार का है, ऐसा कई आचार्यों का सिद्धान्त है। यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि—जिस समय विलोम अपान वायु से पीड़ित होकर अनेक रूप से योनिमार्ग में आता है, उस समय इस चार संख्या का अतिक्रमण कर जाता है। तत्र, कश्चिद् द्वाभ्यां सकिथभ्यां योनिमुखं प्रतिपद्यते, कश्चिद्वासुनैकसकिथरैकेन, कश्चिद्वासुनसकिथशरीरः स्फि-ग्देशेन तिर्यगागतः, कश्चिदुरःपार्श्वपूठानामन्यतमेन योनि-
२५४
मुश्रुतसंहिता
[१००]
द्वारं पिधायावतिष्ठते, अन्तःपार्श्वेष्वुत्तशिराः कश्चिद्वेकेन बाहुना, कश्चिदाभुग्नशिरा बाहुद्वयेन, कश्चिदाभुग्नमध्यो हस्तपादशिरोभिः कश्चिद्वेकेन सवन्धना योनिमुखं प्रतिपद्यतेऽपरेण पायुम्, इत्यष्टविधा मृदुगर्भगतिरुद्दिष्टा समासेन ॥
यथा—कोई गर्भ दोनों टांगों से योनिमुख में आता है, कोई गर्भ एक टांग को संकुचित करके एक टांग से योनिमार्ग में उतरता है, कोई गर्भ टांग और शरीर को संकुचित करके—स्फिग (नितम्ब) भाग से तिरछे रूप में योनिमुख में पहुँचता है। कोई गर्भ उग्र, पीठ पार्श्व—इनमें से किसी एक अवयव से योनिद्वार को रोक कर रहता है। कोई गर्भ शिर को अन्दर की ओर झुकाकर निचुक को छाती पर रखकर—एक बाहु द्वारा योनिमुख में आता है। कोई गर्भ शिर को संकुचित करके दोनों बाहुओं से, कोई शरीर के मध्यभाग को झुकाकर हाथ-पांव और शिर से, कोई गर्भ एक ही टांग से और कोई गर्भ गुदा द्वारा योनिमार्ग में आता है। इस प्रकार से संक्षेप में आठ प्रकार की मृदुगर्भ की गतियाँ कह दी हैं ॥५॥
तत्र द्वावन्त्यावसाध्यौ मृदुगर्भौ, शेषानपि विपरीतेन्द्रियार्थात्क्षेपकयोनिभ्रंशसंवर्णमकल्लश्ववासकासभ्रमनिपीडितान् परिहरेत् ॥६॥
इनमें सातवें या आठवें प्रकार का मृदुगर्भ स्वभाव से ही असाध्य है। शेष मृदुगर्भों में निम्न लक्षण होने पर इनको भी असाध्य समझना चाहिये। यथा—जिस समय स्त्री रुपादि इन्द्रिय-विषयों को ठीक प्रकार से ग्रहण न कर सके, आक्षेपक (Convulsions) हो, योनिभ्रंश (योनि का बाहर आना), योनिसंवर्ण (योनि का संकोच), मक्कल्ल (प्रसूता स्त्री में वायु रक्त को रोककर बस्ति, शिर में शूल उत्पन्न करती है), श्वास, कास, भ्रम (चक्कर)—ये लक्षण हों तो असाध्य समझना चाहिये ॥ भवन्ति चात्र—
कालस्य परिणामेन मुक्तं वृन्ताद्यथा फलम् ।
प्रपद्यते स्वभावेन नान्यथा पतितुं भ्रुवम् ॥७॥
एवं कालप्रकर्षेण मुक्तो नाडीनिबन्धनात् ।
गर्भाशयस्थो यो गर्भो जननाय प्रपद्यते ॥८॥
कहा भी है—
जिस प्रकार से कालजन्य परिपाक के कारण वृन्त (टहनी) से मुक्त हुआ फल स्वभाव से ही गिरने लगता है, अन्यथा रूप में स्वयं नहीं गिरता, उसी प्रकार काल-स्वभाव से गर्भाशय में स्थिर गर्भ नाडीबन्धन से पृथक् होकर जन्म ग्रहण करता है ॥
कृमिवाताभिघातैस्तु तदेवोपद्रुतं फलम् ।
पतत्यकालेऽपि यथा तथा स्याद् गर्भविच्युतिः ॥९॥
जिस प्रकार से कृमि, वायु अथवा चोट के कारण से यही
फल (बिना समय) में गिर पड़ता है, उसी प्रकार से यह गर्भ भी असमय में गिरता है ॥९॥
आचतुर्थात्ततो मासात् प्रस्रवैत् गर्भविच्युतिः ।
ततः स्थिरजारीरस्य पातः पञ्चमपठयोः ॥१०॥
यदि चार मास तक के गर्भ का भ्रंश हो तो इसको गर्भ-स्त्राव (Abortion) कहते हैं, (चार मास तक मृदुगर्भ नहीं है)। चार मास के पीछे शरीर के स्थिर होने पर 'गर्भपात' कहा जाता है (Mis carriage)। इनके आगे सातवें मास में पूर्व प्रसव (Pri-Birth) कहते हैं ॥१०॥
प्रविध्यति शिरो या तु शीताङ्गी निरपत्रपा ।
नीलोद्गतसिरा हन्ति सा गर्भं स च तां तथा ॥११॥
जो स्त्री अंगों को झुकाकर शिर को अतिशय हिलाती-डुलाती है, जिस स्त्री की लज्जा सर्वथा चली गई, जिस स्त्री की शिराएँ ऊपर को उठ गईं एवं काली पड़ गईं हैं, वह स्त्री गर्भ को और वह गर्भ उस गर्भवती स्त्री को नष्ट कर देता है ॥११॥
गर्भास्पन्दनमावीनां प्रणाशः श्यावपाण्डुता ।
भवत्युन्मूलासपूतित्वं शूलं चान्तमुते शिशो ॥१२॥
शिशु के गर्भाशय में मर जाने पर, गर्भ का स्पन्दन (हिलना-डुलना) बन्द हो जाता है, आदि (प्रसववेदनायें) नष्ट हो जाती हैं, शरीर का रंग काला-पीला पड़ जाता है, निःश्वास में दुर्गन्ध आती है ॥१२॥
मानसागन्तुभिर्मातुरूपतापैः प्रपीडितः ।
गर्भो व्यापद्यते कुक्षौ व्याधिभिश्च प्रपीडितः ॥१३॥
माता के मानसिक (शोकादि) एवं आगन्तुज (चोट आदि) दुःखों द्वारा पीड़ित होने से तथा रोगों के कारण पीड़ित गर्भ कुक्षि (गर्भाशय) में मर जाता है ॥१३॥
बस्तमारविपन्नायाः कुक्षिः प्रस्पन्दते यदि ।
तत्क्षणं जन्मकाले तं पाटयित्वोद्भवेद् भिषक् ॥१४॥
बस्तमार (गला घोटकर शीघ्र-बिना कष्ट से मारी हुई बकरी के समान-शीघ्र मृत) की भांति मृत स्त्री के उदर में यदि गर्भ जीवित हो (चंछा करता हो) तो —
१ अन्य लक्षण—
'सोऽन्तर्भूतो गर्भो शूनो बस्तिरिवाततः ।
उत्क्षिप्यन्त इवांगति मूत्रबस्तिरश्च भिद्यते ॥
क्लोमप्लीहा यकृच्छ्रैव फुफ्फुसं हृदयं तथा ।
गर्भेण पीडितं पितादुर्ध्वं प्रकामति स्थिरः ॥
सा शूयते मुह्यति च कृच्छ्रश्वासा च जायते ।
पूतिगन्धस्तथा स्वदो जिह्वा तालु च शूज्यति ॥
वेपते भ्रास्यति तथा जीवितं चोपरुध्यते ।
एतैर्लिङ्गैर्विजानीयात् मृतं गर्भचिकित्सकः ॥
अ० ६ ]
निदानस्थानम्
२५५
तक्षण जन्मसमय में उदर को चीर कर गर्भ को निकाल लेना लेना चाहिये। अन्यथा शिशु भी मर जायगा।
श्री हारणचन्द्र जो ने तो यह अर्थ किया है, कि जब अव्ययमार्ग तंग हो तब प्रसव के समय उदरमार्ग को चीरकर बच्चा बाहर निकाल लेना चाहिये। श्री घ्राणकर जी का कहना है कि बालक के जन्म के समय जब माता की विपन्नवस्था हो, तब उदर को चीरकर बालकको बाहर कर लेना चाहिये। १४।
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मृदुगर्भनिदानं नामष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो विद्वधीनां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
