सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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दैतानिलावपि च दक्षितपूर्वलिंगो
सर्वं च मर्मसु भवन्ति हि कृन्च्छसाध्या ॥८॥
इनमें साध्यासाध्य—वात, पित्त और कफजन्म विषर्प साध्य हैं, सन्निपातजन्म और क्षतजन्म विषर्प असाध्य हैं। गण्ड (छालों) युक्त वातजन्म विषर्प, अञ्जन की भाँति कीचड़ की तरह का पित्तजन्म विषर्प, तथा मर्मस्थानों में उत्पन्न विषर्पयोग कष्टसाध्य हैं ॥८॥
शोफं न पक्वमिति पक्वसुपेक्षते यो
यो वा व्रणं प्रचुरपूयसमाधुवृत्तः ।
अभ्यन्तरं प्रविशति प्रविदायं तस्य
स्थानानि पूर्वविहितानि ततः स पूयः ॥९॥
नाड़ी—अनुचित कर्म करनेवाला वैद्य पके हुए शोथ को अपक्षय (कच्चा) समझकर अथवा अतिपूययुक्त व्रण की उपेक्षा करता है, उक्त पुरुष में यह पूय पूर्वोक्त त्वचादि व्रण-वस्तु को विदीर्ण करके अन्दर प्रविष्ट हो जाती है ॥९॥
वस्यातिमात्रगमनादूगतिरित्यतश्च
नाडीव यद्बहति तेन मता तु नाडी ।
इस पूय के अतिमात्रा में अन्दर की ओर जाने से इसको 'गति' कहते हैं, नाड़ी (प्रणालीसिरा) की भाँति इसमें पूय का बहन होता है, इसलिये इसको 'नाड़ी' कहते हैं।
दोषैस्त्रिभिर्भवति सा पृथगोकशश्च
संमूर्च्छितैरपि च शल्यनिमित्ततोऽन्या ॥१०॥
संख्या—तीनों दोषों से पृथग, पृथग, तीन (वात, पित्त, कफजन्म), सन्निपातजन्म एक, द्विदोषजन्म, वात पित्त, पित्त-कफ, कफ-वातजन्म, और शल्यजन्म, इस प्रकार से पाँच प्रकार के नाडीव्रण हैं।
वि० मन्तव्य—नाड़ी व्रण को "नासूर" कहते हैं इसका मुख छोटा होता है और भीतरी भाग चौड़ा या बड़ा होता है फलतः इसके भीतर प्रलेप (मलहम) पहुँच नहीं पाता या बची आदि से पूर्णरूप से पहुँचाया नहीं जा सकता अतः यह शीघ्र नष्ट भी नहीं होती यदि इसका मुख—शस्त्र द्वारा अथवा क्षार द्वारा बड़ा कर लिया जाता है तो व्रण के समान शोधन रोग से नष्ट हो जाती है ॥१०॥
तत्रानिलात् पशुसूक्ष्ममुखी सशूला
फेनानुविद्वमधिकं स्ववति क्षपायाम् ।
वातजन्म नाड़ी—कठोर, सूक्ष्ममुखयुक्त, वेदनायुक्त होती है एवं फेन से मिश्रित खाव बढ़ाती है। यह खाव रात्रि में (शीत के कारण शीतकाल में भी) अधिक होता है।
रुद्रतापतोदसदन्ववरभेदहेतुः
पीतं चवत्यधिकमुष्णमहःसु पिप्तात् ॥११॥
पित्तजन्म नाड़ी—में प्यास, संताप, बुमने की वेदना अंगरुलानि तथा ज्वर की पीड़ा होती है। पीले रङ्ग का उष्ण खाव बढ़ता है, यह खाव दिन में (उष्णता के कारण) अधिक बढ़ता है ॥११॥
ज्ञेया कफाद्रुहवनाजुनपिच्छिलाखा
रात्रिघ्नृतिः स्तिमितरुक्कठिना सकण्डुः ।
कफजन्म नाड़ी—में खाव मात्रा में बहुत, गाढ़ा श्वेत तथा चिकना होता है। खाव रात्रि में अधिक होता है। नाड़ी में मन्द वेदना, कठोरता और कण्डु होती है।
दोषद्वयामिहितलक्षणदर्शनेन
तिस्रो गतिव्यतिकरप्रभवास्तु विद्यात् ॥१२॥
द्विदोषजन्म—उपर्युक्त दोषों के लक्षणों को दन्दरूप में संसर्ग होने पर व्यतिकर—प्रभव (दन्दजन्म) तीन गतियाँ जानमान लेवे। यथा—वातपित्तजन्म, पित्त-कफजन्म और वातकफ-जन्म ॥१२॥
दाहज्वररसवसनमूर्च्छनवक्त्रगोषा
यस्यां भवन्त्यभिहितानि च लक्षणानि ।
तामादिशेत् पवनपित्तकफप्रकोपाद्-
घोरासमुक्षयकरोमिव कालरात्रिम् ॥१३॥
सन्निपातजन्म नाड़ी—जिस नाड़ी में दाह, ज्वर, श्वास, मूर्च्छा, मुख की शुष्कता, तथा पूर्वोक्त (लक्षण उत्पन्न खाव का काला क्षागयुक्त, पीला, श्वेत होना) हों, उसे पित्त-वायु-कफ-जन्म समझना चाहिये। यह नाड़ी कालरात्रि के समान भयानक एवं प्राणनाशक होती है ॥१३॥
नष्टं कथंचिदनुमार्गमुदीरितेषु
स्थानेषु शल्यमचिरेण गति करोति ।
सा फेनिलं मथितमच्छमसुग्विमिश्र-
मुष्णं स्वतं सहसा सरुजा च नित्यम् ॥१४॥
शल्यजन्म नाड़ी—उदीरित (पूर्वोक्तवर्णित त्वचादि) स्थानों में किसी प्रकार से (हठिमांग में न आने से अथवा सूक्ष्म होने के कारण) शल्य के नष्ट होने से वा अनुमार्ग (छोतोगांग१) में घुसने पर शल्य-शीघ्रता से नाडीव्रण उत्पन्न करते हैं। इसमें खाव—क्षागदार, मथित (बिना जल के मथित तक्र के समान), (मांस के नष्ट होने से) निर्मल, रक्तमिश्रित, उष्ण खाव बढ़ता है। इनमें अकस्मात् खाव बढ़ता है, नित्य दर्द रहती है ॥१४॥
यावत्यो गतयो यैश्च कारणैः संभवन्ति हि ।
तावनतः स्तनरोगाः स्युः श्लोणां तैरेव हेतुभिः ॥१५॥
स्तन्य निदान—जितने प्रमाण की गतियाँ हैं, ओर जिन वात, पित्त, कफ, सन्निपात, अभिघातजन्म कारणों से उत्पन्न
१ कविराज हाराणचन्द्र—'अणुमात्रमुदीरितेषु'—यह पाठ पढ़ते हैं।