सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
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निदानस्थानम्
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मांसजन्य अर्बुद—मुष्टिप्रहार आदि ( मुक्का की चोट आदि ) के कारण अङ्गों में चोट लगने से मांस दूषित होकर शोफ उत्पन्न करता है । यह शोफ वेदना रहित, स्निग्ध, स्वचा के समान वर्ण, पाक रहित, पत्थर के समान कठोर एवं निरुचल ( न हिलनेवाला ) होता है । मांसपरायण ( अतिशय-मांसपक्षी ) पुरुष के मांस के अति दूषित होने से यह अर्बुद ( सिक्क, कक्षा, जंघा आदि मांसबहुल स्थानों में ) विशेषकर होता है । यह मांसार्बुद असाध्य है ॥१७,१८॥
साध्येष्वपीमानि विचजयेत् ।
संप्रसृतं मर्मणि यच्च जातं
क्षोतः सु वा यच्च भवेदचात्यम् ॥१९॥
यद्यजायतेऽन्यत् खलु पूर्वजाते
क्षेत्रं तदध्यर्बुदमर्बुदक्षैः ।
यद्ब्रह्मजातं युगपत् क्रमाद्वा
द्विरर्बुदं तच्च भवेदसाध्यम् ॥२०॥
साध्य अर्बुदों में भी निम्नलिखित अर्बुदों को विकिसा कर्म में छोड़ देना चाहिये । यथा—जिन अर्बुदों में से रक्त का स्त्राव होता हो, जो अर्बुद मर्म या क्षोतसु स्थानों में उत्पन्न हुआ हो, जो अचल हो, प्रथम अर्बुद के होने पर जो अर्बुद फिर-दूसरा उत्पन्न होता है उसको 'अध्यर्बुद' जानना चाहिये । जो अर्बुद एक साथ ब्रह्म ( जोड़िया ) रूपमें अथवा क्रम से ( एक के पीछे दूसरा ) उत्पन्न होते हैं, उनको द्विरर्बुद कहते हैं—ये द्विरर्बुद ( एवं द्विदोषजन्य भी ) तथा अध्यर्बुद असाध्य हैं ॥
न पाकमायान्ति कफाधिकत्वान-
मेदोऽब्रह्मत्वाच्च विशेषतस्तु ।
दोषस्थिरत्वादग्र्यनाच्च तेषां
सर्वार्बुदान्येव निसर्गतस्तु ॥२१॥
न पकने का कारण—अर्बुदों में कफ और मेद की अधिकता विशेष रूप में रहती है, इसलिये, यथा वातादि दोषों के स्थिर ( मांसोन्नति के कारण चिरकाल तक रहने से कठोर ) होने से एवं वातादि दोषों के ग्रन्थि रूप में ( निश्चल ) बन जाने से, सब प्रकार के अर्बुद स्वभाव से ही नहीं पकते हैं ।
नि० मन्तन्य—सब अर्बुद पकते नहीं परन्तु रुधिरात्मक अर्बुद में से स्त्राव अवश्य निकलता है ॥२१॥
वातः कफश्चैव गले प्रवृद्धौ
मन्ये तु संसृत्य तथैव मेदः ।
कुर्वन्ति गण्डं क्रमशः स्वलिगैः
समन्वितं तं गलगण्डमाहुः ॥२२॥
गलगण्डसम्प्राप्ति—अतिशय रूप में प्रवृद्ध वायु और कफ तथा मेद-मन्या ( ग्रीवा के पार्श्व भाग की धमनियों ) का आश्रय करके वातकफ के ( अपने अपने ) लक्षणों से युक्त, क्रमशः ( शनैः-
वृद्धिशील ) गण्डरोग को उत्पन्न करते हैं, इसको गलगण्ड कहते हैं । ( पिच्छजन्य गलगण्ड नहीं होता ) ।
गलगण्ड प्रायः—पर्वतीय प्रदेशों तथा तराईयों में होता है जहाँ कूप नहीं होते केवल कुल्याओं का जल पीना पड़ता है । इससे रोगी प्रायः आलसी एवं जड़ होते हैं ॥२२॥
तोदान्वितः कृष्णसिरावनन्दः
कृष्णोऽरुणो वा पवनात्मकस्तु ।
मेदोन्वितश्चोपचितश्च कालाद्-
भवेदतिस्निग्धतरोऽरुजश्च ॥२३॥
वातजन्य गलगण्ड—तोदान्वित ( सूई चुभने की वेदना युक्त), कृष्ण-शिराओं से व्याप्त, कृष्ण अथवा लालवर्ण होता है । यदि कालवश से संचित मेद के साथ संयुक्त हो जाता है तो अतिशय स्निग्ध एवं अरुज ( वेदना रहित ) होता है ॥२३॥
पारुष्ययुक्तश्चिरवृद्धयपाको
यदृच्छया पाकमियात् कदाचित् ।
वैरस्यमास्यस्य च तस्य जनतो-
भवेत्तथा तालुगलप्रशोषः ॥२४॥
यह अर्बुद कठोरता युक्त, देर में वर्धनशील, देर में पकनेवाला, मास्यवश कभी पकता है । रोगी के मुख का स्वाद बदल जाता है, तालु और गला सूख जाता है ॥२४॥
स्थिरः सर्वाणोऽल्परुग्मकण्डूः
शोतो महांश्चापि कफात्मकस्तु ।
चिराभिर्वृद्धिं कुरुते चिराच्च
प्रपच्यते मन्दरुजः कदाचित् ॥२५॥
माधुर्यमास्यस्य च तस्य जनतो-
भवेत्तथा तालुगलप्रलेपः ।
कफजन्य गलगण्ड—स्थिर, स्वचा के समान वर्ण, मन्द वेदनाशील, कण्डूबहुल, शीतल, एवं महान् होता है । बहुत देर में बढ़ता है और कभी मास्य से बहुत देर में पकता है तब थोड़ी वेदना होती है । रोगी का मुख मीठा रहता है, तालु और गला कफ से भरा रहता है ॥२५॥
स्निग्धो मृदुः पाण्डुरनिष्ठगन्धो
मेदः कृतो नौरुगथातिकण्डूः ॥२६॥
प्रलम्बतेऽलावुवदल्पमूत्रो
देहानुरूपक्षयवृद्धियुक्तः ।
स्निग्धास्यता तस्य भवेच्च जनतो-
गर्लेऽनुगच्छं कुरुते च नित्यम् ॥२७॥
मेदजन्य गलगण्ड—स्निग्ध, मृदु ( कोमल), पाण्डुवर्ण, अनिष्ठ गन्ध ( दुर्गन्ध ) युक्त, वेदना रहित, कण्डूबहुल होता है । अलावु ( घिया कदरू ) के समान नीचे लटकता है, मूल-अर्ण ( छोटा ) होता है, शरीर की वृद्धि से बढ़ता है और शरीर के