शस्त्रचिकित्सा के साधर्म्य से मृदुगर्भ निदान के अनन्तर विद्वधि के निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—विद्वधि वह फोड़ा है जिसका मूल अस्थि में होता है। परन्तु बाह्यविद्वधि का ही मूल अस्थि में होता है, अन्तर्विद्वधि का नहीं। १. २ ॥
सर्वामरगुरुः श्रीमान्निमित्तान्तरभूमिपः।
शिष्यायोवाच निखिलमिदं विद्वधिलक्षणम् ॥ ३ ॥
देवताओं के गुरु कारणवश पृथिवी पर राजा के रूप में अवतीर्ण हुए भगवान् धन्वन्तरि ने अगे कहे जानेवाले इन विद्वधि लक्षणों को समस्त रूप में शिष्य के लिये कहा है। ३॥
त्वप्रकृतांसमेदासि प्रदूष्यास्थिसमाश्रिताः।
दोषाः शोफं शनैघौरं जनयन्त्युच्छिन्ना भृशम् ॥ ४ ॥
(२) चरक में—
“अन्तःकुक्षे गर्भो घ्नियते, तस्याः स्तिमितं स्तम्भमुदरमाततं शीतमरमान्तर्गतमिव भवति अस्पन्दनो गर्भः, शूलमधिकमुपजायते, न चाव्यः प्रादुर्भवति, योनिर्न प्रसवति, अच्चीणो चास्याः स्तस्ते भवतः, ताम्यति, व्यथते, भ्रमते, स्वसिति, अरतिबहुला च भवति। न चास्या वेगप्रादुर्भाव उपलभ्यते।”
१ वारभट्ट में निम्न प्रकार से यह श्लोक पढ़ा है—
“वस्तिद्वारे विपन्नायाः कुचिः प्रस्पन्दते यदि।
जन्मकाले ततः शीघ्रं पाटयिन्वोद्धरेद भिषक् ॥”
गर्भिणी के मरने पर वस्ति द्वार के पास में कुष्ठि अतिशय रूप में हिलती हो तो कुशल वैद्य को चाहिये कि कुष्ठि के प्रस्पन्दन के पीछे उदर को चीरकर शिशु को बाहर निकाल लेवे।
महामूलं रुजावन्तं वृत्तं चाप्यथवाऽऽयतम् तमाहुर्विद्वधि धीरा, विज्ञेयः स च पड्विषः ॥ ५ ॥ पृथग्दोषैः समस्तैश्च श्वेतोनाप्यमुजा तथा। पण्णासपि हि तेषां तु लक्षणं संप्रवदधते ॥ ६ ॥
सम्भासि—अतिशय कृपित वातादि दोष अस्थि का आश्रय करके स्वर्चा, रक्त, मांस एवं मेद को दूषित करके घोर शोथ को धीरे-धीरे उत्पन्न करते हैं। “विद्वहित इति विद्वधिः” “श्रीघ्रं विद्वहित्वात् विद्वधिरित्यभिधीयते।” चरक। जिस समय यह शोथ महान् मूलवाला, अतिशय। पीड़ायुक्त, गोठकार अथवा आयताकार होता है, उस समय बुद्धिमान् पुरुष इसको ‘विद्वधि’ कहते हैं। यह विद्वधि रोग छे प्रकार का है। यथा—पृथक् पृथक् दोषों ( वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य ) समस्त दोषों ( सन्निपातजन्य ) से, चोट लगने से और रक्तजन्य इन छे प्रकार की विद्वधि के लक्षणों को कहते हैं। ४-६॥
कृष्णोऽरुणो वा पुरुषो भृशमत्यर्थवेदनः।
चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्वधिर्वातसंभवः ॥ ७ ॥
वातजन्य विद्वधि—कृष्ण या अरुण ( लाल ) वर्ण, कठोर, अस्पन्दन वेदना युक्त, देर में उत्पन्न होती है, और देर में ही पकती है। श्रीघ्राणकरजी ने चित्रोत्थान के स्थान पर ‘चित्रोत्थान’ पाठ करके विविध प्रकार से उठनेवाली अर्थ किया है।
पक्वोदुम्बरसङ्काशः श्यावो वा ज्वरदाहवान्।
क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्वधिः पित्तसंभवः ॥ ८ ॥
पित्तजन्य विद्वधि—
पके हुए गूजर के समान लाल या काली, ज्वर एवं दाह से युक्त, शीघ्र उत्पन्न होती है और शीघ्र ही पक जाती है। ८॥
शरावसहस्रः पाण्डुः शीतः स्तब्धोऽल्पवेदनः।
चित्रोत्थानप्रपाकश्च सकण्डूश्च कफोत्थितः ॥ ९ ॥
कफजन्य विद्वधि—
शराव के समान बड़ी, चककेदार, पाण्डुवर्ण, शीतल, स्तब्ध ( जड़ ) थोड़ी वेदना युक्त, देर में उत्पन्न होती है और देर में पकती है, एवं कण्डू होती है। ९ ॥
तनुपीतसिताश्चेषामात्मावाः क्रमशः स्मृताः।
इनमें पकने पर—वातजन्य विद्वधि का खाव—( पतला ) पित्तजन्य का पीला और कफजन्य का श्वेत खाव होता है।
नानावर्णरंजनात्मावो घाटालो विषमो महान् ॥ १० ॥
विषमं पच्यते चापि विद्वधिः सान्निपातकः।
सन्निपातजन्य विद्वधि—
नानावर्ण युक्त ( काली-पीली शुक्ल ), अनेकविध पीड़ा युक्त ( तोद-दाह-कण्डू युक्त ), नानाविध खाव युक्त ( तनु पीत-
१ चित्रो नानाविधा वायोः विषमकित्यत्वाद उदगमप्रपाका यस्य स तथा “मधुकोप”।
१५६
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १ ]
शुक्ल), अत्यन्त उभरी हुई, विषम आकार की, बहुत फैली हुई, विषम रूप में (कुछ भाग शीघ्र पकता है, कुछ देर में अथवा गम्भीर एवं उत्तान भेद से) पकती हैं ॥ १० ॥
तैस्तैर्भावैरभिहते क्षते वाऽपथ्यसेविनः ॥ ११ ॥
क्षतोष्मा वायुविसृतः सरकं पित्तमीरयेत् ।
स्वरस्तृष्णा च दाहश्च जायते तस्य देहिनः ॥ १२ ॥
एष विद्रधिरागन्तुः पित्तविद्रधिलक्षणः ।
आगन्तुज विद्रधि—
व्रण में—घोड़े से गिरने या गृह प्रहार आदि से चोट लगने पर, अथवा अपथ्य सेवन करने पर व्रण की उष्णमा (पित्त), वायु से फैलकर रक्त एवं पित्त को प्रेरित करता है। इसके कारण पुरुष को—स्वर-तृष्णा और दाह उत्पन्न होता है। इसको आगन्तुज विद्रधि कहते हैं, इसमें पित्तजन्य विद्रधि के लक्षण होते हैं ॥ ११, १२ ॥
कृष्णमफोटावृतः श्यावस्तीव्रदाहूरजाज्वरः ॥ १३ ॥
पित्तविद्रधिलिङ्गैस्तु रक्तविद्रधि रुच्यते ।
रक्तजन्य विद्रधि—काली फुसियों से घिरी हुई काले रक्त की, तीव्र दाह एवं अतिशय वेदना से युक्त, पित्तजन्य विद्रधि के लक्षणों से युक्त होती है ॥ १३ ॥
उक्ता विद्रध्यो ह्यते तेष्वसाध्यस्तु सर्वजः ॥ १४ ॥
इन उपर्युक्त विद्रधियों में सन्निपातजन्य विद्रधि असाध्य है , शेष पाँच साध्य हैं ॥ १४ ॥
आभ्यन्तरानतस्तृष्यं विद्रधोन् परिचक्षते ।
गुर्वसात्स्यचिरद्वान्तगुणकंसंसृष्टभोजनात् ॥ १५ ॥
अतिव्यव्यायामवेगाघातविदाहिभिः ।
पृथक् संभूय वा दोषाः कुपिता गुरुमरूपिणम् ॥ १६ ॥
बलमीकवत्समुन्तद्वमन्तः कुर्वन्ति विद्रधिम् ।
इसके आगे आभ्यन्तर (अन्तः) विद्रधियों को कहते हैं —गुरु-असात्स्य विरुद्ध अन्त के सेवन से, शुष्क भोजन से, संसृष्ट (दूषित प्रदेश में) भोजन करने से, अति मैथुन से, व्यायाम से, उपस्थित मल मूत्रादि के वेगों को रोकने से, विदाही भोजनों से, दोष—पृथक्-पृथक् अथवा सम्मिलित रूप में कुपित होकर गुरुम के समान कठोर विद्रधि को उत्पन्न करते हैं। यह अन्तः विद्रधि बलमीक के समान (पन्यमानावस्था में) ऊपर को उठी होती है।
