भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ११ ]

क्षय से घटता है। रोगी का मुख स्निग्ध रहता है, सर्वदा या बोलने पर गले से शब्द आता रहता है।

वि० मन्तव्य—मेदोज गलगण्ड ही अधिक देखा जाता है ॥

कृच्छ्रान्कृमन्तं मृदुसर्वगान्तं संवत्सरतीतमरोचकार्त्तम् ।

क्षणं च वैद्यो गलगण्डितं तु

भिन्नस्वरं चैव विवर्जयेत् ॥१२८॥

असाध्यता—कठिनाई से श्वास लेनेवाला रोगी हों, सम्पूर्ण शरीर कोमल (थोथला) हो, एक साल पुराना हो गया हो, अरोचक रोग से पीड़ित, शरीर से क्षीण तथा भिन्नस्वर (शब्द स्वर टूटे हुए) रोगी को असाध्य समझना चाहिये ॥१२८॥

निबद्धः श्वयथुस्थंय मुष्कवत्त्वन्वते गले ।

महान् वा यदि वा हृस्वो गलगण्डं तमादिशेत् ॥१२९॥

गलगण्ड का स्वरूप—जिस रोगी के गले में महान् अथवा हृस्व सूजन, अण्डकोष के समान लटकने लगती है, उसको गलगण्ड कहते हैं ॥१२९॥

इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने गलगण्डगण्डमाळा-

पच्यन्तुं दिनदानं नामैकादशोऽध्यायः ॥१११॥

द्वादशोऽध्यायः

अथातो वृद्धयु पदंशस्त्रीपदानां निदानं व्याख्यास्यामः ॥१॥ यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥

शोथ की सामान्यता से अनुर्द आदि निदान के पीछे वृद्धि, उपदेश, श्लीपद निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिये कहा था ॥१,२॥

वातपित्तरलेष्मशोणितमेदोमूत्रान्ननिमित्ताः सम वृद्धयो भवन्ति । तासां मूत्रान्ननिमित्ते वृद्धी वातसमुत्थे, केवल-सुत्पत्तिहेतुरन्यतमः ॥३॥

वृद्धि रोग सात प्रकार का है। यथा—वातजन्य, पित्तजन्य, कफजन्य, रक्तजन्य, मेदोजन्य, मूत्रजन्य और अन्त्रजन्य, (द्रन्दजन्य वृद्धि रोग नहीं होता) इनमें मूत्रजन्य तथा अन्त्रजन्य वृद्धि की उत्पत्ति का कारण वायु है, वायु के कारण वृद्धि होती है। उत्पत्ति का प्रधान कारण मूत्र या अन्त्र इनमें से कोई एक होता है।

१ यथा—

मेदः कफात् शोणितसंचयोत्यो

गण्डस्य पार्श्वं गलगण्ड एकः

स्याद् गण्डमाला बहुभिश्च गण्डैः

दीप्तानिलेष्वलपलान्विते च ॥

साध्या स्मृता पीनसपाश्वशूल-

कासप्वरच्छदियुता त्वसाध्या ॥

वि० मन्तव्य—मूत्र वृद्धि में मूत्र का सा द्रव भर जाता है जैसे जलोदर में ॥३॥

अथः प्रकृतिपोऽन्यतमो हि दोषः फलकोशवाहिनीर-भिप्रपद्य धमनीः फलकोषयोर्बृद्धि जनयति, तां वृद्धिमित्याचक्षते ॥४॥

कोई एक दोष नीचे की ओर (नागिसे नीचे) कृषित होकर अण्डकोषवाहिनी धमनी (Spinal-Cord) में पहुँचकर फलकोषों में वृद्धि (enlargement) उत्पन्न करता है, इसको 'वृद्धि रोग' कहते हैं। चरक में कहा है 'ब्रन्धोऽनिलान्वैः वृषणे स्वलिगैः अन्त्रं निरेत्य प्रविशेन्मृदुश्च । मूत्रेण पूर्णं मृदु मेदसा चेत्, स्निग्धं च विद्यात् कठिनं च शोथम् ।' ॥४॥

तासां भविष्यतीनां पूर्वरूपाणि-वस्ति कटी मुष्क मेदो वेदना मारुतनिग्रहः फ० कौग्रोफो फक्षेति ॥५॥

पूर्वरूप—वृद्धि रोग के पूर्वरूप-वस्ति (मूत्राशय) में वेदना, कटिशूल, मुष्क (अण्ड) में वेदना, शिश्न में वेदना, वायु का अवरोध—एवं फलकोश में सूजन (orchitis) होती है ॥५॥

तत्रानिलपরিपूर्णां वस्तिमिवाततां परुषामनिमित्तानिलरूजां वातवृद्धिमाचक्षते, पक्कोदुम्बरसङ्ग्राशां ज्वरदाहोष्मवतीं चाशुसमुत्थानपाकां पित्तवृद्धिं; कठिनामल्पवेदनां शीतां कण्डुमतीं इलेष्मवृद्धिं, कृष्णस्फोटावृतां पित्तवृद्धिलिङ्गां रक्तवृद्धिं, मृदुस्निग्धां कण्डुमतीमल्पवेदनां तालफलप्रकाशां मेदोवृद्धिं, मूत्रसंधारणशीलस्य मूत्रवृद्धिं भवति, सा गच्छतोऽस्त्रुपूर्णां हृतिरिव लुभयति, मूत्रकृच्छ्रवेदनां वृषणयोः श्वयथुं कोशयोश्चापादयति, तां मूत्रवृद्धिं विद्यात्, भारहरणबलवृद्धिग्रहवृक्षप्रपतनादिभिरायासविशेषैर्वायुरभिप्रवृद्धः प्रकृपितश्च स्थूलान्त्रस्येतरेभ्यः चैकदेशं विगुणमादायाधो गत्वा वल्लक्षणसन्धिमुपेत्य प्रस्थिरूपेण स्थित्वाऽपतिक्रियमाणे च कालान्तरेण फलकोशं प्रविश्य मुष्ककोफमापादयति, आधमातो वस्तिरिवाततः प्रदीर्घः स शोफो भवति सशब्दमवपीडितशोर्ध्वमुपैति, विमुक्तश्च पुनराधमायते तामन्त्रवृद्धिमासाध्यामित्याचक्षते ॥६॥

लक्षण—वातजन्य वृद्धि वायु से भरी वस्ति के समान बिना कारण के वेदनाशील होती है। पित्तवृद्धि पके हुए गूल्सर फल के समान, ज्वर-दाह एवं उष्णमा युक्त, शीघ्र उठने एवं शीघ्र पकनेवाली होती है। कफ वृद्धि—कठिन, अल्पवेदना युक्त, शीत-स्पर्श, कण्डुमान् होती है। रक्तजन्य वृद्धि—काले स्तोत्रों से व्याप्त पित्तजन्य वृद्धि के समान लक्षणों से युक्त होती है। मेदजन्य वृद्धि मृदु, स्निग्ध, कण्डु युक्त, मन्दवेदना शील, पक्व ताल फल के समान होती है। जिस मनुष्य को मूत्र रोकने की आदत होती है, उसको मूत्रवृद्धि रोग होता है। चलते समय यह मूत्रवृद्धि—जल से भरी मशक के समान हिलती है, मूत्रप्रावाहण में कष्ट, वृषणों में वेदना तथा अण्डकोषों में सूजन आती है।