भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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सुश्रुतसंहिता

[ अ० ११ ]

उपदंश पीड़ित नर का उपसेवन करनेवाली नारी के उस अव- यव में यह रोग हो सकता है, यह लिखना अनुचित नहीं है तथा प्रत्यक्ष प्रमाण से प्रमाणित भी है। पाठक ठण्डे दिल से विचार करें। इसका विशद वर्णन च० वि० अ० ३० में ध्वजभंग नाम से किया गया है और भगवान् पुनर्वसु ने इस रोग को योनिय्यापद प्रकरण में ही लिखा भी है। क्षतेऽक्षते वा-मैथुन करने में अथवा अन्य नख दन्तपात आदि से क्षत-खरोश- घाव होने पर अथवा क्षत के बिना ही कुनसी के रूप में शोथ हो जाता है। एकदेशोत्थितः शोथो व्रणानां पूर्वलक्षणम्-यही शोथ ५-७ दिन में व्रण का रूप बना लेता है ॥७॥

स पञ्चविधस्त्रिभिर्दोषैः पृथक् समस्तैरसूजा चेति।

यह उपदंश रोग पाँच प्रकार का है। यथा—तीन दोषों से पृथग्-वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य, तीनों के सन्निपात से एक और पाँचवाँ रक्तजन्य ॥८॥

तत्र वातिके पारुष्यं त्वकपरिपुटनं स्तब्धमेद्वता पुरुष- ओफता विविधाश्च वातवेदनाः, पैत्तिके ज्वरः श्वयशुः पक्वोदुम्बरसङ्क्राशतीव्रदाहः क्षिप्रपाकः पित्तवेदनाश्च; रुलैमिके श्वयशुः कण्डमान कठिनः स्निग्धः श्लेष्मवेद- नाश्च; रक्तजे कृष्णस्फोटप्रादुर्भावोऽत्यर्थमसूक्प्रवृत्तिः पित्तलङ्घान्यत्यर्थं ज्वरदाहौ शोषश्च; याण्यश्चैव कदाचित्; सर्वजे सर्वलङ्घिर्दर्शनमवदरणं च शेषशः क्रमिप्रादुर्भावो मरणं चेति ॥९॥

इनमें—वातजन्य उपदंश में—कठोरता, त्वचा का फटना, शिरन में जड़ता (अकड़ाहट) सूजन में कठिन्य और नाना प्रकार की वातजन्य वेदनायें होती हैं। पित्तजन्य उपदंश में— ज्वर, पके हुए गूल्ह के समान वर्ण, तीव्र जलन, जल्दी से पकना और पित्तजन्य वेदनायें होती हैं। कफजन्य उपदंश से—सूजन, कण्ड, कठिन्य, स्निग्धता और कफजन्य वेदनायें होती हैं। रक्तजन्य उपदंश में—काले छालों की उत्पत्ति, अति- शय रक्तस्त्राव, पित्तजन्य उपदंश के लक्षण, अतिशय ज्वर, दाह और शोथ होता है। यह उपदंश कभी २ याप्य है। सन्निपात- जन्य उपदंश में—सम्पूर्ण दोषों के लक्षणों का स्पष्ट होना, शिरन का विदीर्ण होना, शिरन या शरीर में क्रमियों का उत्पन्न होना और मृत्यु होती है ॥१०॥

कुपितास्तु दोषा वातपित्तश्लेष्माणोऽधःप्रपन्ना वङ्ग- णोरजातुजह्नास्ववतिष्ठमानाः कालान्तरेण पादमाश्रित्य शनैः ओफं जनयन्ति, तं श्लीपदमित्याचक्षते। तत्त्रिविधं- वातपित्तकफनिमित्तमिति ॥१०॥

श्लीपद (Elephantiasis)—प्रकृपित वात, पित्त, कफदोष नीचे की ओर सरककर वंक्षण, ऊरु, जानु और बंग

में स्थान करके कुछ समय पीछे पाँवों में उत्तरकर धीरे-धीरे सूजन उत्पन्न करते हैं। इस सूजन को श्लीपद कहते हैं।

यह रोग तीन प्रकार का है। यथा—वातजन्य, पित्तजन्य और कफजन्य।

वि० मन्तव्य—श्लीपद को फीलपाँव—हाथी पाँव कहते हैं। जब इसका वेग होता है तब शीत ज्वर भी हो जाता है ॥११॥

तत्र वातजं खरं कृष्णं पुरुषमनिमित्तानिलरुजं परि- स्फुटति च बहुशः, पित्तजं तु पोतावभासमोषन्मुदु ज्वर- दाहप्रायं च; श्लेष्मजं तु श्वेतं स्निग्धवाभासं मन्दवेदनं भारिकं महाप्रन्थिकं कण्टकैरुपचितं च ॥११॥

वातजन्य श्लीपद—खरदरा, कृष्णवर्ण, कठोर, विना कारण के ही वातजन्य वेदना युक्त तथा बहुत से स्थानों पर फूट पड़ता है (त्वचा फट जाती है)। पित्तजन्य श्लीपद—पीछे रङ्ग की झाँबीवाला, थोड़ा कोमल, ज्वर एवं दाह युक्त होता है। श्लेष्मजन्य श्लीपद—श्वेत स्निग्ध (चिकना), चमक युक्त, मन्दवेदनाशील, गुरु, महाप्रन्थि बहुत बड़ी प्रन्थि से युक्त तथा कांटों से व्याप्त होता है ॥१२॥

तत्र संवत्सरतीतमतिमहद्वलमीकवजजातं प्रस्तुतमिति वर्जनीयानि ॥१२॥

इनमें एक साल पुराना, अतिमहान्, वलमीक के समान अनेक शिखराकार फैला हुआ श्लीपद रोग असाध्य है ॥१३॥

भवन्ति चान्न— त्रीण्यप्येतानि जानीयाच्छ्लीपदानि कफोच्छ्रयात्।

गुरुत्वं च महत्त्वं च यस्माद्भ्रास्ति विना कफात् ॥१३॥

कहा भी है—उपर्युक्त तीनों श्लीपद कफ की प्रधानता से उत्पन्न होते हैं। क्योंकि गुरुत्व और महत्त्व ये दोनों बातें कफ के बिना उत्पन्न नहीं होतीं ॥१३॥

पुराणोदकभूमिष्वः सर्वतुंषु च गीतलाः। ये देशास्तेषु जायन्ते श्लीपदानि विशेषतः ॥१४॥

प्रायः करके श्लीपद रोग उन देशों में होता है, जो कि सब ऋतुओं में शीतल रहते हैं (समुद्र के किनारे के) तथा जहाँ पर पुराने पानी का व्यवहार अधिकतया होता है ॥१४॥

पादवद्धस्तयोश्चापि श्लीपदं जायते नृणाम्। कर्णीक्षिनासिकौष्ठेषु केचिद्विच्छन्ति तद्विदः ॥१५॥

१ श्लीपद रोग का कारण आजकल 'फाईलेरिया' नामक क्रमि माना जाता है। यह रोग मडुरा में अधिक होता है। इह लिये इसको Madura foot भी कहते हैं। यह रोग प्रायः बहू होता है, जहाँ पानी खड़ा रहता है, ऐसा माना जाता है। केवल यही कारण हो, ऐसा नहीं दीखता, साथ में वहाँ ठण्डक भी रहती चाहिये इस रोग का क्रमि प्रायः रात में रक्त के अन्दर मिलता