वि० मन्तव्य—अन्तविद्रधि—भीतरी अवयवों के फोड़ा का नाम है ॥ १५, १६ ॥
गुदे वस्तिमुखे नाभ्यां कुक्षौ वक्ष्क्षणयोस्तथा ॥ १७ ॥
वृक्षयोर्यक्त्ति प्लीहि हृदये क्लोमिन वा तथा ।
तेषां लिङ्गानि जानीयाद्वाहविद्रधिलक्षणैः ॥ १८ ॥
आमपक्वेषणीयाच्च पक्वापक्वं विनिर्दिशेत् ।
स्थान—गुदा, वस्तिमुख, नाभि (अन्त), कुक्षि (उदर), वंक्षण (Croins), वृक्क (गुदा), यकृत, प्लीहा, हृदय और क्लोम (पित्ताशय या आमाशय) में उत्पन्न होती हैं। बाह्य विद्रधि के लक्षणों से ही अन्तःविद्रधि को पहचानना चाहिये। 'आमपक्वेषणीय' अध्याय में वर्णित पक्व एवं अपक्व के लक्षणों से पक्वापक्व का निश्चय करना चाहिये ॥ १७, १८ ॥
अधिष्ठानविशेषेण लिंगं श्रुणु विशेषतः ॥ १९ ॥
गुदे वातनिरोधस्तु वस्ती कृच्छ्रालपमूत्रता ।
नाभ्यां हिक्का तथाऽऽटोपः कुक्षौ मासतकोपनम् ॥ २० ॥
कटीपृष्ठग्रहस्तीव्रो वक्ष्क्षणोत्थे तु विद्रधौ ।
वृक्षयोः पार्श्वमङ्गोचः प्लीह्यङ्गासावरोधनम् ॥ २१ ॥
सर्वांगाग्रहस्तीव्रो हृदि शूलश्च दारुणः ।
श्वासो यकृति तृष्णा च पिपासा क्लोमजेऽधिका ॥ २२ ॥
स्थानभेद से विशेष लक्षणों को सुनो—गुदा में विद्रधि होने पर वायु का अवरोध, वस्ति में होने से कठिनाई से थोड़ा मूत्र आता है, नाभि में होने पर ह्रिचक्री एवं आटोप (आधमान), कुक्षि में होने पर वायु का प्रकोप वंक्षणजन्य विद्रधि में—कठिग्रह और तीव्र पृष्ठग्रह (जकड़ना) होता है, वृक्क में होने पर पाश्वों में संकोच, प्लीहा में होने में श्वास का अवरोध (रुकना), हृदय में होने पर—तीव्ररूप में सब अङ्गों का ग्रह (पकड़ा जाना), तीव्र शूल होता है, यकृत में विद्रधि होने पर—श्वास और तृष्णा होती है, क्लोम में होने पर अधिक प्यास लगती है ॥
आमो वा यदि वापक्वो महान् वा यदि वेतरः ।
सर्वो मर्मोत्थितश्चापि विद्रधिः कष्ट उच्यते ॥ २३ ॥
मर्मस्थान में यदि कोई आम (अपक्व) या पक्व, महान् अथवा अल्प—किसी भी प्रकार की विद्रधि उत्पन्न होती है, वह सब कष्ट रूप होती है ॥ २३ ॥
नाभेरुपरिजाः पक्वा यान्त्यूर्ध्वमितरे त्वधः ।
जीवत्यधो निःसृतेषु सृतेषूच्च न जीवति ॥ २४ ॥
हृन्ताभिवस्तिवज्यो ये तेषु भिन्नेषु बाह्यतः ।
जीवेत् कदाचित् पुरुषो नेतरेषु कदाचन ॥ २५ ॥
नाभि से ऊपर (प्लीहा, यकृत-क्लोम, कुक्षि और हृदय में) उत्पन्न विद्रधियाँ पकने पर ऊपर की ओर (मुख-नाक से) क्षति होती हैं। दूसरी—(गुदा-वस्ति-वंक्षण-वृक्क में) विद्रधियाँ पकने पर नीचे की ओर (गुदा मूत्र मार्ग) से क्षति होती हैं। इनमें नीचे की ओर बहनेवाली विद्रधियों में मनुष्य नहीं जीता है, ऊपर की क्षति होनेवाली विद्रधियों में मनुष्य नहीं जीता। यदि कभी भाग्यवश से हृदय, नाभि और वस्ति की विद्रधियों को छोड़कर अन्य (शेष-गुदा-कुक्षि वंक्षण-यकृत प्लीहा क्लोम और वृक्क की) विद्रधियाँ बाहर की ओर त्वचा में फूट जाती हैं, तो मनुष्य कदाचित् बच जाता है, परन्तु हृदय नाभि और वस्ति की आभ्यन्तर विद्रधियों के नीचे की ओर फटने पर पुरुष कभी नहीं जीवित रहता ॥ २४, २५ ॥
अ० १ ] ३३
निदानस्थानम्
२५७
क्षीणामपप्रजातानां प्रजातानां तथाऽहितैः । दाहज्वरकरो घोरो जायते रक्तविद्रधिः ॥२६॥
रक्तविद्रधि—गर्भ के पात या साव होने से अथवा ठीक समय प्रसव करने पर अहित (शीत-रुक्ष आहार-विहार के) सेवन से स्त्रियों में—दाह, ज्वर एवं कष्टदायक रक्तजन्य (आत्तवजन्म) विद्रधि उत्पन्न होती है ॥२६॥
अपि सम्यक् प्रजातानामसूक् कायादनिःसूतम् ।
रक्तजं विद्रधिं कुर्यात् कुक्षौ मक्कल्लसंज्ञितम् ॥२७॥
ठीक समय पर भली प्रकार से प्रसव होने पर भी यदि गर्भाशय से रक्त (दूषित रक्त) बाहर न निकले तो मक्कल्ल के कारण कुक्षि में रक्तजन्य विद्रधि (स्त्रियों में) उत्पन्न होती है ।
वि० मन्तव्य—प्रसूता के गर्भाशय के शूल का नाम भी "मक्कल" है ॥२७॥
समाहाशोपशान्तश्चेत्तोऽसौ संप्रपद्यते ।
यदि यह रक्तजन्य विद्रधि सात दिन में शान्त न हो तो पित्त की उष्णमा के कारण अन्दर पकती है, पकने पर असाध्य हो जाती है ।
विशेषमथ बध्यामि स्पष्टं विद्रधिगुल्मयोः ॥२८॥
गुल्मदोषसमुत्थानाद्द्विद्वैगुल्मकस्य च ।
कस्मान्न पच्यते गुल्मी विद्रधिः पाकमेति च ॥२९॥
न निबन्धोऽस्ति गुल्मानां विद्रधिः सनिबन्धनः ।
गुल्माकाराः स्वयं दोषा विद्रधिर्मांसशोणिते ॥३०॥
विवरासुचरो ग्रन्थिरप्सु बुद्धबुद्धको यथा ।
एवंप्रकारो गुल्मस्तु तस्मात् पाकं न गच्छति ॥३१॥
मांसशोणितबाहुल्यात् पाकं गच्छति विद्रधिः ।
मांसशोणितहीनःबाद्धगुल्मः पाकं न गच्छति ॥३२॥
गुल्मस्तिष्ठति दोषे स्वे विद्रधिर्मांसशोणिते ।
विद्रधिः पच्यते तस्माद्गुल्मश्चापि न पच्यते ॥३३॥
इसके आगे गुल्म और विद्रधि रोग में भेद को कहते हैं—
प्रश्न—गुल्म और विद्रधि के कारण दोष एक समान हैं । इस पर गुल्म किस कारण से नहीं पकता और विद्रधि किस लिये पकती है ? उत्तर—गुल्म का कोई निबन्ध (मूल) नहीं है, (रक्तादि द्रव्यों का अभाव रहता है), विद्रधि रोग का मूल (स्वासा रक्त-मांस आदि) है । गुल्म रोग में वातादि दोष स्वयं ही (दूष्य के आश्रय के बिना ही) गुल्माकार बन जाते हैं, विद्रधि में दोष मांस एवं रक्त का आश्रय लेकर गुल्म रूप होते हैं । जिस प्रकार से पानी में वायु से बुलबुले बन जाते हैं, इसी प्रकार से वायुजन्य गुल्म विवर (स्त्रियों में) का अनुसरण करके रक्त पित्त-रक्त में ग्रन्थि रूप से हो जाता है । इसलिये गुल्म पकता नहीं । विद्रधि में मांस और रक्त की अधिकता रहती है इसलिये विद्रधि पकती है । गुल्म में मांस और रक्त नहीं रहता
है, इसलिये गुल्म नहीं पकता । गुल्म अपने वातादि दोषों में ही रहता है, विद्रधि मांस-रक्त (दूष्य) में रहती है, इसलिये विद्रधि पकती है और गुल्म नहीं पकता ॥३३॥
हन्ताभिर्वस्तिजः पक्वो वज्यो यश्च त्रिरोपजः ।
हृदयं, नाभिं, वस्ति में उत्पन्न विद्रधि पकने पर तथा सन्निपातजन्य विद्रधि—जहाँ कहीं भी हो, वह असाध्य है ।
