सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
प्लीहोदरं कीर्तयतो निबोध ।
विदाह्यभिष्यन्दिनरस्य जन्तोः
प्रदुष्टमत्यर्थमसूक्तं कफश्च ॥१४॥
प्लीहाभिषुद्धि सततं करोति
प्लीहोदरं तत् प्रवदन्ति तज्ज्ञाः ।
वामे च पार्श्वं परिबुद्धिमेति
विशेषतः सीदति चातुरोऽत्र ॥१५॥
मन्दस्वरामिः कफपित्तलिङ्गैः
रूपद्रुतः क्षीणबलोऽतिपाण्डुः ।
इसके आगे प्लीहोदर कहते हैं—उसे जानो—
विदाही एवं अभिष्यन्दि (दोष-धातु मल स्रोतों के क्लेद कारक) पदार्थों के निरन्तर सेवन करने से रक्त और कफ अतिशय रूप में कुपित होकर निरन्तर प्लीहा की वृद्धि को करते हैं, इसको विद्वान् प्लीहोदर कहते हैं। प्लीहा की वृद्धि वामपार्श्व में (पसलियों के नीचे) होती है, रोगी को विशेष रूप में अंग ग्लानि होती है। रागी को मन्द (थोड़ा २) ज्वर रहता है, अग्नि मन्द पड़ जाती है, कफ और पित्तजन्य उदरों के लक्षण रहते हैं। रोगी का वल बहुत घट जाता है, शरीर अत्यन्त पीला पड़ जाता है ॥१४, १५॥
सन्चेतरस्मिन् यकृति प्रदुष्टे
ज्ञयं यकृहात्युदरं तदेव ॥१६॥
तदेव (यही प्लीहोदर-दूषित कफ और रक्त) सन्चेतर (दक्षिण) पार्श्व में यकृत के दूषित होने पर 'यकृद् दाल्युदर' कहाता है। (इसका अन्तर्भाव प्लीहोदर में ही है) ॥१६॥
यस्यान्त्रमन्नेरुपलैपिभिर्वा
बालारमभिर्वा सहितैः पृथग्वा ।
संचीयते तत्र मलः सदोषः
क्रमेण नाङ्याभिवा संकरो हि ॥१७॥
निरुच्यते चास्य गुदे पुरोषं
निरांत कृच्छ्रादपि चाल्यमल्पम् ।
हृन्नाभिमध्ये पारबुद्धिर्मात
त (य) बोदरं विट्समगन्धिकं च ॥१८॥
प्रच्छ्रदयन् बद्धगुदो विभाग्यः,
जिस पुरुष की आँतों में—उपलैपि (पिच्छलकेषुकादि) अन्न के कारण से अथवा बाल या अश्म (पत्थर के कणों) से पृथक्-पृथक् अथवा समुदित रूप में, तीनों दोषों से सम्मिलित मल एकत्रित हो जाता है, जिस प्रकार कि नाड़ी (प्रणाली) में (झाड़ू से एकत्रित की गई) धूल का ढेर हो जाता है, उसी प्रकार से गुदा में मल संचित होता है। बड़ी कठिनाई से थोड़ा-थोड़ा मल बाहर आता है। उदर हृदय और नाभि के मध्य में बढ़ने लगता है। प्रच्छ्रदयन् (आँतों के आमाशय को दबाने से जो वमन आता है, वह) उदर मल के समान गन्धयुक्त होता है, इसको बद्धगुदोदर कहते हैं ॥१७, १८॥
ततः परिष्ठाण्युदरं निबोध ॥
शल्यं यदत्रोपहितं तदन्त्रं
भिनन्ति यस्यागतमन्यथा वा ॥१९॥
तस्मात् सूतोऽन्नात् सलिलप्रकाशः
स्त्रावः श्ववेद्वै गुदतस्तु भूयः ।
नाभेरधश्चोदरमेति वृद्धि
निस्तुद्यतेऽतीव विदह्यते च ॥२०॥
एतत् परिष्ठाण्युदरं प्रदिष्टं
इसके आगे परिष्ठावि उदर को कहते हैं—उसे जानो—
जिस पुरुष में अन्न से मिला शल्य (मत्स्यकण्टक आदि) अथवा अन्यथा (अनुचित तिर्ग रूप में आया तीर, वरछा लुरा आदि शल्य) रूप से आँतों में आकर शल्य आँतों को विदीर्ण कर देता है। इसलिये आँतों से पानी के समान निकला हुआ स्त्राव-गुदा से बार-बार बाहर आता है। उदर में नाभि के निचले स्थान में वृद्धि आरम्भ होती है, चुमने के समान अतिशय वेदना और विदाह होता है। इसको परिष्ठावि उदर कहते ॥१९, २०॥
दकोदरं कीर्तयतो निबोध ।
यः स्नेहपीतोऽप्यनुवासितो वा
वान्तो विरिक्तोऽप्यथवा निरुद्धः ॥२१॥
पिवेञ्जलं शीतलमाशु तस्य
स्रोतांसि दुष्प्यन्ति हि तद्वहानि ।
स्नेहोपलिप्येऽप्यथवाऽपि तेषु
दकोदरं पूर्ववद्भूम्यैति ॥२२॥
स्निग्धं महत् सपरिघुतनाभि
भुञ्जोन्नतं पूर्णमिवाम्बुना च ।
यथा दृतिः क्षुभ्यति कम्पते च
शब्दायते चापि दकोदरं तत् ॥२३॥
इसके आगे दकोदर को कहते हैं—वह जानो—
स्नेहपान करने पर, अनुवासन कर्म करने पर, वमन करके, विरेचन लेकर, अथवा निरुद्ध कर्म करके जो पुरुष एकदम शीतल जलपान करता है, उस पुरुष के जलवाही स्रोत सहजा दूषित हो जाते हैं। अथवा स्रोतों के स्नेहादि से लिप्त होने पर जब शीतल जल पीता है, तब पूर्व (परिष्ठावि) की भाँति-नाभि के निचले भाग में 'दकोदर' (जलोदर) बढ़ता है। इस रोग में उदर ऊपर से बहुत सा चिकना, नाभि-गोलाकार तथा बहुत ऊँची उठी होती है। जिस प्रकार से मधक पानी से भरी होने पर—जुभित होती है, कम्पन करती है, शब्द करती है, उसी प्रकार से उदर भी जुभित होता है, हिलता है, गति करता है, शब्द करता है, इसको दकोदर (Ascitis) कहते हैं ॥२१-२३॥
आधमानं गमनेऽशक्तिर्दौर्बल्यं दुर्बलामिता ।
शोफः सदन्मक्कानां सङ्को वातपुरीषयोः ।