सुश्रुत संहिता
Sushruta Samhita
महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा
स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)
पृष्ठ 315, कुल 872 में से
संदर्भ में पढ़ेंअ० १२ ]
निदानस्थानम्
२६७
मनुष्यों के (स्त्रियों के भी) पाँव के समान हाथों में श्लीपद रोग प्रायः होता है। कई आचार्यों का कहना है कि कान, आँख, नासिका, ओष्ठ ( मुख एवं योनि दोनों ) में भी होती है ॥
इति सुश्रुतसंहितायां निदानस्थाने बृद्धयुपदंशश्लीपद निदानं नाम द्वादशोऽध्यायः ॥१२॥
त्रयोदशोऽध्यायः ।
अथातः लुद्ररोगाणां निदानं व्याख्यास्यामः ॥११॥
यथोवाच भगवान् धन्वन्तरिः ॥२॥
बुद्धि, उपदंश आदि रोगों को कहकर इसके आगे लुद्र-रोगों के निदान की व्याख्या करते हैं, जैसा कि भगवान् धन्वन्तरि ने सुश्रुत के लिए कहा था ॥१२,२॥
समासेन चतुश्चत्वारिंशत् लुद्ररोगा भवन्ति । तद्यथा-अजगल्लिका, यवप्रख्या, अन्धाळजी, विवृता, कच्छपिका, वल्मीकम, इन्द्रवृद्धा, पनसिका, पाषाणगर्दभः, जालगर्दभः, कक्षा, विस्फोटकः, अग्निरोहिणी, चिप्पः, कुनखः, अनुग्रथी, विदारिका, शंकरावृंदः, पामा, विचर्चिका, रक्सा, पाददारिका, कदरम्, अलसेन्द्रलुप्तौ, दारुणकः, अरुपिका, पलितः, मसूरिका, यौवनपिडका, पश्चिनीकण्टकः, जतुमणिः, मशकः, चर्मकीलः, तिलकालकः, न्यच्छः, व्यङ्गः, परिवर्तिका, अवपाटिका, निरुद्धप्रकशः, सन्निरुद्धगुदः, अहिपूतनः, वृषणकच्छुः, गुदभ्रंशश्च ॥३॥
है। रात के बारह बजे एक बूंद रक्त में ३०० से ६०० तक इनकी संख्या मिलती है। दिन के समय यह कृमि फेफड़े, वृक्क आदि में पहुँच जाता है। इस रोग के कारण रोगी को ज्वर आता है और वंछण में दर्द, शोथ, ग्रन्थि में वेदना होती है। पैर में सूजन तथा भारीपन अनुभव होता है। यह भारीपन शिला के भार के समान होता है—जैसा कि संग्रह में कहा है—“शिलावत् पदं श्लीपदम् । शनैः शनैः घनं शोफं श्लीपदं तत् प्रचक्षते ।” “यः सज्जरो वंछणजो भूशान्तिः शोथो नूनां पादगतः क्रमेण । तच्छ्लीपदं स्यात् ।” “श्लीपदं जायते तच्च देशेऽनूपे भूशं श्रमात् ॥”
१ ‘शुद्ररोग’ इस नाम का अर्थ स्पष्ट नहीं है। कविराज हारा-पावन जी का कहना है कि—नामग्रहण मात्र से ही रोग स्पष्ट हो जाता है, इसलिये इनको शुद्ररोग कहते हैं। दूसरे आचार्य छत्रिणो शच्छन्ति इस म्याय से इनमें पढ़े महारोगों का भी इन शुद्ररोगों में अन्तर्भाव करते हैं। अथवा पूर्वार्चियों ने इन रोगों की यह संज्ञा की है।
संक्षेप में चवालिस लुद्ररोग हैं, यथा—अजगल्लिका, यव-प्रख्या, अन्धाळजी, विवृता, कच्छपिका, वल्मीक, इन्द्रवृद्धा, पनसिका, पाषाणगर्दभ, जालगर्दभ, कक्षा, विस्फोटक, अग्नि-रोहिणी, चिप्प, कुनख, अनुग्रथी, विदारिका, शंकरावृंद, पामा, विचर्चिका, रक्सा, पाददारिका, कदर, अलस, इन्द्रलुप्त, दारुणक, अरुपिका, पलित, मसूरिका, यौवनपिडका, पश्चिनी-कण्टक, जतुमणि, मशक, चर्मकील, तिलकालक, न्यच्छ, व्यङ्ग, परिवर्तिका, अवपाटिका, निरुद्धप्रकश, सन्निरुद्धगुद, अहिपूतन, वृषणकच्छु और गुदभ्रंश ये चवालिस रोग हैं ॥३॥
स्निग्धा सवर्णा ग्रथिता नीरुजा मुदसन्निभा ।
कफवातोत्थिता ब्रैया बालानामजगल्लिका ॥४॥
१ अजगल्लिका—स्निग्ध, त्वचा के समान वर्ण, ग्रथित, वेदना रहित एवं मूंग के समान होती है। यह रोग कफ एवं वायुजन्य है, प्रायः बालकों में (कभी कभी बड़ों में भी) होता है ॥४॥
यवाकारा सुकठिना ग्रथिता मांससंश्रिता ।
पिडका इलेष्मवाताभ्यां यवप्रख्येति सोच्यते ॥५॥
२ यवप्रख्या—जो के समान आकारवाली, अतिकठिन, ग्रथित, मांस से आश्रित पिडका को ‘यवप्रख्या’ कहते हैं। यह कफ-वातजन्य है ॥५॥
घनामवक्त्रां पिडकामुन्नतां परिमण्डलाम् ।
अन्धाळजीमल्पपूयां तां विद्यात् कफवातजाम् ॥६॥
३ अन्धाळजी—कठिन, मुख रहित या अल्पमुखी गोल ऊपर उठी तथा अल्पपूयुक्त पिडका को ‘अन्धाळजी’ कहते हैं। यह कफ-वातजन्य है ॥६॥
विवृतास्यां महादाहां पक्वोदुम्बरसन्निभाम् ।
विवतामिति तां विद्यात् पितात्थां परिमण्डलाम् ॥७॥
४ विवृता—खुले मुखवाली, महान् दाहयुक्त, पके गूजर फल के समान, गोल पिडका को ‘विवृता’ कहते हैं। यह पिच-जन्य है ॥७॥
ग्रथिताः पञ्च वा षड्वा दास्वणाः कच्छपोन्नताः ।
कफानिल्लाभ्यां पिडकां ब्रैया कच्छपिका बुधैः ॥८॥
५ कच्छपिका—कच्छ (बगल) में पाँच वा छे कठिन गांठ कच्छूप की पीठ के समान निकल आती हैं, उनको ‘कच्छपिका’ कहते हैं। यह रोग कफ और वायु से होता है ॥८॥
पाणिपादतले सन्धौ प्रीवायामूर्ध्वजत्रुणि ।
ग्रन्थिवल्मीकवद्यस्तु शनैः समुपचीयते ॥९॥
१ यह रोग स्नायुजन्य है। यथा—‘इलेष्मानिलो श्रितो स्नायुं पिडकां परिमण्डलाम् । दुष्टो जनयतोऽवक्रमल्पपूयामकण्डुराम् ॥ आमोदुम्बरसंकाशां विद्यान्धाळजोन्मु ताम् ॥