अथ मज्जपरीपाको घोरः समुपजायते ॥३४॥
सोऽस्थिमांसनिरोधेन द्वारं न लभते यदा ।
ततः स व्याधिना तेन ज्वलनेनेव दह्यते ॥३५॥
अस्थिमज्जोष्मणा तेन जीयते दह्यमानवत् ।
विकारः शल्यभूतोऽयं क्लेशयेदातुरं चिरम् ॥३६॥
अथास्य कर्मणा व्याधिद्वारं तु लभते यदा ।
ततो भेदः प्रभं स्निग्धं शुक्लं जीतमथो गुरुः ॥३७॥
भिन्नेऽस्थिन् निःस्ववेत् पृथमेतदस्थिगतं विदुः ।
विद्रधिं शास्त्रकुशलाः सर्वदोषरुजावहम् ॥३८॥
प्राक्तन कर्मों के कारण अथवा उपेक्षा से विद्रधि अस्थि में पहुँचकर पक जाती है—उसके लक्षण कहते हैं—उपेक्षा से या कर्मवश कष्टकारी मज्जा का परिपाक होने लगता है । यह मज्जा पाक अस्थि एवं मांस से रुक जाने पर मार्ग नहीं पा सकता । तब वह स्थान इस मज्जापाक रोग से अग्नि के समान जलने लगता है । अस्थि एवं मज्जा की उष्णमा से जलते हुए के समान शीर्ण (राख-भस्म) हो जाता है । यह शल्य रूप विकार रोगी को देर तक दुःख देता है । जब शास्त्रकर्म द्वारा रोग को मार्ग मिल जाता है, तब भेद के समान स्निग्ध, श्वेत, शीतल, गुरु (भारी) पृथ्—अस्थि के भिन्न होने पर बाहर खतित होती है । शास्त्रकुशल वैद्य इसको अस्थिगत विद्रधि कहते हैं । इसमें सन्निपातजन्य पीड़ा होती है ॥३४-३८॥
इति श्रीसुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने विद्रधिनिदानं नाम नवमोऽध्यायः ॥६॥
— — —
१ सब गुल्मों में वायु मुख्य कारण है—इसी से कहा है—'गुल्मनामनिलशान्तिरुगयैः सर्वशो विधिवदचरितव्या । मासते ह्यवजितेऽन्यमुदोर्णदोषमल्पमपि कर्म निहय्यात् ॥
'चरक'
चरक में जहाँ गुल्मविकित्सा में पक्वगुल्म का वर्णन है, वह अन्तः विद्रधि का समझना चाहिये । चरक के त्रिशोथीय अध्याय में गुल्म का वर्णन किया है । विद्रधि के दो भेद बताते हुए—'विद्रधिं द्विविधामाहः बाह्यामाभ्यन्तरी तथा'—कहकर—अन्तः विद्रधि का समावेश गुल्म में किया है । सुश्रुत में गुल्म और विद्रधि दोनों पृथक् रखे हैं, इसलिये, अन्तः विद्रधि को—विद्रधि में रख दिया है—'कृतवास्तुप्रिग्रहं गुल्म पकता है, 'अकृतवास्तु-प्रिग्रहं गुल्म नहीं पकता—यह दूसरा भी अन्तर है ।
२१८
सुश्रुतसंहिता
[ अ० १० ]
दशमोऽध्यायः
अथातो विसर्पनाडौस्तनरोगनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
त्वचा रक्त आदि दूष्य (आश्रित) वस्तुओं की समानता से विद्रधि के अनन्तर विसर्प नाड़ी स्तन रोग की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—यह विसर्प कुष्ठनिदानोक्त विसर्प कुष्ठ से भिन्न है इसमें कुष्ठ के पूर्वरूप नहीं होते और यह सद्वा उत्पन्न होता है और १०-२० दिन में शान्त भी हो जाता है। एक विलक्षण विसर्प का वर्णन चरक में आया है और कभी कभी दृष्टिगोचर भी होता है वह है—यज्ञोपवीतपतिमाः प्रभूता च० चि० अ० १२। ये स्फोट (फफोले) यज्ञोपवीतव्याप्य शरीर-वयव पर होते हैं। बाँएँ स्क्रन्ध से दाईं कृषि या पार्श्व तक—वस्त्र एवं पीठ पर निकलते हैं ॥१,२॥
त्वङ्मांसगोणितगताः कृपितास्तु दोषाः सर्वाङ्गसारिणमिहास्थितमात्मलिङ्गम् । कुर्वन्ति विस्मृतमनुन्तमाशु गोफं तं सर्वतो विसरणारुच विसर्पमाहुः ॥३॥
कृपित हुए वातादि दोष सम्मिलित होकर त्वचा (त्वचा-श्रित उसी का भी), मांस और रक्त का आश्रय करके—सर्वांग-विसर्पि (अन्तः एवं बाह्य तथा अवयव रूप से अंगों में फैलने-वालों), अस्थित (अनिश्चल-इधर उधर फिरनेवाली), आत्मलिग (व्यस्त समस्त रूप वातादि लक्षणों से युक्त), फैला हुआ ऊपर न उठा हुआ सूजन उत्पन्न करते हैं। इस सूजन को सब ओर फैलने से इसे वाच में 'विसर्प' कहते हैं ॥३॥
वातात्मकोऽसितमृदुः परुषोऽङ्गमदे- संभेदतोदपवनञ्चरलिङ्गयुक्तः । गण्डैर्यदा तु विषमेरतिदूषितः वा— द्युक्तः स एव कथितः खलु वर्जनीयः ॥४॥
यद्यपि विसर्प त्रिदोषजन्य है, तथापि चिकित्सासौकर्य के लिये घातादि दोष भेद से लक्षणों को कहते हैं— वातजन्य विसर्प—कृष्ण, कोमल, खुरदरा होता है, शरीर में पीड़ा, भेद तोद (बुभने के समान), एवं वायुजन्य ज्वर के लक्षणों से युक्त, वायु से अति दूषित होने के कारण विषम (निम्नोन्नत) गण्डों से (मांसजन्य गुडिका अथवा अग्नि से जलने पर उत्पन्न छालों जैसे) युक्त होता है। इस अवस्था में वह असाध्य है। (कोई २ आचार्य गण्डों की उत्पत्ति वातपित्त से मानते हैं) ॥४॥
पित्तात्मको दुतगतिञ्चरदाहपाक- स्फोटप्रभेदबहुलः क्षतजप्रकाशः । दोषप्रवृद्धिहतमांससिरो यदा स्यात् सोतोजकदंमनिभो न तदा स सिध्येत् ॥५॥ पित्तजन्य विसर्प—शीघ्र फैलनेवाला, तीव्र ज्वर, तीव्र दाह, पाक स्फोट (छालें) एवं काटने के समान वेदना से युक्त क्षतज (रक्त या वर्ण) के समान दीखता है। जिस समय दोष के अति बढ़ने से मांस और शिरायें नष्ट हो जायें, और रक्त स्रोत (सौवीरांजन) के समान या कदंम (क्रीचड़) की भाँति हो जाय, तब यह असाध्य है। (कोई आचार्य पित्त-रक्त के लक्षण मानते हैं) ॥५॥
श्लेष्मात्मकः सरति मन्दमशोघपाकः रिग्वधः सितश्चवयथुरल्परुगुप्रकण्डुः । कफजन्य विसर्प—धीरे धीरे फैलता है, देर में पकता है, रिग्वध, श्वेत वर्ण, थोड़ी सूजन युक्त और कण्डू-तीव्र होती है। सर्वात्मकच्छिबिधवर्णरुजोऽवगाहः पक्वो न सिध्येति च मांससिराप्रशतात् ॥६॥ सन्निपातजन्य विसर्प में—वातादि तीनों दोषों का काला-पीला श्वेत वर्ण, तीनों दोषों की तोद-दाह, कण्डू, वेदना होती है, आभ्यन्तर मूलवाला है। मांस और शिरा के नष्ट होने पर, पक्वावस्था में असाध्य है, प्रथम अवस्था में कष्टसाध्य है ॥६॥
सद्यः क्षतत्रणमुपेत्य नरस्य पित्तं रक्तं च दोषबहुलस्य करोति शोकम् । स्यावं सटोहितमतिञ्चरदाहपाकं स्फोटैः कुलथसट्जैरसितैश्च कौर्णम् ॥७॥ क्षतजन्य विसर्प—दोषबहुल (कुष्ठ-वातरक्तादि पूर्व-रक्त दोषदूषित धातु) पुरुष में पित्त और रक्त सद्यः क्षतजन्य त्रण में पहुँचकर शोक को उत्पन्न करते हैं। यह शोक—कृष्णवर्ण, रक्तवर्ण, अतिज्वर, अतिदाह, अतिपाक से युक्त, कुलथी के समान काले छालों से व्याप्त होता है ॥७॥ सिधयन्ति वातरुफपित्तकृता विसर्पाः सर्वात्मकः क्षतकृतश्च न सिद्धिमेति ।
