सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 303, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० ६ ]
निदानस्थानम्
२५५
तक्षण जन्मसमय में उदर को चीर कर गर्भ को निकाल लेना लेना चाहिये। अन्यथा शिशु भी मर जायगा।
श्री हारणचन्द्र जो ने तो यह अर्थ किया है, कि जब अव्ययमार्ग तंग हो तब प्रसव के समय उदरमार्ग को चीरकर बच्चा बाहर निकाल लेना चाहिये। श्री घ्राणकर जी का कहना है कि बालक के जन्म के समय जब माता की विपन्नवस्था हो, तब उदर को चीरकर बालकको बाहर कर लेना चाहिये। १४।
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने मृदुगर्भनिदानं नामष्टमोऽध्यायः ॥ ८ ॥
नवमोऽध्यायः
अथातो विद्वधीनां निदानं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥
शस्त्रचिकित्सा के साधर्म्य से मृदुगर्भ निदान के अनन्तर विद्वधि के निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था।
वि० मन्तव्य—विद्वधि वह फोड़ा है जिसका मूल अस्थि में होता है। परन्तु बाह्यविद्वधि का ही मूल अस्थि में होता है, अन्तर्विद्वधि का नहीं। १. २ ॥
सर्वामरगुरुः श्रीमान्निमित्तान्तरभूमिपः।
शिष्यायोवाच निखिलमिदं विद्वधिलक्षणम् ॥ ३ ॥
देवताओं के गुरु कारणवश पृथिवी पर राजा के रूप में अवतीर्ण हुए भगवान् धन्वन्तरि ने अगे कहे जानेवाले इन विद्वधि लक्षणों को समस्त रूप में शिष्य के लिये कहा है। ३॥
त्वप्रकृतांसमेदासि प्रदूष्यास्थिसमाश्रिताः।
दोषाः शोफं शनैघौरं जनयन्त्युच्छिन्ना भृशम् ॥ ४ ॥
(२) चरक में—
“अन्तःकुक्षे गर्भो घ्नियते, तस्याः स्तिमितं स्तम्भमुदरमाततं शीतमरमान्तर्गतमिव भवति अस्पन्दनो गर्भः, शूलमधिकमुपजायते, न चाव्यः प्रादुर्भवति, योनिर्न प्रसवति, अच्चीणो चास्याः स्तस्ते भवतः, ताम्यति, व्यथते, भ्रमते, स्वसिति, अरतिबहुला च भवति। न चास्या वेगप्रादुर्भाव उपलभ्यते।”
१ वारभट्ट में निम्न प्रकार से यह श्लोक पढ़ा है—
“वस्तिद्वारे विपन्नायाः कुचिः प्रस्पन्दते यदि।
जन्मकाले ततः शीघ्रं पाटयिन्वोद्धरेद भिषक् ॥”
गर्भिणी के मरने पर वस्ति द्वार के पास में कुष्ठि अतिशय रूप में हिलती हो तो कुशल वैद्य को चाहिये कि कुष्ठि के प्रस्पन्दन के पीछे उदर को चीरकर शिशु को बाहर निकाल लेवे।
महामूलं रुजावन्तं वृत्तं चाप्यथवाऽऽयतम् तमाहुर्विद्वधि धीरा, विज्ञेयः स च पड्विषः ॥ ५ ॥ पृथग्दोषैः समस्तैश्च श्वेतोनाप्यमुजा तथा। पण्णासपि हि तेषां तु लक्षणं संप्रवदधते ॥ ६ ॥
सम्भासि—अतिशय कृपित वातादि दोष अस्थि का आश्रय करके स्वर्चा, रक्त, मांस एवं मेद को दूषित करके घोर शोथ को धीरे-धीरे उत्पन्न करते हैं। “विद्वहित इति विद्वधिः” “श्रीघ्रं विद्वहित्वात् विद्वधिरित्यभिधीयते।” चरक। जिस समय यह शोथ महान् मूलवाला, अतिशय। पीड़ायुक्त, गोठकार अथवा आयताकार होता है, उस समय बुद्धिमान् पुरुष इसको ‘विद्वधि’ कहते हैं। यह विद्वधि रोग छे प्रकार का है। यथा—पृथक् पृथक् दोषों ( वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य ) समस्त दोषों ( सन्निपातजन्य ) से, चोट लगने से और रक्तजन्य इन छे प्रकार की विद्वधि के लक्षणों को कहते हैं। ४-६॥
कृष्णोऽरुणो वा पुरुषो भृशमत्यर्थवेदनः।
चित्रोत्थानप्रपाकश्च विद्वधिर्वातसंभवः ॥ ७ ॥
वातजन्य विद्वधि—कृष्ण या अरुण ( लाल ) वर्ण, कठोर, अस्पन्दन वेदना युक्त, देर में उत्पन्न होती है, और देर में ही पकती है। श्रीघ्राणकरजी ने चित्रोत्थान के स्थान पर ‘चित्रोत्थान’ पाठ करके विविध प्रकार से उठनेवाली अर्थ किया है।
पक्वोदुम्बरसङ्काशः श्यावो वा ज्वरदाहवान्।
क्षिप्रोत्थानप्रपाकश्च विद्वधिः पित्तसंभवः ॥ ८ ॥
पित्तजन्य विद्वधि—
पके हुए गूजर के समान लाल या काली, ज्वर एवं दाह से युक्त, शीघ्र उत्पन्न होती है और शीघ्र ही पक जाती है। ८॥
शरावसहस्रः पाण्डुः शीतः स्तब्धोऽल्पवेदनः।
चित्रोत्थानप्रपाकश्च सकण्डूश्च कफोत्थितः ॥ ९ ॥
कफजन्य विद्वधि—
शराव के समान बड़ी, चककेदार, पाण्डुवर्ण, शीतल, स्तब्ध ( जड़ ) थोड़ी वेदना युक्त, देर में उत्पन्न होती है और देर में पकती है, एवं कण्डू होती है। ९ ॥
तनुपीतसिताश्चेषामात्मावाः क्रमशः स्मृताः।
इनमें पकने पर—वातजन्य विद्वधि का खाव—( पतला ) पित्तजन्य का पीला और कफजन्य का श्वेत खाव होता है।
नानावर्णरंजनात्मावो घाटालो विषमो महान् ॥ १० ॥
विषमं पच्यते चापि विद्वधिः सान्निपातकः।
सन्निपातजन्य विद्वधि—
नानावर्ण युक्त ( काली-पीली शुक्ल ), अनेकविध पीड़ा युक्त ( तोद-दाह-कण्डू युक्त ), नानाविध खाव युक्त ( तनु पीत-
१ चित्रो नानाविधा वायोः विषमकित्यत्वाद उदगमप्रपाका यस्य स तथा “मधुकोप”।