सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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मुश्रुतसंहिता
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द्वारं पिधायावतिष्ठते, अन्तःपार्श्वेष्वुत्तशिराः कश्चिद्वेकेन बाहुना, कश्चिदाभुग्नशिरा बाहुद्वयेन, कश्चिदाभुग्नमध्यो हस्तपादशिरोभिः कश्चिद्वेकेन सवन्धना योनिमुखं प्रतिपद्यतेऽपरेण पायुम्, इत्यष्टविधा मृदुगर्भगतिरुद्दिष्टा समासेन ॥
यथा—कोई गर्भ दोनों टांगों से योनिमुख में आता है, कोई गर्भ एक टांग को संकुचित करके एक टांग से योनिमार्ग में उतरता है, कोई गर्भ टांग और शरीर को संकुचित करके—स्फिग (नितम्ब) भाग से तिरछे रूप में योनिमुख में पहुँचता है। कोई गर्भ उग्र, पीठ पार्श्व—इनमें से किसी एक अवयव से योनिद्वार को रोक कर रहता है। कोई गर्भ शिर को अन्दर की ओर झुकाकर निचुक को छाती पर रखकर—एक बाहु द्वारा योनिमुख में आता है। कोई गर्भ शिर को संकुचित करके दोनों बाहुओं से, कोई शरीर के मध्यभाग को झुकाकर हाथ-पांव और शिर से, कोई गर्भ एक ही टांग से और कोई गर्भ गुदा द्वारा योनिमार्ग में आता है। इस प्रकार से संक्षेप में आठ प्रकार की मृदुगर्भ की गतियाँ कह दी हैं ॥५॥
तत्र द्वावन्त्यावसाध्यौ मृदुगर्भौ, शेषानपि विपरीतेन्द्रियार्थात्क्षेपकयोनिभ्रंशसंवर्णमकल्लश्ववासकासभ्रमनिपीडितान् परिहरेत् ॥६॥
इनमें सातवें या आठवें प्रकार का मृदुगर्भ स्वभाव से ही असाध्य है। शेष मृदुगर्भों में निम्न लक्षण होने पर इनको भी असाध्य समझना चाहिये। यथा—जिस समय स्त्री रुपादि इन्द्रिय-विषयों को ठीक प्रकार से ग्रहण न कर सके, आक्षेपक (Convulsions) हो, योनिभ्रंश (योनि का बाहर आना), योनिसंवर्ण (योनि का संकोच), मक्कल्ल (प्रसूता स्त्री में वायु रक्त को रोककर बस्ति, शिर में शूल उत्पन्न करती है), श्वास, कास, भ्रम (चक्कर)—ये लक्षण हों तो असाध्य समझना चाहिये ॥ भवन्ति चात्र—
कालस्य परिणामेन मुक्तं वृन्ताद्यथा फलम् ।
प्रपद्यते स्वभावेन नान्यथा पतितुं भ्रुवम् ॥७॥
एवं कालप्रकर्षेण मुक्तो नाडीनिबन्धनात् ।
गर्भाशयस्थो यो गर्भो जननाय प्रपद्यते ॥८॥
कहा भी है—
जिस प्रकार से कालजन्य परिपाक के कारण वृन्त (टहनी) से मुक्त हुआ फल स्वभाव से ही गिरने लगता है, अन्यथा रूप में स्वयं नहीं गिरता, उसी प्रकार काल-स्वभाव से गर्भाशय में स्थिर गर्भ नाडीबन्धन से पृथक् होकर जन्म ग्रहण करता है ॥
कृमिवाताभिघातैस्तु तदेवोपद्रुतं फलम् ।
पतत्यकालेऽपि यथा तथा स्याद् गर्भविच्युतिः ॥९॥
जिस प्रकार से कृमि, वायु अथवा चोट के कारण से यही
फल (बिना समय) में गिर पड़ता है, उसी प्रकार से यह गर्भ भी असमय में गिरता है ॥९॥
आचतुर्थात्ततो मासात् प्रस्रवैत् गर्भविच्युतिः ।
ततः स्थिरजारीरस्य पातः पञ्चमपठयोः ॥१०॥
यदि चार मास तक के गर्भ का भ्रंश हो तो इसको गर्भ-स्त्राव (Abortion) कहते हैं, (चार मास तक मृदुगर्भ नहीं है)। चार मास के पीछे शरीर के स्थिर होने पर 'गर्भपात' कहा जाता है (Mis carriage)। इनके आगे सातवें मास में पूर्व प्रसव (Pri-Birth) कहते हैं ॥१०॥
प्रविध्यति शिरो या तु शीताङ्गी निरपत्रपा ।
नीलोद्गतसिरा हन्ति सा गर्भं स च तां तथा ॥११॥
जो स्त्री अंगों को झुकाकर शिर को अतिशय हिलाती-डुलाती है, जिस स्त्री की लज्जा सर्वथा चली गई, जिस स्त्री की शिराएँ ऊपर को उठ गईं एवं काली पड़ गईं हैं, वह स्त्री गर्भ को और वह गर्भ उस गर्भवती स्त्री को नष्ट कर देता है ॥११॥
गर्भास्पन्दनमावीनां प्रणाशः श्यावपाण्डुता ।
भवत्युन्मूलासपूतित्वं शूलं चान्तमुते शिशो ॥१२॥
शिशु के गर्भाशय में मर जाने पर, गर्भ का स्पन्दन (हिलना-डुलना) बन्द हो जाता है, आदि (प्रसववेदनायें) नष्ट हो जाती हैं, शरीर का रंग काला-पीला पड़ जाता है, निःश्वास में दुर्गन्ध आती है ॥१२॥
मानसागन्तुभिर्मातुरूपतापैः प्रपीडितः ।
गर्भो व्यापद्यते कुक्षौ व्याधिभिश्च प्रपीडितः ॥१३॥
माता के मानसिक (शोकादि) एवं आगन्तुज (चोट आदि) दुःखों द्वारा पीड़ित होने से तथा रोगों के कारण पीड़ित गर्भ कुक्षि (गर्भाशय) में मर जाता है ॥१३॥
बस्तमारविपन्नायाः कुक्षिः प्रस्पन्दते यदि ।
तत्क्षणं जन्मकाले तं पाटयित्वोद्भवेद् भिषक् ॥१४॥
बस्तमार (गला घोटकर शीघ्र-बिना कष्ट से मारी हुई बकरी के समान-शीघ्र मृत) की भांति मृत स्त्री के उदर में यदि गर्भ जीवित हो (चंछा करता हो) तो —
१ अन्य लक्षण—
'सोऽन्तर्भूतो गर्भो शूनो बस्तिरिवाततः ।
उत्क्षिप्यन्त इवांगति मूत्रबस्तिरश्च भिद्यते ॥
क्लोमप्लीहा यकृच्छ्रैव फुफ्फुसं हृदयं तथा ।
गर्भेण पीडितं पितादुर्ध्वं प्रकामति स्थिरः ॥
सा शूयते मुह्यति च कृच्छ्रश्वासा च जायते ।
पूतिगन्धस्तथा स्वदो जिह्वा तालु च शूज्यति ॥
वेपते भ्रास्यति तथा जीवितं चोपरुध्यते ।
एतैर्लिङ्गैर्विजानीयात् मृतं गर्भचिकित्सकः ॥