भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ११ ]

वेदना युक्त और चल ( गतिशील ) हो तो कृच्छ्रसाध्य है । और यदि अचल ( निश्चल ), महान् और वेदना रहित हो, अथवा मर्मस्थानों में उत्पन्न हुई हो तो असाध्य समझनी चाहिये ॥ ८६ ॥

हन्वस्थिकक्षाक्षकबाहुसन्धि- मन्यागलेपूपचितं तु मेदः ।

प्रन्थिं स्थिरं वृत्तमाथायतं वा स्तिग्धं कफरूचात्परुजं करोति ॥ १० ॥

तं प्रन्थिभित्स्वामलकस्थिमात्रै- मर्त्त्याण्डजालप्रतिमैस्तथाऽन्यैः ।

अतन्यवर्णैरुपचीयमानं चयप्रकर्षादपचीं वदन्ति ॥ ११ ॥

कण्डुयुतास्तेऽल्परुजः प्रभिनन्ताः स्त्रवन्ति नश्यन्ति भवन्ति चान्ये ।

मेदःकफाभ्यां खलु रोग एष सुदुस्तरो वर्षगणानुवन्धी ॥ १२ ॥

अपची रोगकी सम्पादित—हन्वस्थि सन्धि, कक्षा (बाहुमूल) सन्धि, अक्षक (Geavical Bones) सन्धि, बाहुसन्धि ( वंक्षणसन्धि भी ), मन्या ( शीवा के पार्श्व भाग में स्थित दो धमनियाँ ), और गले में सन्चित मेद और कफ प्रन्थि को उत्पन्न करते हैं । यह प्रन्थि स्थिर, गोल अथवा आयताकार ( लम्बी ) स्तिग्ध, और मन्द वेदनायुक्त होती है । कोई प्रन्थि आँवले के फल के समान होती है और अन्य ( कोई ) मछलियों के अण्डों के जाल के समान ( गुच्छाकार एवं छोटी ) होती हैं । निरन्तर चढ़ती जाने पर भी इनका रङ्ग स्वत्र के समान रहता है । चय ( उपचय-संचय ) की अधिकता से इनको 'अपची' कहते हैं । इन प्रन्थियों में कण्डु होती है, मन्द वेदना रहती है । फूटने पर बहती हैं और नष्ट हो जाती हैं । दूसरी नई प्रन्थियाँ निकल आती हैं । यह रोग मेद और कफ के कारण से उत्पन्न होता है । बहुत वर्षों का पुराना होने पर यह रोग कष्टसाध्य है । ( चक्रपाणि ने चरक की टीका में प्रन्थिविसर्प को 'अपची' कई कहते हैं—ऐसा लिखा है ) चरक ॥ १०-१२ ॥

१ इस रोग में वायु-पित्त का भी थोड़ा योग रहता है जैसा कि भोज ने कहा है—

“वातपित्तकफा वृद्धा मेदश्चापि समाचितम् । जघयोः कण्डराः प्राप्य मत्स्याण्डसदृशान् बहून् ॥ कुर्वन्ति प्रत्ययस्तेभ्यः पुनः प्रकृतिोऽनिलः । त्रिदोषाद्बुध्द्वर्गो वक्षः कक्षामन्या गलाश्रितः ॥ नानाप्रकारान् कुशले प्रन्थीन् सा त्वपची स्मृता । व्याभिश्चरोपजातस्य कृच्छ्रसाध्या प्रकीर्तिता ॥ तासां वातोत्तरा रूक्षा वातवेदनयान्विता । क्षिप्रपाकसमुत्थाना दाहयुक्ता तु पैत्तिकी । गूढा तु वातकठिना कफास्तिग्धाल्पखकरा ॥”

गात्रप्रदेशे क्वचिदेव दोषाः संमन्त्रिता मांसमभिप्रदूष्य । वत्सं स्थिरं मन्दरुजं महान्त- मनल्पमलं चिरवृद्धयपाकम् ॥ १३ ॥

कुर्वन्ति मांसोपचयं तु शोफं तमवृदं शाख्विदो वदन्ति ।

अर्बुद—सम्पूच्छित ( कृषित हुए ) वातादि दोष शरीर के किसी भी भाग में मांस और रक्त को दूषित करके गोल, स्थिर, मन्द वेदना युक्त, महान् एवं विस्तृत मूलवाली, ढेर में बढ़नेवाली, पाक रहित ( न पकनेवाली ), मांसोच्छ्रय ( मांससंघात युक्त ) तथा अगाध ( गम्भीर ) शोफ उत्पन्न करते हैं । शाख्विदु इसको 'अर्बुद' कहते हैं ॥ १३ ॥

वातेन पित्तेन कफेन चापि रक्तं मांसं च मेदसा च ॥ १४ ॥ तज्जायते तस्य च लक्षणानि ग्रन्थैः समाजानि सदा भवन्ति ।

वायु, पित्त, कफ, रक्त, मांस एवं मेद के कारण छे प्रकार का अर्बुद होता है । इस अर्बुद के लक्षण प्रन्थि के समान होते हैं ॥ १४ ॥

दोषः प्रदुष्टो रुधिरं सिरास्तु संपीड्य सङ्कोच्य गतस्त्वपाकम् ॥ १५ ॥ साक्षावमुन्नतानि मांसपिण्डं मांसाङ्कुरैराचितमाशुवृद्धिम् ।

स्त्रवत्यजस्त्रं रुधिरं प्रदुष्ट- मसाध्यमेतदुधिरात्मकं स्यात् ॥ १६ ॥ रक्तक्षयोपद्रवपीडितत्वात् पाण्डुभवेत् सोऽर्बुदपीडितस्तु ।

अर्बुद के लक्षण—दूषित वातादि दोष एवं रक्त शिराओं को पीड़ित एवं संकुचित करके, पकने पर रक्त की मात्रा बढ़ने से एवं स्वत्र के न फूटने के कारण मांसपिण्ड को ऊपर की ओर उभार देते हैं । यह शोथ ( उभार ) मांसाङ्कुरों से व्याप्त होता है और शीघ्र बढ़ता है । इससे निरन्तर दूषित रक्त बहता रहता है । यह रक्तजन्य अर्बुद असाध्य है । रक्त के क्षय के कारण उपद्रवों से ( मूर्च्छा आदि रक्तपित्तजन्य उपद्रवों से ) पीड़ित तथा अर्बुद रोगी जो पाण्डु वर्ण हो जाये, वह भी असाध्य है ॥ १५, १६ ॥

सुष्टिप्रहारादिभिरिदितेऽङ्के मांसं प्रदुष्टं प्रकरोति शोफम् ॥ १७ ॥ अवेदनं स्तिग्धमनन्यवर्ण- मपाकमश्मोपममप्रचाल्यम् । प्रदुष्टमांसस्य नरस्य बाढ- मेतद्भवेन्मांसपरायणस्य ॥ १८ ॥ मांसार्बुदं त्वेतदसाध्यमुक्तं