सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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सुश्रुतसंहिता
[ अं १० ]
होती हैं, उतने ही प्रकार की और उन्हीं कारणों से स्त्रियों में स्तन रोग उत्पन्न होते हैं ॥१५॥
धमन्यः संवृतह्वाराः कन्यानां स्तनसंश्रिताः । दोषाविसर्गात्तासां न भवन्ति स्तनामयाः ॥१६॥
कन्या (अप्राप्त गर्भवती स्त्रियों) के स्तनों में आश्रित धमनियों संवृतह्वार (अवरुद्ध मार्ग) होती हैं। इसलिये वातादि दोषों के रुके रहने से इनमें स्तनरोग नहीं होते हैं ॥१६॥
तासांमेव प्रजातानां गर्भिणीनां च ताः पुनः । स्वभावादेव विवृता जायन्ते संभवन्त्यतः ॥१७॥
इन्हीं स्त्रियों के प्रसवकाल में तथा गर्भवती स्त्रियों में वे धमनियाँ स्वभाव से खुल जाती हैं। इसलिये इनमें स्तनरोग होते हैं ॥१७॥
रसप्रसादो मधुरः पक्वाहारनिमित्तजः । कृत्स्नदेहात् स्तनौ प्राप्तः स्तन्यमित्यभिधीयते ॥१८॥
पक्वाहार के कारण उत्पन्न रस का प्रसाद (उत्तम सार-तेज रूप) एवं मधुर भाग—सम्पूर्ण शरीर से जब स्तनों में पहुँचता है, तब इसका नाम स्तन्य (दूध) हो जाता है ॥१८॥
विअस्तेष्वपि गात्रेषु यथा शुक्रं न दृश्यते ।
सर्वदेहाश्रितत्वाच्च शुक्लक्षणमुच्यते ॥१९॥
तदेव चेष्टयुवतेर्दर्शनात् स्मरणादपि ।
शङ्कसंश्रवणात् स्पृशोत् संहर्षोच्च प्रवर्तते ॥२०॥
सुप्रसन्नं मनस्तत्र हर्षणे हेतुरुच्यते ।
आहाररसयोनिस्त्वादेवं स्तन्यमपि स्त्रियाः ॥२१॥
१ (१) आहारजन्य रस सम्पूर्ण शरीर में सिरा एवं रक्त-वाहिनियों द्वारा घूमता फिरता है। शरीरस्थ अवयव और ग्रन्थियाँ इस रस में से अपनी आवश्यक वस्तु अपनी शक्ति से उत्पन्न करती हैं। यथा—निकण्ठ कण्ठ ग्रन्थि (Thyroid gland) एकरस (Iodia Thyria) उत्पन्न करती है, और उपवृक्क (Supera-Renal) दूसरा रस (Adernalin) उत्पन्न करता है। इसी प्रकार से अण्डकोश भी दो रस उत्पन्न करते हैं। एक बाह्य रस—जिसको शुक्र कहते हैं। यह कामच्छे से उत्पन्न होता है। और दूसरा रस अन्तःसाव-ओज है। यह शरीर को बढ़ाता है। इसी प्रकार से स्तन्य ग्रन्थियाँ (anamary glands) भी रस में से दूध रूपा साव उत्पन्न करती हैं। इस रससाव के ऊपर भी काम-क्रोध का प्रभाव पड़ता है। जिससे कि दूध दूषित हो जाता है। इसलिये इन अवस्थाओं में दूध पिलाना उत्तम नहीं।
(२) कविराज रामचन्द्र सेन का कहना है कि स्तन-रोग सदा गर्भ में पुत्र होने पर ही उत्पन्न होता है, पुत्रों को अवस्था में नहीं। यह बात प्रायः सत्य प्रतीत हुई है। कुछ थोड़े ही अपवाद हैं।
तदेवापत्यसंपर्गार्हर्शनात् स्मरणादपि ।
ग्रहणाच्च शरीरस्य शुक्रवत् संप्रवर्तते ॥२२॥
स्नेहौ निरन्तरस्तत्र प्रक्षवे हेतुरुच्यते ।
जिस प्रकार से गन्ने के रस में गुड़, दूध में घी व्याप्त होता है, उसी प्रकार से शुक्र एवं स्तन्य शरीर में व्याप्त है। इसलिये शरीर के सूक्ष्मरूप से काटने पर भी शुक्र दिखाई नहीं देता। सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होने से शुक्र की भाँति दूध भी शुक्र के समान है; शरीर के काटने पर भी नहीं मिलता। यही शुक्र—इष्ट युवती के दर्शन से, युवती के स्मरण से, युवती के शब्द सुनने से, युवती के स्पर्श से, तथा मानसिक हर्ष—प्रसन्नता से उत्पन्न होता है। शुक्र के उत्पन्न होने में मन की प्रसन्नता ही मुख्य कारण है। जिस प्रकार से शुक्र आहार रस से उत्पन्न होता है, इसी प्रकार स्त्रियों में स्तन्य भी आहार रस से ही उत्पन्न होता है। यह स्तन्य भी पुत्र के स्पर्श से, पुत्र के दर्शन से, उसके स्मरण से, उसके पकड़ने से, शरीर में से शुक्र की भाँति बाहर निकलने (झरने) लगता है। इस दूध के झरने में मुख्य कारण निरन्तर स्नेह है ॥१९-२२॥
तत् कृषायां भवेद्वातात् क्षिप्तं च प्लवतेऽम्भसि ॥२३॥
पितादमूलं सकटुकं राज्योऽम्भसि च पीतिकाः ।
कफाद्भ्रान् पिच्छिलं च जले चाप्यवसीदति ।
सर्वदुष्टैः सर्वलिङ्गमभिघाताच्च दुष्क्यति ॥२४॥
यह स्तन्य वायु से दूषित होने पर—कषायरस एवं पानी में गेरने पर तैरता है। पित्त के कारण—अम्ल एवं ईषत्कटु रस, तथा पानी में डालने पर पीली-ठालू-नीली रेखायें दीखती हैं। कफ के कारण—घन (सान्द्र), पिच्छिल एवं जल में दूध झूब जाता है। सन्निगतजन्य तथा अभिघात (पतन-पीडनादि) से, दूध में सब दोषों के लक्षण उत्पन्न होते हैं।
वि० मन्तव्य—स्त्रीप्रायी बालकों की चिकित्सा करते समय—धात्री के दूध का निरीक्षण अवश्य कर लेना चाहिये क्योंकि बालक कोई अन्य वस्तु तो खाता नहीं है ॥२३, २४॥
यत् स्त्रीरमुदके क्षिप्तमेकीभवति पाण्डुरम् ।
मधुरं चाविवर्णं च प्रसन्नं तद्विनिर्दिशेत् ॥२५॥
जो दूध पानी में डालने से पानी के साथ मिलकर एक सा हो जाता है तथा सफेद, स्वाद में मधुर, पीतादिवर्ण रहित है, उस दूध को प्रसन्न (प्रकृतिस्थ निर्दोष) समझना चाहिये ॥२५॥
सक्षोरो वाऽप्युदुग्धो वा प्राप्य दोषः स्तनौ स्त्रियाः ।
रक्तं मांसं च सन्दूष्य स्तनरोगाय कल्प्यते ॥२६॥
सम्प्राप्ति—दूध युक्त अथवा बिना दूध की दूध उत्पन्न करने में समर्थ होने पर भी बालक के उपयुक्त समय तक दूध पी चुकने के पश्चात् स्त्री के स्तनों में कुपित दोष पहुँचकर, रक्त एवं मांस को दूषित करके स्तनरोगों को उत्पन्न करते हैं ॥