भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

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मुमुक्षुसंहिता

[ अ० ११ ]

तोदक्लेदपरीदाहकण्डुमद्भिर्मुखैर्वृतः ।

व्याधिबलमीक इत्येष कफपित्तानिलोद्भवः ॥१०॥

६ बल्मीक—हाथ-पाँव के तलुओं में, सन्धि में, प्रीवा में जवु (प्रीवा असंरन्धि) के ऊपर के भाग में जो ग्रन्थि बल्मीक के समान धीरे धीरे बढ़ती है, उस ग्रन्थि में जुमने की सी वेदना, गीलापन, जलन, तथा कण्डुशील ब्रणों से युक्तता रहती है। यह रोग कफ, पित्त, वायु से उत्पन्न होता है ॥१२-१०॥

पद्मपुष्करवन्मध्ये पिडकाभिः समाचिताम् ।

इन्द्रवृद्धा तु तां विद्याद्वातपित्तोस्थितां भिषक् ॥११॥

७ इन्द्रवृद्धा—पद्मवीजकोष के समान बीच में छोटी-छोटी पिडकाओं से घिरी होती है। यह इन्द्रवृद्धा पिडका वात-पित्त-जन्म है ॥११॥

मण्डलं वृत्तमुत्सन्नं सरक्तं पिडकाचितम् ।

रुजाकरीं गर्दभिकां तां विद्यद्वातपित्ताजाम् ॥

गर्दभिका—पिडकाओं से घिरी हुई, ठाल, ऊपर की ओर उठी हुई, गोल, पीड़ा से युक्त मण्डल को गर्दभिका जानना चाहिए। यह पिडका वातपित्तजन्म होती है।

कृणो परिसमन्ताद्वापृष्ठे वा पिडकोम्ररुकु ।

शालूकवत्पनसिकां तां विद्याच्छ्लेष्टमवातजाम् ॥१२॥

८ पनसिका—कानों के चारों ओर अथवा कान के पीछे (कान के अन्दर भी) शालूक कुमुदादि की जड़ के समान उठी हुई एवं अतिवेदनाशील पिडका को पनसिका कहते हैं, यह कफवातजन्म है ॥१२॥

हनुसन्धौ समुद्धृतं शोफमल्परुजं स्थिरम् ।

पाषाणगर्दभं विद्याद्वात्तासपवनात्मकम् ॥१३॥

९ पाषाणगर्दभ—(Munips)—हनुसन्धि में (ग्रन्थियों-छालाग्रन्थियों के कारण) उत्पन्न, मन्द वेदनायुक्त, स्थिर सूजन को 'पाषाणगर्दभ' कहते हैं, यह रोग कफ-वातजन्म है ॥१३॥

विसर्पवन् सर्पति यो दाहञ्चरकरस्तनः ।

अपाकः श्वयशुः पित्तात् स श्लेषो जालगर्दभः ॥१४॥

१० जालगर्दभ—विसर्प के समान जो सूजन फैले, सूजन में दाह तथा ज्वर हो, शोथ तनु (उत्तानसूक्ष्म हो), सूजन पके नहीं, उसे 'जालगर्दभ' कहते हैं, यह रोग पित्तजन्म है ॥१४॥

पिडिकामुत्तमाङ्गस्थां वृत्तामुम्ररुजाञ्चराम् ।

सर्वात्मकां सर्वलिङ्गां जानीयादिरिवेल्लिकाम् ॥१५॥

इरिवेल्लिका—जो पिडिका गोल, अतिपीडा और ज्वरकारक तीनों दोषोवाली तथा तीनों दोषों (वात, पित्त, कफ) के

१ इस रोग पित्तमें की प्रधानता रहती है, इसलिये थोड़ा पकता है यह तो मानना ही पड़ेगा। जैसा कि भोज ने कहा है—

“पित्तोत्तरास्वयो दोषः जनयन्ति त्वगश्रिताः ।

विसर्पमाहुस्तं व्याधिमपरे जालगर्दभम् ॥”

लक्षणों से युक्त शिर में होवे उसे इरिवेल्लिका समझना चाहिए ॥१५॥

बाहुपाशर्वसंकक्षासु कृष्णस्फोटां सवेदनाम् ।

पित्ताप्रकोपसंभूतां कक्षामिति विन्तिदिशेत् ॥१६॥

११ कक्षा (Boil)—बाहु-पाशर्व अंस और कक्षा में काले रङ्ग के छाले उत्पन्न हो जायें, इन छालों में वेदना हो, इनको (कक्षा) कहते हैं। यह रोग पित्त के प्रकोप से होता है ॥१६॥

एकामेर्बुर्बिधां दृष्ट्वा पिटिकां स्फोटसन्निभाम् ।

त्वगगतां पित्ताकोपेन गन्धनामां प्रचक्षते ॥१७॥

१ गन्धनामा—इसी प्रकार की, स्फोट के तुल्य, चर्मपटल में आश्रित करके पित्त के प्रकोप से उत्पन्न हुई पिडिका को गन्धनामा या गन्धमाला कहते हैं ॥१७॥

अग्निदग्धनिभाः स्फोटाः सञ्चराः पित्तरक्ततः ।

क्वचिन् सवैत्र वा देहे स्मृता विस्फोटका इति ॥१८॥

२ विस्फोटक में—अग्नि से जलने की भाँति उत्पन्न छाले (पानीयुक्त) सम्पूर्ण शरीर में अथवा शरीर के किसी एक भाग में उत्पन्न हो जाते हैं। इनमें ज्वर हो जाता है यह रोग रक्त-पित्तजन्म है ॥१८॥

कक्षामागोषु ये स्फोटा जायन्ते मांसदाह (र) पाः ।

अन्तर्दाहञ्चरकरा दीप्तपावकसन्निभाः ॥१९॥

सप्ताहाद्वा दशाहाद्वा पक्षाद्वा धनन्ति मानवम् ।

तामन्निरोहिणीं विद्यादासाध्यां सन्निपाततः ॥२०॥

३ अग्निरोहिणी—कक्षा सन्धि (वंक्षण-गलसन्धि में भी) में मांस के कारण कठिन या मांस के दारक-फाइनेवाले जो छाले उत्पन्न होते हैं, तथा इन छालों के कारण तीव्र अन्तर्दाह, तीव्र अन्तर्ज्वर रोगी को हो, छालों में जलती अग्नि के समान जलन रहती हो, इसको 'अग्निरोहिणी', कहते हैं। यह रोग वातजन्म होने से सात दिन में, पित्ताधिक होने पर बारह दिन में और कफाधिक होने पर पन्द्रह दिन में रोगी को मार देता है। सन्निपातजन्म रोग असाध्य है ॥१९, २०॥

नखमांसमधिष्टाय पित्तां वातश्च वेदनाम् ।

कराति दाहपाकी च तं व्याधि चिप्पमादिशेत् ॥२१॥

तदेवाक्षतरोगाख्यं तथोपनखमित्रयपि ।

४ चिप्प—और वायु नख के मांस का आश्रय लेकर

१ अन्य स्थानों में—मांस को फाइनेवाले छाले उत्पन्न होते हैं—ऐसा कथन है। यथा—

“पित्तोत्तरा नृणां दोषा प्रदोष्तांगारसन्निभाः ।

कक्षामागोषु कुर्वन्ति तीव्रदाहरुजाञ्चरान् ॥

मांसावदारणाम् स्फोटान् ये ह्युत्पन्नपक्रमात् ।

पक्षाद्वाहादवर्क वा सा श्रेया बलिरोहिणी ॥”