१ विसर्प की उत्पत्ति में सात धातु कारण हैं, यथा— रक्तं लसीका त्वङ्मांसं दूष्यं दोषाः त्रयो मलाः । विसर्पाणां समुत्पत्ती विज्ञेयाः सप्त धातवः ॥ इसलिये चरक में कहा है— “स च सप्तविधो दोषैः विज्ञेयः सप्तधातुकः ॥” विसर्प के स्थान— (२) वहिःश्रितः श्रितश्चान्तस्तथा चोभयसंश्रिताः । विसर्पां बलमेषान्तु ज्ञेयं गुरु यथोत्तरम् ॥ (३) कविराज हाराणचन्द्र जी “कुर्वन्ति यं विस्तृतमुद्यतमाशु शोकम्” यह पाठ पढ़ते हैं। इसमें 'उन्नत' का अर्थ 'ऊँचा उठा' किया है।
अ० १०]
निदानस्थानम्
२५९
दैतानिलावपि च दक्षितपूर्वलिंगो
सर्वं च मर्मसु भवन्ति हि कृन्च्छसाध्या ॥८॥
इनमें साध्यासाध्य—वात, पित्त और कफजन्म विषर्प साध्य हैं, सन्निपातजन्म और क्षतजन्म विषर्प असाध्य हैं। गण्ड (छालों) युक्त वातजन्म विषर्प, अञ्जन की भाँति कीचड़ की तरह का पित्तजन्म विषर्प, तथा मर्मस्थानों में उत्पन्न विषर्पयोग कष्टसाध्य हैं ॥८॥
शोफं न पक्वमिति पक्वसुपेक्षते यो
यो वा व्रणं प्रचुरपूयसमाधुवृत्तः ।
अभ्यन्तरं प्रविशति प्रविदायं तस्य
स्थानानि पूर्वविहितानि ततः स पूयः ॥९॥
नाड़ी—अनुचित कर्म करनेवाला वैद्य पके हुए शोथ को अपक्षय (कच्चा) समझकर अथवा अतिपूययुक्त व्रण की उपेक्षा करता है, उक्त पुरुष में यह पूय पूर्वोक्त त्वचादि व्रण-वस्तु को विदीर्ण करके अन्दर प्रविष्ट हो जाती है ॥९॥
वस्यातिमात्रगमनादूगतिरित्यतश्च
नाडीव यद्बहति तेन मता तु नाडी ।
इस पूय के अतिमात्रा में अन्दर की ओर जाने से इसको 'गति' कहते हैं, नाड़ी (प्रणालीसिरा) की भाँति इसमें पूय का बहन होता है, इसलिये इसको 'नाड़ी' कहते हैं।
दोषैस्त्रिभिर्भवति सा पृथगोकशश्च
संमूर्च्छितैरपि च शल्यनिमित्ततोऽन्या ॥१०॥
संख्या—तीनों दोषों से पृथग, पृथग, तीन (वात, पित्त, कफजन्म), सन्निपातजन्म एक, द्विदोषजन्म, वात पित्त, पित्त-कफ, कफ-वातजन्म, और शल्यजन्म, इस प्रकार से पाँच प्रकार के नाडीव्रण हैं।
वि० मन्तव्य—नाड़ी व्रण को "नासूर" कहते हैं इसका मुख छोटा होता है और भीतरी भाग चौड़ा या बड़ा होता है फलतः इसके भीतर प्रलेप (मलहम) पहुँच नहीं पाता या बची आदि से पूर्णरूप से पहुँचाया नहीं जा सकता अतः यह शीघ्र नष्ट भी नहीं होती यदि इसका मुख—शस्त्र द्वारा अथवा क्षार द्वारा बड़ा कर लिया जाता है तो व्रण के समान शोधन रोग से नष्ट हो जाती है ॥१०॥
तत्रानिलात् पशुसूक्ष्ममुखी सशूला
फेनानुविद्वमधिकं स्ववति क्षपायाम् ।
वातजन्म नाड़ी—कठोर, सूक्ष्ममुखयुक्त, वेदनायुक्त होती है एवं फेन से मिश्रित खाव बढ़ाती है। यह खाव रात्रि में (शीत के कारण शीतकाल में भी) अधिक होता है।
रुद्रतापतोदसदन्ववरभेदहेतुः
पीतं चवत्यधिकमुष्णमहःसु पिप्तात् ॥११॥
पित्तजन्म नाड़ी—में प्यास, संताप, बुमने की वेदना अंगरुलानि तथा ज्वर की पीड़ा होती है। पीले रङ्ग का उष्ण खाव बढ़ता है, यह खाव दिन में (उष्णता के कारण) अधिक बढ़ता है ॥११॥
ज्ञेया कफाद्रुहवनाजुनपिच्छिलाखा
रात्रिघ्नृतिः स्तिमितरुक्कठिना सकण्डुः ।
कफजन्म नाड़ी—में खाव मात्रा में बहुत, गाढ़ा श्वेत तथा चिकना होता है। खाव रात्रि में अधिक होता है। नाड़ी में मन्द वेदना, कठोरता और कण्डु होती है।
दोषद्वयामिहितलक्षणदर्शनेन
तिस्रो गतिव्यतिकरप्रभवास्तु विद्यात् ॥१२॥
द्विदोषजन्म—उपर्युक्त दोषों के लक्षणों को दन्दरूप में संसर्ग होने पर व्यतिकर—प्रभव (दन्दजन्म) तीन गतियाँ जानमान लेवे। यथा—वातपित्तजन्म, पित्त-कफजन्म और वातकफ-जन्म ॥१२॥
दाहज्वररसवसनमूर्च्छनवक्त्रगोषा
यस्यां भवन्त्यभिहितानि च लक्षणानि ।
तामादिशेत् पवनपित्तकफप्रकोपाद्-
घोरासमुक्षयकरोमिव कालरात्रिम् ॥१३॥
सन्निपातजन्म नाड़ी—जिस नाड़ी में दाह, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, मुख की शुष्कता, तथा पूर्वोक्त (लक्षण उत्पन्न खाव का काला क्षागयुक्त, पीला, श्वेत होना) हों, उसे पित्त-वायु-कफ-जन्म समझना चाहिये। यह नाड़ी कालरात्रि के समान भयानक एवं प्राणनाशक होती है ॥१३॥
नष्टं कथंचिदनुमार्गमुदीरितेषु
स्थानेषु शल्यमचिरेण गति करोति ।
सा फेनिलं मथितमच्छमसुग्विमिश्र-
मुष्णं स्वतं सहसा सरुजा च नित्यम् ॥१४॥
शल्यजन्म नाड़ी—उदीरित (पूर्वोक्तवर्णित त्वचादि) स्थानों में किसी प्रकार से (हठिमांग में न आने से अथवा सूक्ष्म होने के कारण) शल्य के नष्ट होने से वा अनुमार्ग (छोतोगांग१) में घुसने पर शल्य-शीघ्रता से नाडीव्रण उत्पन्न करते हैं। इसमें खाव—क्षागदार, मथित (बिना जल के मथित तक्र के समान), (मांस के नष्ट होने से) निर्मल, रक्तमिश्रित, उष्ण खाव बढ़ता है। इनमें अकस्मात् खाव बढ़ता है, नित्य दर्द रहती है ॥१४॥
यावत्यो गतयो यैश्च कारणैः संभवन्ति हि ।
तावनतः स्तनरोगाः स्युः श्लोणां तैरेव हेतुभिः ॥१५॥
स्तन्य निदान—जितने प्रमाण की गतियाँ हैं, ओर जिन वात, पित्त, कफ, सन्निपात, अभिघातजन्म कारणों से उत्पन्न
१ कविराज हाराणचन्द्र—'अणुमात्रमुदीरितेषु'—यह पाठ पढ़ते हैं।
२६०
सुश्रुतसंहिता
[ अं १० ]
होती हैं, उतने ही प्रकार की और उन्हीं कारणों से स्त्रियों में स्तन रोग उत्पन्न होते हैं ॥१५॥
धमन्यः संवृतह्वाराः कन्यानां स्तनसंश्रिताः । दोषाविसर्गात्तासां न भवन्ति स्तनामयाः ॥१६॥
कन्या (अप्राप्त गर्भवती स्त्रियों) के स्तनों में आश्रित धमनियों संवृतह्वार (अवरुद्ध मार्ग) होती हैं। इसलिये वातादि दोषों के रुके रहने से इनमें स्तनरोग नहीं होते हैं ॥१६॥
तासांमेव प्रजातानां गर्भिणीनां च ताः पुनः । स्वभावादेव विवृता जायन्ते संभवन्त्यतः ॥१७॥
इन्हीं स्त्रियों के प्रसवकाल में तथा गर्भवती स्त्रियों में वे धमनियाँ स्वभाव से खुल जाती हैं। इसलिये इनमें स्तनरोग होते हैं ॥१७॥
