भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 872 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 299

ॐ ७ ]

निदानस्थानम्

३५१

गुल्माकृतिन्यञ्चितलक्षणानि कुर्वन्ति चोराण्युदराणि दोषाः ।

कारण— दुर्बल जठराग्निवाला व्यक्ति जब अहिताशन (विरुद्ध-सम-अध्वान—विषमाशन) करता है, अथवा अतिशुष्क, दुर्गन्ध युक्त अन्न के खाने से, पुरुष के स्नेह-स्वेदन, वमन विरेचनादि कार्यों के अनुचित रूप में सेवन करने से, दोष कुपित होकर कोष्ठ (आमाशय, पिताशय और पक्षाशय) का आश्रय करके गुल्मरोग के समान आकार एवं चिह्न रूपी लक्षणों को उत्पन्न करके कष्टदायक उदररोग को उत्पन्न करते हैं ॥५॥

कोष्ठादुपन्नेहवदनन्तसारो निःसृत्य दुष्टोऽनिलवैगनून्तः ॥६॥

त्वचः समुन्तम्भ्य शनैः समन्ता-

द्विवर्धमानो जठरं करोति ।

सम्प्राप्ति—दूषित अनिल (प्राण-अपान वायु) के कारण प्रेरित अन्नसार (अन्नरस), कोष्ठ से उपस्नेह की भाँति (जिस प्रकार से नवीन घट में से तैल सूक्ष्म छिद्रों द्वारा बाहर आता है—उसी प्रकार से) बाहर निकलकर त्वचा को भली प्रकार से तानकर (आध्यान करके), चारों ओर से धीरे-धीरे बढ़ते हुए उदर रोग को उत्पन्न करता है ॥६॥

तत्पूर्वरूपं बलवर्णकाङ्क्षा-

बलीविनाशो जठरे हि राज्यः ॥७॥

जीर्णीपरिज्ञानविदाहवत्यो

बस्तौ रुजः पादगतश्च शोफः ।

उदररोग के पूर्वरूप—रोगी में बल और वर्ण की चाह रहती है (बल वर्ण घट जाता है), उदर की बलियाँ (हृदिर्या) नष्ट हो जाती हैं, उदर पर रेखायें (उदर में आध्यान होने से) उत्पन्न हो जाती हैं । भोजन के जीर्ण या अजीर्ण होने का शान नहीं होता; विदाह (जलन) होती है, बस्ति में दाहयुक्त वेदना और पाँवों में सूजन आ जाती है ॥७॥

संगृह्य पाश्चोदरपृष्ठनाभी-

यद्वर्धते कृष्णसिराबनद्धम् ॥८॥

सशूलमानाहवदुमशब्दं

सतोदभेदं पवनात्मकं तत् ।

वातोदर—जब वायु—कृष्णरक्तवाही शिराओं का आश्रय करके पाश्च उदर-पीठ और नाभि को घेरकर बढ़ती है, तब इसमें शूल, आनाह के समान तीव्र गुड़गुड़ शब्द, तोद एवं भेद (कुल्हाड़े के काटने के समान) होती है—इसको वातोदर कहते हैं ॥८॥

यच्चोपतृष्णाञ्चरदाहयुक्तं

पीतं सिरा भान्ति च यत्र पीताः ॥९॥

पीताक्षिविण्मूत्रनखानन्त्य

पितोदरं तत्त्वचिराभिबुद्धि ।

पितोदर—उदररोग में चोष (चूसने के समान वेदना), तृष्णा, उच्चर, दाह हो; जब पीली शिरायें (पित्तवह सिरायें) अधिक पीली हो जायें, आँख, मल-मूत्र-नख और चेहरा भी पीला हो जाता है तो पितोदर बहुत शीघ्रता से बढ़ता है ॥९॥

यच्छीतलं शुक्लसिराबनद्धं

गुरु स्थिरं शुक्लनखानन्त्य ॥१०॥

स्तिग्धं महच्छोफयुतं ससादं

कफोदरं तत्त्वचिराभिबुद्धि ।

कफोदर में—उदर शीतल एवं उदर पर शिराजाल श्वेत-सा दीखता है । उदर भारी, स्थिर (कठिन) हो जाता है । रोगी का चेहरा और नख श्वेत हो जाते हैं । उदर, स्तिग्ध, महान्—शोफयुक्त होता है, अङ्गों में ग्लानि होती है, उदर चिरकाल में बढ़ता है ॥१०॥

खियोऽन्नपानं नखरोममूत्र

विडारितवैयुक्तमसाधुवृत्ताः ॥११॥

यस्मै प्रयच्छन्त्यरयो शरांश्च

दुष्टाभ्वदूषीविषसेवनाद्धा ।

तेनाशु रक्तं कुपिताश्च दोषाः

कुवन्ति घोरं जठरं त्रिलिङ्गम् ॥१२॥

तच्छीतवाताश्रसमुद्धवेवु

विशेषतः कुप्यति दद्यते च ।

स चातुरो मूच्छति संप्रसक्तं

पाण्डुः क्रशः कूष्यति तृष्णया च ॥१३॥

प्रकीर्तितं दूष्युदरं तु घोरं

सनिपातोदर—दुराचारी स्त्रियाँ एवं अविवेकी पुरुष नख रोम-मूत्र-मल-आर्त्तव युक्त खान-पान को, शत्रु गर (संयोगजन्य कृत्रिम विष) जिस व्यक्ति को देते हैं—उसको एवं दूषित जल (विष-मत्स्यदि युक्त), दूषीविष (जो विषदावाग्निवायु और आतप के कारण मन्द हो जाये) के सेवन करने से रक्त और वातादि दोष शीघ्र कुपित होकर त्रिलिंग (वात-पित्त-कफ के लक्षणवाला), घोर उदररोग को उत्पन्न करते हैं । शीत से, वायु से, बादलों के आने पर विशेष रूप में यह रोग बढ़ता है, इसमें जलन होती है । रोगी निरन्तर मूर्च्छित रहता है, रोगी पाण्डुवर्ण, क्रश हो जाता है, प्यास से गला शुष्क हो जाता है । इस उदर को घोर (भयानक-कष्टकारी) एवं दूष्युदर (दुष्प्रतीकार होने से निन्दनीय) कहते हैं ।

वि० मन्तव्य—सोभाय की दुरभिलाषा से प्रेरित नारियाँ कर्मांग का प्रयोग करती हैं, तथा दुष्टा अपने जारों के बहकावे में आकर पति को उक्त प्रकार के द्रव्यों का प्रयोग कर बैठती हैं और शत्रु—तत्काल पुलिस की कार्यवाही आदि के भय से दूषीविषों का अलक्षित प्रयोग करते हैं । फलतः वह अमाया घुल-घुल कर महीनों खटिया सेकर मरता है ॥११-१३॥