भारतकोश
सुश्रुत संहिता

सुश्रुत संहिता

Sushruta Samhita

महर्षि सुश्रुत (व्याख्याकार: अत्रिदेव गुप्त) द्वारा

स्रोत: मोतीलाल बनारसीदास - अत्रिदेव गुप्त कृत हिन्दी व्याख्या · मोतीलाल बनारसीदास, वाराणसी (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished872 पृष्ठ

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अ० ११]

निदानस्थानम्

२६९

वेदना, दाह एवं पाक को उत्पन्न करते हैं। इस रोग की 'चिप्प' कहते हैं। इसी को क्षतरोग या उपनख भी कहते हैं ॥१२॥ अभिघातात् प्रदुष्टो यो नखो रूक्षोऽसितः स्वरः ॥१२॥ भवेत् कुतखं विद्यात् कुलीनमिति संज्ञितम्। १५ कुनख—चोट के लगने से जो नख रूक्ष, काला और कर्कश हो जाता है, उसको 'कुनख' अथवा 'कुलीन' कहते हैं ॥ गम्भीरामठपसंरम्भां सवर्णामुपरिस्थिताम् ॥१३॥ कफादनतःप्रपाकां तां विद्यादनुशुष्मी भिषक्। १६ अनुशयी—गम्भीर (अनुत्तान-गहरी), अल्पाशोय युक्त ल्वा के समानवर्ण, ऊपरी (शिरोभाग में) स्थित, पिडिका को 'अनुशयी' कहते हैं। यह कफ के कारण अन्दर से पकती है, इसीलिये गम्भीर है ॥१३॥ विदारिकन्दवद्वृत्तां कक्षावक्ष्णसन्धिषु ॥१४॥ रक्तां विदारिकां विद्यात् सर्वजां सर्वलक्षणाम्। १७ विदारिका—विदारीकन्द के समान गोल, कक्षा-वक्षण सन्धियों में उत्पन्न, (लावर्ण) पिडिका को 'विदारिका' कहते हैं। यह रोग सन्निपातजन्य है, इसमें वातादि सब दोषों के लक्षण सम्मिलित रहते हैं ॥१४॥

प्राप्य मांससिरास्ताना्यु इलेषमा मेदस्तथाऽनिलः ॥१५॥ ग्रन्थि कुर्वन्ति भिन्नोऽसौ मधुसर्पिवसानिभम्। सवत्याघ्रावमत्यर्थं तत्र वृद्धि गतोऽनिलः ॥१६॥ मांसं विशोष्यग्रन्थिस्तां शर्करां जनयेत् पुनः। दुर्गन्धं किल्वन्नमत्यर्थं नानावर्णं ततः सिराः ॥१७॥ सवन्ति सहसा रक्तं तद्विघाकच्छर्कराबुदम्।

१८ शर्कराबुद—मांस, शिरा, स्नायु तथा मेद में कफ और वायु पहुँचकर ग्रंथि (गॉठ) उत्पन्न करते हैं। इस गॉठ के फूटने पर मधु, घी और वसा के समान नाना रङ्ग का खाव बहने लगता है। इस अवस्था में इस स्थान की वायु कुपित होकर मांस को शुष्क करके ग्रथित (दानेदार) शर्करा को उत्पन्न करती है। इसके कारण शिराओं से दुर्गन्ध युक्त, किल्व्न (आर्द्र-पूति), नाना रंग का रक्त सहसा बहने लगता है। इसको 'शर्कराबुद' कहते हैं ॥१५-१७॥

पामाविचच्च्यौ कुष्ठेषु रक्सा च प्रकीर्तिता ॥१८॥ १९-२०-२१ पामा विचर्चिका और रक्सा का वर्णन कुछ रोग में कर चुके हैं ॥१८॥