रसप्रसादो मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः । कृत्स्नदेहात् स्तनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते ॥१८॥
पक्वाहार के कारण उत्पन्न रस का प्रसाद (उत्तम सार-तेज रूप) एवं मधुर भाग—सम्पूर्ण शरीर से जब स्तनों में पहुँचता है, तब इसका नाम स्तन्य (दूध) हो जाता है ॥१८॥
विअस्तेष्वपि गात्रेषु यथा शुक्रं न दृश्यते ।
सर्वदेहाश्रितत्वाच्च शुक्लक्षणमुच्यते ॥१९॥
तदेव चेष्टयुवतेर्दर्शनात् स्मरणादपि ।
शङ्कसंश्रवणात् स्पृशोत् संहर्षोच्च प्रवर्तते ॥२०॥
सुप्रसन्नं मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते ।
आहाररसयोनिस्त्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः ॥२१॥
१ (१) आहारजन्य रस सम्पूर्ण शरीर में सिरा एवं रक्त-वाहिनियों द्वारा घूमता फिरता है। शरीरस्थ अवयव और ग्रन्थियाँ इस रस में से अपनी आवश्यक वस्तु अपनी शक्ति से उत्पन्न करती हैं। यथा—निकण्ठ कण्ठ ग्रन्थि (Thyroid gland) एकरस (Iodia Thyria) उत्पन्न करती है, और उपवृक्क (Supera-Renal) दूसरा रस (Adernalin) उत्पन्न करता है। इसी प्रकार से अण्डकोश भी दो रस उत्पन्न करते हैं। एक बाह्य रस—जिसको शुक्र कहते हैं। यह कामच्छे से उत्पन्न होता है। और दूसरा रस अन्तःसाव-ओज है। यह शरीर को बढ़ाता है। इसी प्रकार से स्तन्य ग्रन्थियाँ (anamary glands) भी रस में से दूध रूपा साव उत्पन्न करती हैं। इस रससाव के ऊपर भी काम-क्रोध का प्रभाव पड़ता है। जिससे कि दूध दूषित हो जाता है। इसलिये इन अवस्थाओं में दूध पिलाना उत्तम नहीं।
(२) कविराज रामचन्द्र सेन का कहना है कि स्तन-रोग सदा गर्भ में पुत्र होने पर ही उत्पन्न होता है, पुत्रों को अवस्था में नहीं। यह बात प्रायः सत्य प्रतीत हुई है। कुछ थोड़े ही अपवाद हैं।
तदेवापत्यसंपर्गार्हर्शनात् स्मरणादपि ।
ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत् संप्रवर्तते ॥२२॥
स्नेहौ निरन्तरस्तत्र प्रक्षवे हेतुरुच्यते ।
जिस प्रकार से गन्ने के रस में गुड़, दूध में घी व्याप्त होता है, उसी प्रकार से शुक्र एवं स्तन्य शरीर में व्याप्त है। इसलिये शरीर के सूक्ष्मरूप से काटने पर भी शुक्र दिखाई नहीं देता। सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने से शुक्र की भाँति दूध भी शुक्र के समान है; शरीर के काटने पर भी नहीं मिलता। यही शुक्र—इष्ट युवती के दर्शन से, युवती के स्मरण से, युवती के शब्द सुनने से, युवती के स्पर्श से, तथा मानसिक हर्ष—प्रसन्नता से उत्पन्न होता है। शुक्र के उत्पन्न होने में मन की प्रसन्नता ही मुख्य कारण है। जिस प्रकार से शुक्र आहार रस से उत्पन्न होता है, इसी प्रकार स्त्रियों में स्तन्य भी आहार रस से ही उत्पन्न होता है। यह स्तन्य भी पुत्र के स्पर्श से, पुत्र के दर्शन से, उसके स्मरण से, उसके पकड़ने से, शरीर में से शुक्र की भाँति बाहर निकलने (झरने) लगता है। इस दूध के झरने में मुख्य कारण निरन्तर स्नेह है ॥१९-२२॥
तत् कृषायां भवेद्वातात् क्षिप्तं च प्लवतेऽम्भसि ॥२३॥
पितादमूलं सकटुकं राज्योऽम्भसि च पीतिकाः ।
कफाद्भ्रान् पिच्छिलं च जले चाप्यवसीदति ।
सर्वदुष्टैः सर्वलिङ्गमभिघाताच्च दुष्क्यति ॥२४॥
यह स्तन्य वायु से दूषित होने पर—कषायरस एवं पानी में गेरने पर तैरता है। पित्त के कारण—अम्ल एवं ईषत्कटु रस, तथा पानी में डालने पर पीली-ठालू-नीली रेखायें दीखती हैं। कफ के कारण—घन (सान्द्र), पिच्छिल एवं जल में दूध झूब जाता है। सन्निगतजन्य तथा अभिघात (पतन-पीडनादि) से, दूध में सब दोषों के लक्षण उत्पन्न होते हैं।
वि० मन्तव्य—स्त्रीप्रायी बालकों की चिकित्सा करते समय—धात्री के दूध का निरीक्षण अवश्य कर लेना चाहिये क्योंकि बालक कोई अन्य वस्तु तो खाता नहीं है ॥२३, २४॥
यत् स्त्रीरमुदके क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम् ।
मधुरं चाविवर्णं च प्रसन्नं तद्विनिर्दिशेत् ॥२५॥
जो दूध पानी में डालने से पानी के साथ मिलकर एक सा हो जाता है तथा सफेद, स्वाद में मधुर, पीतादिवर्ण रहित है, उस दूध को प्रसन्न (प्रकृतिस्थ निर्दोष) समझना चाहिये ॥२५॥
सक्षोरो वाऽप्युदुग्धो वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः ।
रक्तं मांसं च सन्दूष्य स्तनरोगाय कल्प्यते ॥२६॥
सम्प्राप्ति—दूध युक्त अथवा बिना दूध की दूध उत्पन्न करने में समर्थ होने पर भी बालक के उपयुक्त समय तक दूध पी चुकने के पश्चात् स्त्री के स्तनों में कुपित दोष पहुँचकर, रक्त एवं मांस को दूषित करके स्तनरोगों को उत्पन्न करते हैं ॥
अ० ११ ]
निदानस्थानम्
२६१
पञ्चानामपि तेषां तु हित्वा शोणितविद्रधिम् ।
लक्षणानि समानानि बाह्यविद्रधिद्वयः ॥ २७ ॥
वातादिजन्य पाँचों स्तनरोगों के लक्षण, शोणितजन्य विद्रधि को छोड़कर—शेष बाह्य विद्रधि के लक्षणों के समान होते हैं ॥ २७ ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने विषर्पनाडीस्तनरोग-
निदानं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः
अथात ग्रन्थ्यपच्यवृद्गलगण्डानां निदानं व्याख्यास्यामः ।
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
शोध की सामान्यता से विषर्परोग के पीछे ग्रन्थि, अर्बुद, गलगण्ड अपनी निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ।
वि० मन्तव्य—ग्रन्थि को “मोगलीफोड़ा” कहते हैं ।
अपनी या गण्डमाला को “गलशरीर” और गलगण्ड को शिमला की तराई में गिल्लड़ और गोरखपुर आदि में बँचा कहते हैं । अर्बुद को “रसोली” कहते हैं ॥ १, २ ॥
वातादयो मांसससूक् च दुष्टाः
संदूष्य मेदश्च कफानुबिद्धम् ।
घुत्तोन्नतं विप्रश्रंत् तु शोफं
कुर्वन्त्यतो ग्रन्थिरिति प्रदिष्टः ॥ ३ ॥
वात, पित्त, कफ, दूषित होकर मांस एवं रक्त तथा कफ संयुक्त मेद को दूषित करके, गोलाकार, उठी हुई, गाँठ के समान, कठोरता युक्त शोथ उत्पन्न करते हैं । इसलिये इसको ग्रन्थि कहते हैं ॥ ३ ॥
