भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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निदानस्थानम्

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दाहस्तृष्णा च सर्वेषु जठरेषु भवन्ति हि ॥२४॥

सामान्य लक्षण—

आध्यान (अफारा), चलने में अशक्ति, दुर्बलता, अग्नि-मांघ, शोक (सूजन), अंगों में ग्लानि, वात-मल का अवरोध, दाह, वृष्णा—ये लक्षण सब उदररोगों में सामान्य हैं ॥२४॥

अन्ते सलिलभावं हि भजन्ते जठराणि तु।

सर्वाण्येव परीपाकात्तदा तानि विवर्जयेत् ॥२५॥

साध्यासाध्य—

सब उदररोगों के अन्त में उदर के अन्दर पानी उत्पन्न हो जाता है। इसलिये काल के परिणाम से सब उदररोग इस अवस्था में आकर असाध्य हो जाते हैं ॥२५॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने उदरनिदानं नाम सप्तमोऽध्यायः ॥७॥

अष्टमोऽध्यायः

अथातो मूढगर्भनिदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

उत्तेष की सामान्यता से उदररोगों के उपरान्त मूढगर्भ निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

प्राग्यधर्मयानवाहनाध्वगमनप्रस्खलनप्रपतनप्रपीडन-धावनाभिघातविषमशयनासनोपवासवेगाभिघातातिरुक्ष-कटुतिकभोजनशोकातिशिरसेवनातिसारवमनविरेचनप्रे-ह्लोहनाजीर्णगर्भशातनप्रभृतिभिर्विशेषैर्वन्धनामुच्यते गर्भः, फलमिव वृन्तवन्धनादभिघातविशेषैः, स विमुक्तवन्धनो गमांशयमतिक्रम्य यकृतस्त्रीहान्नत्रिविरैरवसंसमानः कोष्ठ-संक्षोभमापादयति, तस्या जठरसंक्षोभाद्वायुरपानो मूढः पार्श्वस्तिशीर्षोदरयोनिशुल्कानाम्मूत्रसङ्घातान्मन्यतममापाद्य गर्भं च्यावयति तरुणं शोषितस्त्रावेणः तमेव कदाचिद्विद्वद्भसमस्यागातमपत्यपथसमुप्रागमनिरस्यमानं विगुणा-पानसंमोहितं गर्भं मूढगर्भमित्याचक्ष्यते ॥३॥

मेथुन, रथादि, वाहन (अश्वादि), अध्वगमन (रास्ते की-सुधाफिरी), प्रस्खलन (अकस्मात् पांव का फिसलना), प्रपतन (गिरना) प्रपीडन (दबना), धावन (भागना), अभिघात (चोट लगना), विषम शयन (ऊँची-नीची जगह सोना), विष-मासन (ऊँची-नीची जगह बैठना), उपवास, मल-मूत्रादि के उपस्थित वेगों को रोकने से, अतिरुक्ष कटु-तिक भोजन से,

१ मूढगर्भ का लक्षण—

सर्वावयवसम्पुणो मनोवदुधादिसंयुतः । विगुणापानसंमूढो मूढगर्भोऽभिधीयते ॥

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शोक से, अतिशार के सेवन से, अतिसार-वमन-विरेचन से, प्रेखोलन (भूला भूलने से), अजीर्ण से (गर्भपात कारक चित्र-कादि औषधियों के सेवन करने तथा अन्य) कारणों से गर्भ बन्धन (नाडीबन्धन) से छूट जाता है, जिस प्रकार कि प्रहारादि के कारण फल वृन्त (गुच्छ, टहनी) से पृथक् हो जाता है, (अकाल में गिर जाता है)।

यह गर्भ नाडीबन्धन से पृथक् होकर गर्भशय्या का उल्ले-घन करके यकृत, प्लीहोदर और अन्न के अन्तराल में से नीचे की ओर गिरता हुआ कोष्ठ (मल-मूत्राशय) में विक्षोभ उत्पन्न करता है। गर्भिणी स्त्री में उदर के विक्षोभ के कारण अपान वायु मूढ़ (क्रिया रहित) होकर पार्श्व-स्तिशीर्ष-उदर-योनि में शूल, आनाह (आध्यान), मूत्रसंग (निरोध)—इनमें से किसी एक रोग को उत्पन्न करके रक्तस्त्राव द्वारा तरुण (अजातसार-अव्यक्त चेतन रूप) गर्भ च्युत करती है। इसी जातसार गर्भ को जब यह निरन्तर बढ़कर असम्यग (विलोम भाग से) रूप से योनिमार्ग में पहुँच जाता है, और अपान वायु के विलोम होने से मच्छित होने के कारण-मार्ग से बाहर नहीं निकलता, तब इसको मूढ़ गर्भ कहते हैं ॥३॥

ततः कौलः प्रतिखुरो बीजकः परिघ इति। तत्र, ऊर्ध्व-बाहुशिरःपादो योनिमुखं निरुणद्धि कौल इव स कौलः; निःस्तुतहस्तपादशिराः कायसङ्घी प्रतिखुरः; यो निर्गच्छत्ये-कशिरोमुजः स बीजकः; यस्तु परिघ इव योनिमुखमावृत्य तिष्ठति स परिघः; इति चतुर्विधो भवतीत्येके भाषन्ते। तत्तु न सम्यक्; कस्मात् ? स यदा विगुणानिलप्रपीडितोऽपत्यपथमनेकधा प्रपद्यते तदा सङ्ख्या हीयते ॥४॥

यह मूढगर्भ चार प्रकार का है। यथा-कौल, प्रतिखुर, बीजक और परिघ। इनमें—जो गर्भ बाहुओं को ऊपर रखकर शिर एवं पांवों द्वारा योनिमुख को रोक लेता है, वह कौल (शंकु) की भाँति होने से 'कौल' है। जो गर्भ हाथ पांव और शिर बाहर निकालकर शरीर के मध्यभाग से योनिमार्ग को रोकता है, वह 'प्रतिखुर' है। जिस गर्भ की एक भुजा और शिर बाहर निकल जाता है, उसे 'बीजक' कहते हैं। और जो गर्भ परिघ (अर्गल) के समान (तिर्यगवस्था-Transvers Position)—योनिमुख को घेर के रहता है इसे 'परिघ' कहते हैं, इस प्रकार से मूढगर्भ चार प्रकार का है, ऐसा कई आचार्यों का सिद्धान्त है। यह बात ठीक नहीं है। क्योंकि—जिस समय विलोम अपान वायु से पीड़ित होकर अनेक रूप से योनिमार्ग में आता है, उस समय इस चार संख्या का अतिक्रमण कर जाता है। तत्र, कश्चिद् द्वाभ्यां सकिथभ्यां योनिमुखं प्रतिपद्यते, कश्चिद्वासुनैकसकिथरैकेन, कश्चिद्वासुनसकिथशरीरः स्फि-ग्देशेन तिर्यगागतः, कश्चिदुरःपार्श्वपूठानामन्यतमेन योनि-