भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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निदानस्थानम्

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जाती है। इसको मूत्रवृद्धि कहते हैं। अंत्रवृद्धि—भार को उठाने से, बलवान् पुरुष के साथ युद्ध करने से, वृक्ष से गिरने पर—अथवा अन्य इस प्रकार के परिश्रमजन्य कारणों से वायु स्वरथन में अतिशय बढ़कर एवं कुपित होकर स्थूलान्त के एक इतर भाग को टेढ़ा (दुहेरा) करके वंक्षणसन्धि में नीचे की ओर ले जाकर प्रन्थि (गांठ) रूप में रहती है। चिकित्सा न करने पर कुछ समय के पीछे फलकोशों (scrotam) में घुसकर मुक्तशोथ को उत्पन्न करती है। इस अवस्था में शोफ—आभ्यान (फूल), वस्ति के समान विस्तृत और लम्बी होती है। दवाने पर आवाज के साथ ऊपर को चढ़ जाती है (सृजन हट जाती है)। छोड़ने पर (शब्द के साथ) नीचे आकर फुला देती है। इस अंत्रवृद्धि को (Hernia) असाध्य (भेषज रूप से) कहते हैं।

वि० मन्तव्य—अन्त्रवृद्धि—इसको “आँत उतरना” आँत गिरना कहते हैं। जहाँ लुद्रान्त का अन्त और वृहदन्त्र का प्रारम्भ होता है वहाँ एक सौंग सा परन्तु अत्यन्त मृदु, ३-४ अंगुल लम्बा, अंगूठा सा मोटा अवयव होता है उसे “उपान्त” कहते हैं यह अपने स्थान से खिसक कर कुल्ले में आ जाता है—अङ्ग जाता है, गाँठ सी प्रतीत होती है और कभी २ उससे भी नीचे आकर अण्डकोश में आ जाता है और दवाने से ऊपर को चला जाता है। यह लम्बा शोफ प्रतीत होता है, शोफ नहीं होता उपान्त ही गुल्फा सा रहता है इसको खिसकने से रोकने के लिये कुण्डलिका का या पेटी का प्रयोग किया जाता है, शस्त्र चिकित्सा से भी खिसकना रुक जाता है ॥६॥

तत्रातिमैथुनादतिब्रह्मचार्याद्धा तथाऽतिब्रह्मचारिणी चिरोत्सृष्टा रजस्वला दीर्घरोमा कर्कशरोमा सङ्कीर्णरोमा निगृह्णोमामल्पद्वारा महाद्वारामप्रियामकामामचौक्षस-लिष्ठप्रक्षालितयोनिमप्रक्षालितयोनि योनिरोगोपसृष्टा स्वभावतो वा दुष्टयोनि वियोनि वा नारीभृत्यर्थमुपसेवमानस्य तथा करजदशनविषशुक्तिपातनाद्वन्धनाद्वस्ताभि-घाताद्युपपदीगमनादचौक्षसलिष्ठप्रक्षालनाद्वपीडनाच्छु-क्वेगविधारणान्मैथुनान्ते वाऽप्रक्षालनादिभिर्मद्वमागम्य प्रकुपिता दोषाः क्षतेऽक्षते वा श्वयशुमुपजनयन्ति, तमुप-दंशमित्याचक्षते ॥७॥

अतिमैथुन के सेवन से, अतिब्रह्मचारिणी (मैथुन से अति-निष्ठ होने के कारण योनि के संकुचित एवं कर्कश हो जाने से), कदाचित् ही मैथुन करनेवाली अर्थात् देर से जिसने मैथुन छोड़ रक्खा है, रजस्वला (श्रुतुमती), दीर्घ रोमवाली, कर्कश

१ कविराज हाराणचन्द्र जी—‘स्थूलान्तस्येतस्य चैकदेश’ मह पाठ पड़ते हैं। यहाँ पर इतर शब्द से श्रुद्ग्रीव का ग्रहण है।

रोमवाली, संकीर्ण (वने) रोमवाली, निगृह्ण (अन्तःप्रविष्ट होने से लिपे) रोमवाली, अल्पद्वार (तंग योनि मुख) वाली, महाद्वार-वती, अप्रिया (प्रेम न रखनेवाली), अकामा (मैथुनेच्छा न करनेवाली-जाधों को संकुचित करनेवाली) अनौक्ष (अपवित्र) सलिल से प्रक्षालित योनि (योनि से निकलनेवाले पानी से तर योनि), अप्रक्षालित (मलिन) योनि, योनिरोग युक्त, स्वभाव (प्रकृति) से ही दुष्ट योनि (वातादि से दूषित योनि), वियोनि (पशु आदि की योनि को अथवा पारुष्यादि दोषों से दूषित-कर्कश आदि के सेवन से) अथवा स्त्री के अति सेवन से, तथा नख, दाँत, विष, शूक (जलशूक घोवा) के छिग पर गिरने या लगने से, अथवा जलशूक के बाँधने से, या हाथ से चोट लगने पर, चतुष्पदी (गाय-भैंस) की योनि में मैथुन करने से, आर्गवित्र जल से छिग को धोने के कारण, अवपीडन (छिग को दवाने से), शुक्र मूत्र के उपस्थित वेग को रोकने से, मैथुन के अन्त में शिरन को न धोने आदि कारणों से कुपित हुए वातादि दोष शिरन में आकर क्षतयुक्त अथवा क्षतरहित सृजन उत्पन्न करते हैं। इस सृजन को उपदंश कहते हैं।

वि० मन्तव्य—कीटाणुवाद या क्रुमिवाद—भले ही सिफ-लिस को पृथक् माने परन्तु—उपदंश के उक्त कारण एवं उक्त लक्षण तथा चिकित्सा विधान एवं चिकित्सा सफलता को देख-कर पृथक् मानना उचित नहीं प्रतीत होता। उक्त क्रुमि रक्तज क्रुमि अवश्य माने जा सकते हैं जो कुष्ठैककर्म कहे हैं। योनि-रोगोपसृष्टा—उपदंश रोग से उपसृष्टा—उपदूता—पीडिता। योनि—भग का नाम है और भग-मैथुनोपयोगी अवयव है जो नर नारी में समान रूप से होता है केवल उसके आकार में भेद है और यह भेद भी अस्थायी है—परिवर्चन शील है, आयुर्वेद में छिग परिवर्चनार्थ पुंसवन का विधान है और वेद में पुंसवन संस्कार का विधान है और आज का शल्य चिकित्सक छिग परिवर्चन में सफल भी हो गया है और पुराणों में इस प्रकार की अनेक घटनाओं का उल्लेख पाया जाता है अतः

१ आजकल जिस रोग को सिफलिस कहा जाता है, उसका कारण एक क्रुमि (Spreechita Paladia) है। यह एक संक्रामक रोग है। जो कि स्पर्श से पहुँचता है। पुस्त दरपुस्त उतरता है। इसकी तीन अवस्थायें हैं।

(२) अन्य लक्षण— ‘मेदूस-घो वृणा केचित् केचित् सर्वाश्रयाः स्मृताः। कुल्याकृतयः केचित् केचित् मुद्गदलोपमाः। रुग्दाहपरीताश्च तृष्णामोहसमन्विताः। घीघ्रं केचित् विसर्पन्ति शनैः केचित्तथापरे ॥ स्त्रीणां पुंसां च जायन्ते उपदंशाः सुदारुणाः ॥’