आयम्यते व्यध्यत एति तोदं
प्रत्यस्यते कृत्यत एति मेदम् ।
कृष्णोऽभृदुर्वस्तिरिवाततश्च
भिन्नः श्वचेच्छानिलजोऽस्मच्छम् ॥ ४ ॥
वातजन्य ग्रन्थि में—वायु के आकर्षण के कारण लम्बी सी की जाने के सहस्र, आरे से काटने के समान, सुई चुभने के समान, खींच कर ढेला आदि लगने के समान, कुठार से काटने के समान तथा परशु से फाड़ने के समान वेदना होती है ।
१ भोज ने भो कहा है—
“वायुर्मोदो यदा मांसं सक्षिपेदथवा स्वचि ।
तत्र मेदोऽमवा ग्रन्थिः स्यादो भवति कण्डुलः ॥”
पाँचवीं—शिराजन्यग्रन्थि ( Toumar ) है ।
ग्रन्थि कृष्णवर्ण, कठोर तथा मूत्राशय के समान तनी होती है । इसके फटने पर स्वच्छ रक्त बहता है ॥ ४ ॥
दन्दद्वये धूप्यति चूयते च
पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।
रक्तः सपीतोऽप्यथवाऽपि पिप्ताद्-
भिन्नः श्ववेदुष्णमतीव चास्मम् ॥ ५ ॥
पित्तजन्य ग्रन्थि में—अतिशय दाहयुक्त प्रतीत होती है, अतिशय सन्ताप युक्त अथवा गरम प्रतीत होती है, चुभने के समान वेदना युक्त होती है, अतिशय पकती है, तथा जलती सी प्रतीत होती है, ग्रन्थि का वर्ण लाल या पीला होता है । इसके फूटने पर अति उष्ण रक्त बहता है ॥ ५ ॥
शीतोऽविषणोऽस्पर्शजोऽतिकण्डुः
पाषाणवत् संहननोपपन्नः ।
चिराभिबृद्धिश्च कफप्रकोपाद्-
भिन्नः श्वचेच्छुकलघनं च पूयम् ॥ ६ ॥
कफजन्य ग्रन्थि—
शीत, कुछ मलिन रङ्गवाली, अल्प वेदनावाली, अधिक कण्डुवाली, पत्थर की तरह कठिन होती है । शनैः २ बढ़ती है, इसके फूटने पर श्वेत गाढ़ा पूय बहता है ॥ ६ ॥
शरीरवृद्धिक्षयवृद्धिहानिः
स्निग्धो महानस्पर्शजोऽतिकण्डुः ।
मेदःकृतो गच्छति चावभिन्ने
पिण्याकसर्पिः प्रतिमं तु मेदः ॥ ७ ॥
मेदोग्रन्थि—
शरीर की वृद्धि से बढ़ती है और शरीर क्षय से घटती है, चिकनी, आकार में महान्, मन्द वेदना युक्त अधिक कण्डुवाली होती है । इसके फूटने पर पिण्याक ( तिलककलखल ) और घी के समान मेद बाहर आती है ॥ ७ ॥
व्यायामजातैरबलस्य तैस्तै-
राक्षिण्य वायुर्हि सिराप्रतानम् ।
संपीड्य सङ्कोच्य विशोष्य चापि
ग्रन्थि करोत्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥ ८ ॥
ग्रन्थिः सिराजः स तु कृच्छ्रसाधयो
भवेद्यादि स्यात् सरुजश्चलश्च ।
अरुक् स एवाप्यचलो महाश्च
समंस्थितश्चापि विवर्जनीयः ॥ ९ ॥
शिराजन्यग्रन्थि—
निर्बल पुरुष के अतिशय व्यायाम करने पर तथा अन्य वायुवर्धक कारणों से वायु, कुपित होकर शिराजालों को पीड़न करके, संकुचित करके अथवा शुष्क करके गोल, उन्नत ( उठी हुई ) ग्रन्थि को शीघ्र उत्पन्न करती है । यदि शिराजन्य ग्रन्थि
१ अपववावस्था में ही स्वच्छ ( पूय रहित ) रक्त निकलता है । पककर फूटने पर पूय-मिश्रित रक्त जाता है ।
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ११ ]
वेदना युक्त और चल ( गतिशील ) हो तो कृच्छ्रसाध्य है । और यदि अचल ( निश्चल ), महान् और वेदना रहित हो, अथवा मर्मस्थानों में उत्पन्न हुई हो तो असाध्य समझनी चाहिये ॥ ८६ ॥
हन्वस्थिकक्षाक्षकबाहुसन्धि- मन्यागलेपूपचितं तु मेदः ।
प्रन्थिं स्थिरं वृत्तमाथायतं वा स्तिग्धं कफरूचात्परुजं करोति ॥ १० ॥
तं प्रन्थिभित्स्वामलकस्थिमात्रै- मर्त्त्याण्डजालप्रतिमैस्तथाऽन्यैः ।
अतन्यवर्णैरुपचीयमानं चयप्रकर्षादपचीं वदन्ति ॥ ११ ॥
कण्डुयुतास्तेऽल्परुजः प्रभिनन्ताः स्त्रवन्ति नश्यन्ति भवन्ति चान्ये ।
मेदःकफाभ्यां खलु रोग एष सुदुस्तरो वर्षगणानुवन्धी ॥ १२ ॥
अपची रोगकी सम्पादित—हन्वस्थि सन्धि, कक्षा (बाहुमूल) सन्धि, अक्षक (Geavical Bones) सन्धि, बाहुसन्धि ( वंक्षणसन्धि भी ), मन्या ( शीवा के पार्श्व भाग में स्थित दो धमनियाँ ), और गले में सन्चित मेद और कफ प्रन्थि को उत्पन्न करते हैं । यह प्रन्थि स्थिर, गोल अथवा आयताकार ( लम्बी ) स्तिग्ध, और मन्द वेदनायुक्त होती है । कोई प्रन्थि आँवले के फल के समान होती है और अन्य ( कोई ) मछलियों के अण्डों के जाल के समान ( गुच्छाकार एवं छोटी ) होती हैं । निरन्तर चढ़ती जाने पर भी इनका रङ्ग स्वत्र के समान रहता है । चय ( उपचय-संचय ) की अधिकता से इनको 'अपची' कहते हैं । इन प्रन्थियों में कण्डु होती है, मन्द वेदना रहती है । फूटने पर बहती हैं और नष्ट हो जाती हैं । दूसरी नई प्रन्थियाँ निकल आती हैं । यह रोग मेद और कफ के कारण से उत्पन्न होता है । बहुत वर्षों का पुराना होने पर यह रोग कष्टसाध्य है । ( चक्रपाणि ने चरक की टीका में प्रन्थिविसर्प को 'अपची' कई कहते हैं—ऐसा लिखा है ) चरक ॥ १०-१२ ॥
१ इस रोग में वायु-पित्त का भी थोड़ा योग रहता है जैसा कि भोज ने कहा है—
“वातपित्तकफा वृद्धा मेदश्चापि समाचितम् । जघयोः कण्डराः प्राप्य मत्स्याण्डसदृशान् बहून् ॥ कुर्वन्ति प्रत्ययस्तेभ्यः पुनः प्रकृतिोऽनिलः । त्रिदोषाद्बुध्द्वर्गो वक्षः कक्षामन्या गलाश्रितः ॥ नानाप्रकारान् कुशले प्रन्थीन् सा त्वपची स्मृता । व्याभिश्चरोपजातस्य कृच्छ्रसाध्या प्रकीर्तिता ॥ तासां वातोत्तरा रूक्षा वातवेदनयान्विता । क्षिप्रपाकसमुत्थाना दाहयुक्ता तु पैत्तिकी । गूढा तु वातकठिना कफास्तिग्धाल्पखकरा ॥”
गात्रप्रदेशे क्वचिदेव दोषाः संमन्त्रिता मांसमभिप्रदूष्य । वत्सं स्थिरं मन्दरुजं महान्त- मनल्पमलं चिरवृद्धयपाकम् ॥ १३ ॥
कुर्वन्ति मांसोपचयं तु शोफं तमवृदं शाख्विदो वदन्ति ।
अर्बुद—सम्पूच्छित ( कृषित हुए ) वातादि दोष शरीर के किसी भी भाग में मांस और रक्त को दूषित करके गोल, स्थिर, मन्द वेदना युक्त, महान् एवं विस्तृत मूलवाली, ढेर में बढ़नेवाली, पाक रहित ( न पकनेवाली ), मांसोच्छ्रय ( मांससंघात युक्त ) तथा अगाध ( गम्भीर ) शोफ उत्पन्न करते हैं । शाख्विदु इसको 'अर्बुद' कहते हैं ॥ १३ ॥
वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तं मांसं च मेदसा च ॥ १४ ॥ तज्जायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थैः समाजानि सदा भवन्ति ।