परिक्रमणशीलस्य वायुरत्यर्थरूक्षयोः। पादयोः कुरुते दारीं सरुजां तल्लसंश्रितः ॥१९॥

२२ विपादिका—पाददारिका परिक्रमणशील (सदा नंगे पाँव से घुसाफरी करनेवाले) व्यक्ति के अत्यन्त रूक्ष बने पैरों में वायु पाददारिका (दारण-विवाह) रोग उत्पन्न करती है। इसके एकी में होने पर पीड़ा होती है ॥१९॥

शर्करोन्मथिते पादे क्षते वा कण्टकादिभिः। मेदोरक्तानुगैश्चैव दोषैर्वा जायते नृणाम् ॥२०॥ सकीलकठिनो ग्रन्थिनिस्मन्मध्योनन्तोऽपि वा। कोलमात्रः संहृक्त्वावी जायते कदरस्तु सः ॥२१॥ २३ कदर—(Cornea) शर्करा (कंकड़ आदि से पाँव के पीड़ित होने पर या काँटे आदि से पाँव में क्षत होने पर वातादि दोष मेद-रक्त के साथ मिलकर कील (शंकु) के समान एवं कठिन, बेर के आकार की ग्रन्थि उत्पन्न करते हैं। यह ग्रन्थि पाँव के नीची मध्यम या उन्नत होती है। इसमें वेदना और खाव होते हैं। इसको 'कदर' कहते हैं ॥२०,२१॥ किल्व्नानुत्थन्तरीं पादौ कण्डूदाहरुगन्वितौ। दुष्टकदमसंसर्गादलसं तं विनिर्दिशेत् ॥२२॥ २४ अलस—पाँव की अंगुलियों में आर्द्रता, कण्डू, दाह और पीड़ा रहने पर दूषित कदम (कीचड़) के स्पर्श से (कफ के रक्त के साथ मिलने पर) 'अलस' रोग उत्पन्न होता है ॥२२॥

रोमकूपानुगं पित्तं वातेन सह मूर्च्छितम्। प्रन्ध्यावयति रोमाणि ततः श्लेष्मा सञ्जोषितः ॥२३॥ रुणद्वि रोमकूपान्तु ततोऽन्येषामसंभवः। तदिन्द्रलुप्तं खालित्यं रुज्येति च विभाज्यते ॥२४॥

२५ इन्द्रलुप्त—रोमकूपों में पहुँच पित्त वायु के साथ मूर्च्छित (दूषित) होकर, रोमों को गिरा देता है। इसके अनन्तर कफ रक्त से मिलकर रोमकूपों को रोक लेता है। इसलिये दूसरे नये रोमकूप उत्पन्न नहीं होते। इस रोग को इन्द्रलुप्त खालित्य या 'रुहा' कहते हैं। (इन्द्रलुप्त रमश्रु में होता है, खालित्य शिर में और रुहा सारे शरीर में होती है) ॥२३,२४॥

दारुणा कण्डुरा रूक्षा केऽभूमिः प्रपाठ्यते। कफवातप्रकोपेण विद्याहारुणकं तु तम् ॥२५॥

२६ दारुणक—कफ-वायु के प्रकोप से कठिन कण्डुरा (कण्डुयुक्त) एवं रूक्ष केऽभूमि (शिर की ल्वा) विशेषरूप में फटती है। इसको 'दारुणक' कहते हैं। (इस रोग में पित्त रक्त का भी अनुबन्ध रहता है ॥२५॥)

अरूषि बहुवक्त्राणि बहुकलेदीनि मूर्धनि। कफास्त्रक्कुमिकोपेन नृणां विद्यादरूषिकाम् ॥२६॥

२७ अरूषिका—मनुष्यों के शिर में—कफ-रक्त और कृमियों के प्रकोप से अनेक मुखवाले, तथा अतिखाव युक्त अरूष (फुनिसयां) उत्पन्न हो जाते हैं। इनको अरूषिका कहते हैं ॥२६॥

१—यह रोग स्त्रियों में नहीं होता। क्योंकि— "अत्यन्तमुकुमारंगयो रजो दुष्टं सवन्ति च। अस्यायामरता यस्मात् तस्मात् खलितः स्त्रियाम्।