सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अ० ७ ]
अतिशय रूप में पिड़काओं से पीड़ित एवं प्रमेह जन्य उपद्रवों से युक्त, मेही को मधुमेही कहते हैं, यह असाध्य है१ ॥ स चापि गमनात् स्थानं स्थानादासनमिच्छति ।
आमनाद् वृणुते शय्यां शयनात् स्वप्नमिच्छति ॥२५॥ मधुमेही रोगी चलने की अपेक्षा खड़ा रहना (काम न करना) खड़े रहने की अपेक्षा बैठना, बैठने की अपेक्षा शय्या (विस्तर पर लेटना), शय्या से सोना अधिक पसन्द करता है ॥
यथा हि वर्णानां पञ्चानामुत्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशेषेण शवल्बध्बृकपिलकपोतमेचकादीनां वर्णानामनेकेषामुत्पत्तिर्भवति, एवमेव दोषधातुमलाहारविशेषेणात्कर्षापकर्षकृतेन संयोगविशेषेण प्रमेहाणां नानाकरणं भवति ॥२६॥
जिस प्रकार कि पांच (सत हरित, कृष्ण, पीत और रक्त) रंगों के उत्कर्ष (अधिकता) एवं अपकर्ष (न्यूनता) द्वारा विशेष संयोग करने पर शवल् (मिश्रित वर्ण), बध् (पिगल वर्ण), कपिल (उज्ज्वल पिगल), कपोत (कबूतरी) और मेचक (उज्ज्वल श्याम-वर्ण) आदि अनेक प्रकार के रङ्ग उत्पन्न होते हैं; इसी प्रकार से दोष (वातादि), दूष्य (मेद वसा आदि), मल आहार की
१ जिस प्रकार से जिशु में कूर्ता-शूरता आदि गुण देखकर- 'सिहो माणवकः' यह प्रयोग होता है, उसी प्रकार से मधुमेही शब्द से—मधु के समान मूत्र प्रवाहित होता है, इसका छोटक मधुमेही शब्द है। इसी प्रकार से—उत्पत्तिजन्य तथा सहजज्य दोनों प्रकार का मधुमेह असाध्य है। कहा भी है—
जातः प्रमेही मधुमेही नो वा न साध्य उक्तः स हि बीज-दोषात् । ये चापि केचित्कालजा विकाराः भवन्ति तांश्च प्रवदन्य-साध्यान् ॥
(२) प्रमेह रोग, केवल मूत्रमार्ग का ही रोग है, यह बात नहीं। प्रमेह तो सारे शरीर का एक रोग है। इस रोग का मुख्य लक्षण—'प्रभूत-आविल मूत्रता'—मूत्र का मात्रा में अधिक और मलिन होना है। वह लक्षण शरीर में दोषों के प्रकोप से उत्पन्न होता है। इसी से चरक में कहा है "त्रयाणामेषां निदानादविशेषाणां सन्निपाते क्षिप्रं श्लेष्मा प्रकोपमापद्यते—प्रगतिभूयस्त्वात्, संप्रकृपितः क्षिप्रमेव शरीरे विस्मृति लभते, शरीरशैथिल्यात् । स विसर्पन् शरीरे मेदसैवादितो मिथीभावं गच्छति । मेदसश्चैव बह्वबद्धत्वात् मेदसश्च गुणानां गुणैः समानगुणभूषिष्ठत्वात् ।" इत्यादि ।
चरक० नि० अ० ४ ।
(३) मधुमेह में शरीर की उष्णमा कम हो जाती है। इसी लिये इस रोग में जो पिड़कायें बनती हैं वे पकती नहीं। इसी उष्णमा को बढ़ाने के लिये इन्सुलिन (पितामिन) दी जाती है ।
विशेषता के न्यूनाधिक द्वारा विशेष होने पर नाना प्रकार के प्रमेह उत्पन्न होते हैं ॥२६॥
भवति चात्र— सर्व एव प्रमेहास्तु कालेनाप्रतिकुर्यतः । मधुमेहत्वमायान्ति तदाऽसाध्या भवन्ति हि ॥२७॥ कहा भी है—
सब प्रकार के प्रमेह—प्रथम क्रियाकाल में चिकित्सा न करने पर मधुमेह में परिवर्तित हो जाते हैं। मधुमेह हो जाने पर असाध्य हो जाते हैं ॥२७॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने प्रमेहनिदानं नाम षष्ठोऽध्यायः ॥६॥
सप्तमोऽध्यायः
अथात उदराणां निदानं ष्याख्यास्यामः ॥१॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
प्रमेह की भांति उदररोग भी शीघ्र उत्पन्न हुए ही मुख्य साध्य हैं, इसलिये प्रमेह के पीछे उदररोग की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥
धन्वन्तरिरधिंभूतां वरिष्ठो
राजविरिन्द्रप्रतिसोऽभवद्यः ।
ब्रह्मर्षिपुत्रं । विनयोपपन्नं
गिर्यं शुभं सुश्रुतमन्वशात् सः ॥३॥
धर्ममाओ में श्रेष्ठ एवं राजर्षि इन्द्र के समान आयुर्वेद-ज्ञाता धन्वन्तरि (शल्यशास्त्र के ज्ञाता), विनय से युक्त (जितेन्द्रिय), ब्रह्मर्षिपुत्र (विश्वामित्र के पुत्र—तप से ब्रह्मत्व प्राप्त करने के कारण), विनय शील आदि शुभ गुणों से युक्त, शिष्य रूप से आये सुश्रुत को शिक्षा देने लगे ॥३॥
पृथक् समस्तैरपि चेह दोषैः
प्लीहोदरं बद्धगुदं तथैव ।
आगन्तुकं समसमश्रमं च
द्वकोदरं चेति वदन्ति तानि ॥४॥
इस शास्त्र में उदररोग आठ प्रकार के हैं। यथा—एक एक दोष से (वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य) तीन, सब दोषों से एक, इस प्रकार से चार प्लीहोदर, बद्धगुदोदर, आगन्तुक और द्वकोदर आठवाँ है। (यकृदाल्पुदर का अन्तर्भाव प्लीहोदर में ही होता है) ॥४॥
सुदुर्बलाग्नेरहिताग्रनश्य
संशुष्कत्यपूत्रनिषेवणाद्वा ।
स्नेहादिमिथ्याचरणान्च जनतो-
र्बुद्धिं गताः कोष्ठमभिप्रपन्नाः ॥५॥