वायु, पित्त, कफ, रक्त, मांस एवं मेद के कारण छे प्रकार का अर्बुद होता है । इस अर्बुद के लक्षण प्रन्थि के समान होते हैं ॥ १४ ॥
दोषः प्रदुष्टो रुधिरं सिरास्तु संपीड्य सङ्कोच्य गतस्त्वपाकम् ॥ १५ ॥ साक्षावमुन्नतानि मांसपिण्डं मांसाङ्कुरैराचितमाशुवृद्धिम् ।
स्त्रवत्यजस्त्रं रुधिरं प्रदुष्ट- मसाध्यमेतदुधिरात्मकं स्यात् ॥ १६ ॥ रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वात् पाण्डुभवेत् सोऽर्बुदपीडितस्तु ।
अर्बुद के लक्षण—दूषित वातादि दोष एवं रक्त शिराओं को पीड़ित एवं संकुचित करके, पकने पर रक्त की मात्रा बढ़ने से एवं स्वत्र के न फूटने के कारण मांसपिण्ड को ऊपर की ओर उभार देते हैं । यह शोथ ( उभार ) मांसाङ्कुरों से व्याप्त होता है और शीघ्र बढ़ता है । इससे निरन्तर दूषित रक्त बहता रहता है । यह रक्तजन्य अर्बुद असाध्य है । रक्त के क्षय के कारण उपद्रवों से ( मूर्च्छा आदि रक्तपित्तजन्य उपद्रवों से ) पीड़ित तथा अर्बुद रोगी जो पाण्डु वर्ण हो जाये, वह भी असाध्य है ॥ १५, १६ ॥
सुष्टिप्रहारादिभिरिदितेऽङ्के मांसं प्रदुष्टं प्रकरोति शोफम् ॥ १७ ॥ अवेदनं स्तिग्धमनन्यवर्ण- मपाकमश्मोपममप्रचाल्यम् । प्रदुष्टमांसस्य नरस्य बाढ- मेतद्भवेन्मांसपरायणस्य ॥ १८ ॥ मांसार्बुदं त्वेतदसाध्यमुक्तं
अ० ११]
निदानस्थानम्
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मांसजन्य अर्बुद—मुष्टिप्रहार आदि ( मुक्का की चोट आदि ) के कारण अङ्गों में चोट लगने से मांस दूषित होकर शोफ उत्पन्न करता है । यह शोफ वेदना रहित, स्निग्ध, स्वचा के समान वर्ण, पाक रहित, पत्थर के समान कठोर एवं निरुचल ( न हिलनेवाला ) होता है । मांसपरायण ( अतिशय-मांसपक्षी ) पुरुष के मांस के अति दूषित होने से यह अर्बुद ( सिक्क, कक्षा, जंघा आदि मांसबहुल स्थानों में ) विशेषकर होता है । यह मांसार्बुद असाध्य है ॥१७,१८॥
साध्येष्वपीमानि विचजयेत् ।
संप्रसृतं मर्मणि यच्च जातं
क्षोतः सु वा यच्च भवेदचात्यम् ॥१९॥
यद्यजायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते
क्षेत्रं तदध्यर्बुदमर्बुदक्षैः ।
यद्ब्रह्मजातं युगपत् क्रमाद्वा
द्विरर्बुदं तच्च भवेदसाध्यम् ॥२०॥
साध्य अर्बुदों में भी निम्नलिखित अर्बुदों को विकिसा कर्म में छोड़ देना चाहिये । यथा—जिन अर्बुदों में से रक्त का स्त्राव होता हो, जो अर्बुद मर्म या क्षोतसु स्थानों में उत्पन्न हुआ हो, जो अचल हो, प्रथम अर्बुद के होने पर जो अर्बुद फिर-दूसरा उत्पन्न होता है उसको 'अध्यर्बुद' जानना चाहिये । जो अर्बुद एक साथ ब्रह्म ( जोड़िया ) रूपमें अथवा क्रम से ( एक के पीछे दूसरा ) उत्पन्न होते हैं, उनको द्विरर्बुद कहते हैं—ये द्विरर्बुद ( एवं द्विदोषजन्य भी ) तथा अध्यर्बुद असाध्य हैं ॥
न पाकमायान्ति कफाधिकत्वान-
मेदोऽब्रह्मत्वाच्च विशेषतस्तु ।
दोषस्थिरत्वादग्र्यनाच्च तेषां
सर्वार्बुदान्येव निसर्गतस्तु ॥२१॥
न पकने का कारण—अर्बुदों में कफ और मेद की अधिकता विशेष रूप में रहती है, इसलिये, यथा वातादि दोषों के स्थिर ( मांसोन्नति के कारण चिरकाल तक रहने से कठोर ) होने से एवं वातादि दोषों के ग्रन्थि रूप में ( निश्चल ) बन जाने से, सब प्रकार के अर्बुद स्वभाव से ही नहीं पकते हैं ।
नि० मन्तन्य—सब अर्बुद पकते नहीं परन्तु रुधिरात्मक अर्बुद में से स्त्राव अवश्य निकलता है ॥२१॥
वातः कफश्चैव गले प्रवृद्धौ
मन्ये तु संसृत्य तथैव मेदः ।
कुर्वन्ति गण्डं क्रमशः स्वलिगैः
समन्वितं तं गलगण्डमाहुः ॥२२॥
गलगण्डसम्प्राप्ति—अतिशय रूप में प्रवृद्ध वायु और कफ तथा मेद-मन्या ( ग्रीवा के पार्श्व भाग की धमनियों ) का आश्रय करके वातकफ के ( अपने अपने ) लक्षणों से युक्त, क्रमशः ( शनैः-
वृद्धिशील ) गण्डरोग को उत्पन्न करते हैं, इसको गलगण्ड कहते हैं । ( पिच्छजन्य गलगण्ड नहीं होता ) ।
गलगण्ड प्रायः—पर्वतीय प्रदेशों तथा तराईयों में होता है जहाँ कूप नहीं होते केवल कुल्याओं का जल पीना पड़ता है । इससे रोगी प्रायः आलसी एवं जड़ होते हैं ॥२२॥
तोदान्वितः कृष्णसिरावनन्दः
कृष्णोऽरुणो वा पवनात्मकस्तु ।
मेदोन्वितश्चोपचितश्च कालाद्-
भवेदतिस्निग्धतरोऽरुजश्च ॥२३॥
वातजन्य गलगण्ड—तोदान्वित ( सूई चुभने की वेदना युक्त), कृष्ण-शिराओं से व्याप्त, कृष्ण अथवा लालवर्ण होता है । यदि कालवश से संचित मेद के साथ संयुक्त हो जाता है तो अतिशय स्निग्ध एवं अरुज ( वेदना रहित ) होता है ॥२३॥
पारुष्ययुक्तश्चिरवृद्धयपाको
यदृच्छया पाकमियात् कदाचित् ।
वैरस्यमास्यस्य च तस्य जनतो-
भवेत्तथा तालुगलप्रशोषः ॥२४॥
यह अर्बुद कठोरता युक्त, देर में वर्धनशील, देर में पकनेवाला, मास्यवश कभी पकता है । रोगी के मुख का स्वाद बदल जाता है, तालु और गला सूख जाता है ॥२४॥
स्थिरः सर्वाणोऽल्परुग्मकण्डूः
शोतो महांश्चापि कफात्मकस्तु ।
चिराभिर्वृद्धिं कुरुते चिराच्च
प्रपच्यते मन्दरुजः कदाचित् ॥२५॥
माधुर्यमास्यस्य च तस्य जनतो-
भवेत्तथा तालुगलप्रलेपः ।
कफजन्य गलगण्ड—स्थिर, स्वचा के समान वर्ण, मन्द वेदनाशील, कण्डूबहुल, शीतल, एवं महान् होता है । बहुत देर में बढ़ता है और कभी मास्य से बहुत देर में पकता है तब थोड़ी वेदना होती है । रोगी का मुख मीठा रहता है, तालु और गला कफ से भरा रहता है ॥२५॥
स्निग्धो मृदुः पाण्डुरनिष्ठगन्धो
मेदः कृतो नौरुगथातिकण्डूः ॥२६॥
प्रलम्बतेऽलावुवदल्पमूत्रो
देहानुरूपक्षयवृद्धियुक्तः ।
स्निग्धास्यता तस्य भवेच्च जनतो-
गर्लेऽनुगच्छं कुरुते च नित्यम् ॥२७॥
मेदजन्य गलगण्ड—स्निग्ध, मृदु ( कोमल), पाण्डुवर्ण, अनिष्ठ गन्ध ( दुर्गन्ध ) युक्त, वेदना रहित, कण्डूबहुल होता है । अलावु ( घिया कदरू ) के समान नीचे लटकता है, मूल-अर्ण ( छोटा ) होता है, शरीर की वृद्धि से बढ़ता है और शरीर के