भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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अ० ११ ]

निदानस्थानम्

२६१

पञ्चानामपि तेषां तु हित्वा शोणितविद्रधिम् ।

लक्षणानि समानानि बाह्यविद्रधिद्वयः ॥ २७ ॥

वातादिजन्य पाँचों स्तनरोगों के लक्षण, शोणितजन्य विद्रधि को छोड़कर—शेष बाह्य विद्रधि के लक्षणों के समान होते हैं ॥ २७ ॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने विषर्पनाडीस्तनरोग-

निदानं नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥

एकादशोऽध्यायः

अथात ग्रन्थ्यपच्यवृद्गलगण्डानां निदानं व्याख्यास्यामः ।

यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥ २ ॥

शोध की सामान्यता से विषर्परोग के पीछे ग्रन्थि, अर्बुद, गलगण्ड अपनी निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ।

वि० मन्तव्य—ग्रन्थि को “मोगलीफोड़ा” कहते हैं ।

अपनी या गण्डमाला को “गलशरीर” और गलगण्ड को शिमला की तराई में गिल्लड़ और गोरखपुर आदि में बँचा कहते हैं । अर्बुद को “रसोली” कहते हैं ॥ १, २ ॥

वातादयो मांसससूक् च दुष्टाः

संदूष्य मेदश्च कफानुबिद्धम् ।

घुत्तोन्नतं विप्रश्रंत् तु शोफं

कुर्वन्त्यतो ग्रन्थिरिति प्रदिष्टः ॥ ३ ॥

वात, पित्त, कफ, दूषित होकर मांस एवं रक्त तथा कफ संयुक्त मेद को दूषित करके, गोलाकार, उठी हुई, गाँठ के समान, कठोरता युक्त शोथ उत्पन्न करते हैं । इसलिये इसको ग्रन्थि कहते हैं ॥ ३ ॥

आयम्यते व्यध्यत एति तोदं

प्रत्यस्यते कृत्यत एति मेदम् ।

कृष्णोऽभृदुर्वस्तिरिवाततश्च

भिन्नः श्वचेच्छानिलजोऽस्मच्छम् ॥ ४ ॥

वातजन्य ग्रन्थि में—वायु के आकर्षण के कारण लम्बी सी की जाने के सहस्र, आरे से काटने के समान, सुई चुभने के समान, खींच कर ढेला आदि लगने के समान, कुठार से काटने के समान तथा परशु से फाड़ने के समान वेदना होती है ।

१ भोज ने भो कहा है—

“वायुर्मोदो यदा मांसं सक्षिपेदथवा स्वचि ।

तत्र मेदोऽमवा ग्रन्थिः स्यादो भवति कण्डुलः ॥”

पाँचवीं—शिराजन्यग्रन्थि ( Toumar ) है ।

ग्रन्थि कृष्णवर्ण, कठोर तथा मूत्राशय के समान तनी होती है । इसके फटने पर स्वच्छ रक्त बहता है ॥ ४ ॥

दन्दद्वये धूप्यति चूयते च

पापच्यते प्रज्वलतीव चापि ।

रक्तः सपीतोऽप्यथवाऽपि पिप्ताद्-

भिन्नः श्ववेदुष्णमतीव चास्मम् ॥ ५ ॥

पित्तजन्य ग्रन्थि में—अतिशय दाहयुक्त प्रतीत होती है, अतिशय सन्ताप युक्त अथवा गरम प्रतीत होती है, चुभने के समान वेदना युक्त होती है, अतिशय पकती है, तथा जलती सी प्रतीत होती है, ग्रन्थि का वर्ण लाल या पीला होता है । इसके फूटने पर अति उष्ण रक्त बहता है ॥ ५ ॥

शीतोऽविषणोऽस्पर्शजोऽतिकण्डुः

पाषाणवत् संहननोपपन्नः ।

चिराभिबृद्धिश्च कफप्रकोपाद्-

भिन्नः श्वचेच्छुकलघनं च पूयम् ॥ ६ ॥

कफजन्य ग्रन्थि—

शीत, कुछ मलिन रङ्गवाली, अल्प वेदनावाली, अधिक कण्डुवाली, पत्थर की तरह कठिन होती है । शनैः २ बढ़ती है, इसके फूटने पर श्वेत गाढ़ा पूय बहता है ॥ ६ ॥

शरीरवृद्धिक्षयवृद्धिहानिः

स्निग्धो महानस्पर्शजोऽतिकण्डुः ।

मेदःकृतो गच्छति चावभिन्ने

पिण्याकसर्पिः प्रतिमं तु मेदः ॥ ७ ॥

मेदोग्रन्थि—

शरीर की वृद्धि से बढ़ती है और शरीर क्षय से घटती है, चिकनी, आकार में महान्, मन्द वेदना युक्त अधिक कण्डुवाली होती है । इसके फूटने पर पिण्याक ( तिलककलखल ) और घी के समान मेद बाहर आती है ॥ ७ ॥

व्यायामजातैरबलस्य तैस्तै-

राक्षिण्य वायुर्हि सिराप्रतानम् ।

संपीड्य सङ्कोच्य विशोष्य चापि

ग्रन्थि करोत्युन्नतमाशु वृत्तम् ॥ ८ ॥

ग्रन्थिः सिराजः स तु कृच्छ्रसाधयो

भवेद्यादि स्यात् सरुजश्चलश्च ।

अरुक् स एवाप्यचलो महाश्च

समंस्थितश्चापि विवर्जनीयः ॥ ९ ॥

शिराजन्यग्रन्थि—

निर्बल पुरुष के अतिशय व्यायाम करने पर तथा अन्य वायुवर्धक कारणों से वायु, कुपित होकर शिराजालों को पीड़न करके, संकुचित करके अथवा शुष्क करके गोल, उन्नत ( उठी हुई ) ग्रन्थि को शीघ्र उत्पन्न करती है । यदि शिराजन्य ग्रन्थि

१ अपववावस्था में ही स्वच्छ ( पूय रहित ) रक्त निकलता है । पककर फूटने पर पूय-मिश्रित रक्त जाता है ।